देवानंद सिंह
भारतीय जनता पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि रणनीतिक निरंतरता का संकेत भी होता है। राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ने से पहले जेपी नड्डा ने जो कदम उठाया, वह इसी राजनीतिक समझ और दूरदृष्टि का प्रमाण है। 2026 में होने वाले असम विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए चुनावी इंचार्ज और को-इंचार्जों की नियुक्ति कर नड्डा ने साफ कर दिया कि भाजपा संगठन किसी भी स्तर पर ढिलाई के मूड में नहीं है।
वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत पांडा को असम विधानसभा चुनाव का इंचार्ज बनाना केवल एक नामांकन नहीं, बल्कि संगठनात्मक अनुभव और रणनीतिक क्षमता पर भरोसे की मुहर है। उनके साथ सुनील कुमार शर्मा और दर्शना बेन जरदोश को को-इंचार्ज बनाकर पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाला चुनाव केवल राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से भी जुड़ा है। असम, जहां भाजपा लगातार दो बार सरकार बना चुकी है, नॉर्थ-ईस्ट में पार्टी की रीढ़ बना हुआ है। ऐसे में बूथ-लेवल मैनेजमेंट से लेकर सेंट्रल-स्टेट कोऑर्डिनेशन तक की जिम्मेदारी एक मजबूत टीम को सौंपना नड्डा का सधा हुआ दांव माना जा रहा है।
दूसरी ओर, संगठन की बागडोर अब नितिन नबीन के हाथों में सौंपे जाने की घोषणा भाजपा के भीतर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत है। पहली बार बिहार के किसी नेता को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाना सिर्फ क्षेत्रीय संतुलन नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संदेश भी है। कायस्थ समाज से आने वाले नितिन नबीन को यह जिम्मेदारी ऐसे समय में मिली है, जब भाजपा संगठनात्मक मजबूती और चुनावी आक्रामकता—दोनों को एक साथ साधना चाहती है।
नितिन नबीन का राजनीतिक सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा है। शहरी विकास मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल पर सवाल उठे, पुल गिरने जैसी घटनाओं ने आलोचना भी दिलाई, लेकिन पार्टी ने उन्हें न केवल दोबारा मंत्री बनाया बल्कि वही विभाग सौंपकर यह भी जता दिया कि नेतृत्व उनके प्रशासनिक और राजनीतिक कौशल पर भरोसा करता है। 2017 में कांग्रेस नेता अब्दुल जलील मस्तान के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराने का मामला भी नितिन नबीन की आक्रामक राजनीतिक शैली को रेखांकित करता है।
जेपी नड्डा और नितिन नबीन—इन दोनों नामों को साथ रखकर देखें तो भाजपा की रणनीति साफ नजर आती है। एक ओर नड्डा जाते-जाते असम जैसे अहम राज्य में चुनावी ढांचा मजबूत कर गए, तो दूसरी ओर नितिन नबीन के रूप में संगठन को नया चेहरा, नया संतुलन और नया संदेश दिया गया है।
भाजपा का यह कदम बताता है कि पार्टी न तो सत्ता को हल्के में ले रही है और न ही संगठन को। 2026 के असम चुनाव और आने वाले राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों के लिए यह “ट्रांजिशन प्लान” भाजपा को एक कदम आगे खड़ा करता है। सवाल बस इतना है—क्या यह रणनीति ज़मीन पर भी उतनी ही असरदार साबित होगी, जितनी कागज़ पर दिख रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जाते-जाते नड्डा का मास्टरस्ट्रोक, नड्डा का रणनीतिक विराम,नितिन नबीन की संगठनात्मक शुरुआत है ये

