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    बिहार के चुनावी चक्रव्यूह में चुनावी चाणक्य प्रशांत किशोर!

    News DeskBy News DeskJuly 15, 2025No Comments3 Mins Read
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    बिहार के चुनावी चक्रव्यूह में चुनावी चाणक्य प्रशांत किशोर!

    देवानंद सिंह
    बिहार की राजनीतिक ज़मीन एक बार फिर करवट लेने को तैयार है। इस बार केंद्र में हैं चुनावी रणनीतिकार से जननेता बनने की राह पर अग्रसर प्रशांत किशोर, जिन्होंने ‘जन सुराज’ की मुहिम के सहारे प्रदेश में वैकल्पिक राजनीति की नई इबारत लिखने की ठानी है। सवाल यह है — क्या यह चाणक्य बिहार के राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाएगा?

     

    प्रशांत किशोर को राजनीति का चाणक्य यूं ही नहीं कहा जाता। नरेंद्र मोदी से लेकर नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, कैप्टन अमरिंदर सिंह और जगन मोहन रेड्डी तक, उन्होंने जिनके लिए रणनीति गढ़ी, उन्हें सत्ता की सीढ़ी तक पहुँचाया। लेकिन रणनीति बनाना और स्वयं मैदान में उतरकर जनता का विश्वास जीतना — ये दोनों अलग-अलग युद्ध हैं। बिहार में वे अब अपनी रणनीति के सेनापति नहीं, स्वयं योद्धा हैं।

     

    उनकी ‘जन सुराज यात्रा’ अब तक राज्य के सैकड़ों प्रखंडों में घूम चुकी है। गांव-गांव में चौपाल, संवाद, और साफ़ तौर पर जनता की पीड़ा से जुड़ने की कोशिशें, उन्हें परंपरागत दलों से कुछ अलग दिखाती हैं। वे न जाति की राजनीति कर रहे हैं, न ही धर्म का कार्ड खेल रहे हैं। वे शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीति की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन क्या बिहार की राजनीति इसके लिए तैयार है?

    बिहार का मतदाता चतुर है, लेकिन वर्षों से जातीय समीकरणों में उलझा हुआ भी है। लालू-नीतीश की राजनीति ने जहां एक ओर सामाजिक न्याय की बात की, वहीं दूसरी ओर एक स्थायी विकास मॉडल की कमी साफ़ दिखी है। भाजपा की रणनीति भी प्रखर राष्ट्रवाद और संगठन शक्ति पर टिकी है। ऐसे में प्रशांत किशोर की विकास आधारित ‘जन सुराज’ कितनी ज़मीन बना पाएगी — यह देखने की बात होगी।

     

    इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रशांत किशोर की छवि पढ़े-लिखे और व्यवस्थित सोच रखने वाले नेता की है। लेकिन एक नेता के तौर पर जनता का भरोसा अर्जित करने के लिए केवल छवि काफी नहीं होती — ज़रूरी है जमीनी संगठन, स्पष्ट नेतृत्व और जनता के दिल को छूने वाली राजनीति।

    अभी तक ‘जन सुराज’ एक आंदोलन जैसा दिखता है, न कि एक सशक्त राजनीतिक विकल्प। लेकिन यदि प्रशांत किशोर इसे एक ठोस संगठनात्मक रूप दे सके, तो यह बिहार की थकी-हारी राजनीति में एक नई चेतना का संचार कर सकता है।

     

     

    बिहार का चक्रव्यूह कठिन है इसमें जाति, धर्म, गरीबी, बेरोज़गारी, और नेताओं से मोहभंग का मिश्रण है। क्या प्रशांत किशोर इस चक्रव्यूह को भेद पाएंगे? अभी कहना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतना तय है कि उनकी उपस्थिति ने मौजूदा राजनैतिक दलों को एक बार फिर सोचने पर मजबूर ज़रूर कर दिया है। और यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है

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