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    Home » निष्पक्षता की पहल या लोकतांत्रिक अधिकारों पर संकट?
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    निष्पक्षता की पहल या लोकतांत्रिक अधिकारों पर संकट?

    News DeskBy News DeskJune 30, 2025No Comments4 Mins Read
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    निष्पक्षता की पहल या लोकतांत्रिक अधिकारों पर संकट?
    देवानंद सिंह

     

    चुनाव आयोग द्वारा बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले स्पेशल इंटेन्सिव रिविज़न के तहत वोटर लिस्ट में व्यापक संशोधन की घोषणा ने राजनीतिक माहौल को अचानक गर्मा दिया है। आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र को सशक्त बनाने, मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और अद्यतन रखने के लिए की जा रही है, लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि यह प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनीतिक साजिश है, यह एक ऐसा कदम है, जो गरीबों, वंचितों और अल्पसंख्यकों को वोटिंग से वंचित कर सकता है। 24 जून को जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, चुनाव आयोग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल योग्य नागरिक ही मतदाता सूची में शामिल हों। आयोग के अनुसार, बढ़ते शहरीकरण, प्रवासन, युवाओं के मतदान योग्य बनने, मौतों की अनगिनत अधिसूचनाएं न आने और अवैध विदेशी प्रवासियों के नाम जुड़ने जैसी चुनौतियां इसे आवश्यक बनाती हैं।

     

    इस प्रक्रिया में बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) घर-घर जाकर सर्वे करेंगे, फॉर्म भरवाएंगे और दस्तावेज़ों के सत्यापन के बाद डाटा को आयोग के ऐप में अपलोड करेंगे। आयोग ने संवेदनशील समूहों जैसे बुज़ुर्गों और विकलांगों के लिए विशेष सहूलियतों की बात भी कही है।
    आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस प्रक्रिया को चिंताजनक, मनमानी और छलावे से भरा बताया है। उनका आरोप है कि इस अभियान के ज़रिए गरीब, दलित, मुसलमान और प्रवासी मतदाताओं को सूची से हटाया जा सकता है, खासकर, तब जब उन्हें आवश्यक दस्तावेज़ उपलब्ध न हों। तेजस्वी यादव ने यह सवाल उठाया है कि जब 2024 के लोकसभा चुनाव इन्हीं सूचियों के आधार पर हुए, तो अब अचानक उन्हें अविश्वसनीय कैसे ठहराया जा रहा है? साथ ही यह भी पूछा गया है कि यदि, पहले की सूची में त्रुटियां थीं, तो क्या उस दौरान नियुक्त सहायक निर्वाचन पदाधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?

     

    वहीं, ओवैसी ने यह मुद्दा उठाया कि बड़ी संख्या में भारतीयों के पास आज भी जन्म या माता-पिता की जन्मस्थली से जुड़े दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं। सीमांचल जैसे बाढ़ प्रभावित इलाकों में यह समस्या और विकराल है। बीजेपी नेता व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें संविधान विरोधी मानसिकता का परिचायक बताया। उनका कहना है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना एक नियमित प्रक्रिया है, और यह सुनिश्चित करना आयोग की जिम्मेदारी है कि एक व्यक्ति, एक वोट की अवधारणा बनी रहे। टीएमसी सांसद सागरिका घोष और डेरेक ओ’ब्रायन ने आरोप लगाया है कि आयोग सिर्फ बिहार नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी छिपे रूप में NRC लागू करने की तैयारी कर रहा है। उनका दावा है कि बीजेपी अपने आंतरिक सर्वेक्षणों से बंगाल में अपनी गिरती संभावनाओं से घबरा गई है और अब चुनाव आयोग को ब्रांच ऑफिस की तरह इस्तेमाल करना चाहती है।

     

    टीएमसी का यह भी आरोप है कि मतदाताओं को जन्मस्थान और माता-पिता के जन्मस्थानों के दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की जो शर्तें लगाई जा रही हैं, वे यथार्थहीन हैं और करोड़ों लोगों को बाहर का रास्ता दिखा सकती हैं।
    1995 के सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए ओवैसी ने कहा कि बिना सूचना और प्रक्रिया के किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाना अवैध है। यदि, आयोग सचमुच हर नागरिक से नए दस्तावेज़ की मांग कर रहा है तो यह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर तबके के मतदान अधिकारों पर सीधा प्रहार भी है।
    इन सबके बीच यहां कुछ अहम सवाल उभरते हैं। पहला
    टाइमिंग पर सवाल है। सवाल यह है कि बिहार में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह कवायद क्यों?

     


    दूसरा, क्या गरीब, प्रवासी, सीमांचल जैसे क्षेत्र के लोग पर्याप्त दस्तावेज़ उपलब्ध करा सकेंगे?
    तीसरा सवाल है, क्या यह निष्पक्ष संशोधन है या लक्षित सामाजिक समूहों को बाहर करने की रणनीति? बिहार जैसे राज्य में, जहां इंटरनेट, आधार-सिंकिंग और डिजिटल प्रोसेसिंग की सीमाएं हैं, क्या एक महीने में निष्पक्षता से यह प्रक्रिया पूरी हो सकती है?
    यह सही हैं कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण एक आवश्यक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, बशर्ते इसका उद्देश्य समावेशन हो, बहिष्करण नहीं। यदि, चुनाव आयोग की नीयत और प्रक्रिया पारदर्शी, समावेशी और सुचारु नहीं होगी, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को हिला सकती है।

     

    भारत जैसे देश में वोट देना न सिर्फ अधिकार, बल्कि सम्मान की बात है, अगर, नागरिकों को दस्तावेज़ों की जटिलताओं या प्रशासनिक भटकाव के कारण सूची से बाहर कर दिया गया, तो यह सिर्फ एक चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र पर अविश्वास का संकट बन सकता है।
    ऐसे में, आयोग को चाहिए कि वह संशोधन की प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर जागरूकता, व्यापक पहुंच, दस्तावेज़ीय सहूलियत और सभी पार्टियों की भागीदारी सुनिश्चित करे, तभी यह अभियान वास्तविक सुधार कहलाएगा, वरना इतिहास इसे एक लोकतांत्रिक छल के रूप में याद करेगा

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