2027 के रण मे तय होंगा बसपा का सियासी भविष्य
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जेपी गुप्ता
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक प्रासंगिकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 1993 के बाद से 2007 तक बसपा के राजनीतिक प्रभाव में उल्लेखनीय विस्तार हुआ। वर्ष 2007 में पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर अपनी मजबूत राजनीतिक स्थिति दर्ज कराई थी। हालांकि 2012 के बाद विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में लगातार गिरावट देखने को मिली। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल एक सीट हासिल हुई। वहीं, वर्तमान लोकसभा में भी बसपा का कोई सदस्य नहीं है।
राजनीति में दलों का प्रभाव समय-समय पर बढ़ता और घटता रहा है। बसपा के लगातार कमजोर होते चुनावी प्रदर्शन ने पार्टी नेतृत्व के सामने संगठन को मजबूत करने और जनाधार को पुनर्जीवित करने की चुनौती बढ़ा दी है। राजनीतिक दलों के लिए चुनावी सफलता के साथ संगठनात्मक सक्रियता और मतदाताओं के बीच प्रभाव बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में 2027 का चुनाव बसपा के लिए अपने सामाजिक आधार और राजनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने की एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
इसी क्रम में बसपा प्रमुख मायावती ने संगठन को तीन सेक्टरों में विभाजित कर विभिन्न राज्यों की जिम्मेदारी सेक्टर प्रभारियों को सौंपी है। संगठनात्मक ढांचे के तहत सेक्टर-1 में 10 राज्यों की जिम्मेदारी रामजी गौतम और सुरेश राव को दी गई है, जबकि सेक्टर-2 में नौ राज्यों की जिम्मेदारी राजाराम और अतर सिंह यादव को सौंपी गई है।
सेक्टर-3 में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को रखा गया है। इन दोनों राज्यों की संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी मायावती स्वयं कर रही हैं। इस व्यवस्था का संचालन बसपा के लखनऊ स्थित केंद्रीय कार्यालय के माध्यम से किया जा रहा है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, मायावती के साथ उनके छोटे भतीजे ईशान आनंद के भी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों एवं जिलों में दौरे की तैयारी है। वर्षा से प्रभावित राज्यों में संगठनात्मक स्थिति का जायजा लेने के लिए ईशान आनंद को भेजे जाने की भी तैयारी बताई जा रही है।
बसपा के सामने अब संगठन के पुनर्गठन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने और अपने परंपरागत सामाजिक आधार के बीच राजनीतिक संवाद मजबूत करने की चुनौती है। 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन यह भी तय करेगा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ते हुए कितनी प्रभावी भूमिका हासिल कर पाती है।

