लहरें तेज हैं, अब लोकतंत्र की परीक्षा है SIR के बहाने सियासत गरम
देवानंद सिंह
राहुल गांधी ने कहा “मुझे समुद्र में तब तैरना पसंद है, जब लहरें तेज हों। इससे यह सीख मिलती है कि उथल-पुथल भी शांति का ही एक रूप है।” उनका यह कथन ऐसे समय आया है, जब देश की राजनीति में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर लहरें सचमुच तेज हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR अब केवल मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह राजनीतिक विश्वास, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और लोकतंत्र की पारदर्शिता का बड़ा सवाल बन चुका है।
एक तरफ राहुल गांधी निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। दूसरी तरफ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इन आरोपों पर सवाल उठाते हुए पूछ रहे हैं कि यदि SIR के जरिए भाजपा विरोधी मतदाताओं को हटाया गया, तो उन क्षेत्रों में तृणमूल कांग्रेस कैसे जीत गई। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने और जनता में भ्रम फैलाने का आरोप लगा रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी कांग्रेस के आरोपों को “गढ़े हुए झूठ” पर आधारित बताया है।
उधर निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित आदेश तीनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी से जारी हुए हैं। यानी एक ही प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्था के बीच दावों का अंतर साफ दिखाई दे रहा है।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है।क्या SIR वास्तव में मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और पारदर्शी बनाने की प्रक्रिया है? यदि हां, तो इसकी पूरी प्रक्रिया इतनी स्पष्ट क्यों न हो कि किसी भी राजनीतिक दल या मतदाता को संदेह की गुंजाइश न रहे? और यदि किसी स्तर पर आपत्ति है, तो उसका समाधान आरोप-प्रत्यारोप के बजाय दस्तावेजों और सार्वजनिक तथ्यों से क्यों नहीं किया जाता?
चुनाव लोकतंत्र का उत्सव तभी है, जब मतदाता को अपने वोट पर भरोसा हो। मतदाता सूची में एक पात्र नागरिक का नाम छूट जाना छोटी प्रशासनिक त्रुटि नहीं है। यह सीधे उसके लोकतांत्रिक अधिकार को प्रभावित कर सकता है। उसी तरह किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में बने रहना भी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए गंभीर प्रश्न है।
इसलिए SIR का मुद्दा कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं बनाया जाना चाहिए। यह मतदाता बनाम व्यवस्था का प्रश्न है।
राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। चुनाव हारने के बाद हर पराजय का कारण चुनाव आयोग, ईवीएम या मतदाता सूची को बताना और चुनाव जीतने के बाद उसी व्यवस्था को सही मान लेना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। यदि राहुल गांधी या कांग्रेस के पास गंभीर अनियमितताओं के प्रमाण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए। उसी तरह यदि निर्वाचन आयोग और भाजपा का पक्ष सही है, तो उसे भी आंकड़ों, रिकॉर्ड और प्रक्रिया की पारदर्शिता से जनता के सामने पूरी तरह स्पष्ट किया जाना चाहिए।
देवेंद्र फडणवीस और योगी आदित्यनाथ जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं से भी अपेक्षा यही है कि राजनीतिक प्रतिवाद के साथ तथ्य सामने आएं। क्योंकि जब बहस चुनाव आयोग की विश्वसनीयता तक पहुंचती है, तब बयान केवल राजनीतिक हथियार नहीं रहते—वे जनता के विश्वास को प्रभावित करते हैं।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ सवालों से परे होना नहीं है। इसी तरह विपक्ष का अधिकार है कि वह चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए, लेकिन सवाल और आरोप के बीच प्रमाण की दीवार भी जरूरी है।
आज जरूरत किसी एक पक्ष को सही या गलत घोषित करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें किसी पात्र मतदाता का नाम न कटे, किसी अपात्र व्यक्ति को अनुचित लाभ न मिले और किसी राजनीतिक दल को प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का आधार न मिले।
समुद्र की लहरें तेज हैं। राहुल गांधी इसे उथल-पुथल में शांति खोजने की तरह देख रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में असली शांति तब आएगी, जब मतदाता को यह भरोसा हो कि उसकी पहचान सुरक्षित है, उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है और उसका वोट किसी राजनीतिक विवाद का शिकार नहीं होगा।
सियासत अपनी जगह है, आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम शक्ति न राहुल गांधी की है, न देवेंद्र फडणवीस की, न योगी आदित्यनाथ की और न किसी राजनीतिक दल की अंतिम शक्ति उस नागरिक की है, जो मतदान केंद्र तक पहुंचकर अपना मत देता है। SIR की सबसे बड़ी कसौटी भी यही होनी चाहिए।

