विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस समाज के अंतर्मन को झकझोरने एवं वृद्धों की त्रासद स्थितियों पर सोचने को विवश करता है कि जिन हाथों ने परिवार की नींव रखी, जिन कंधों ने बच्चों के भविष्य का भार उठाया और जिन अनुभवों ने जीवन की अनेक कठिन राहों को पार करने में अगली पीढ़ियों का मार्गदर्शन किया, उन्हीं वृद्ध माता-पिता को जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलापन, उपेक्षा, असुरक्षा और अपमान क्यों झेलना पड़ रहा है? निश्चित ही कहीं-न-कहीं हमारी सामाजिक संवेदना कमजोर हुई है। जिस समाज में बुजुर्गों का सम्मान सहज संस्कार होना चाहिए था, वहां उनके अधिकारों और सुरक्षा के लिए अलग से दिवस मनाना हमारी सामूहिक आत्मचिंता का विषय है। भारत तेजी से वृद्ध होती आबादी की ओर बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023 के अनुसार 2050 तक भारत की आबादी में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत हो सकती है; यानी हर पांच भारतीयों में लगभग एक वरिष्ठ नागरिक होगा। यह केवल जनसांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था के सामने आने वाली एक बड़ी चुनौती है। अधिक उम्र तक जीना मानव सभ्यता की उपलब्धि है, लेकिन यदि लंबी आयु के साथ अकेलापन, बीमारी, आर्थिक असुरक्षा और भावनात्मक उपेक्षा जुड़ जाए तो दीर्घ जीवन वरदान के बजाय बोझ जैसा अनुभव होने लगता है।
बदलती पारिवारिक संरचना और वृद्धों की उपेक्षा
भारत की पारंपरिक संस्कृति में वृद्ध व्यक्ति परिवार के मुखिया, मार्गदर्शक और अनुभव के भंडार माने जाते थे। संयुक्त परिवार में उनकी भूमिका केवल निर्णय लेने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे परिवार की स्मृति, परंपरा और संस्कारों के जीवंत केंद्र होते थे। लेकिन तेजी से बदलती जीवनशैली, महानगरीय संस्कृति, रोजगार के लिए पलायन, छोटे परिवारों की प्रवृत्ति, उपभोक्तावाद और बढ़ती व्यक्तिवादी सोच ने इस व्यवस्था को बदल दिया है। आज कई वृद्ध अपने ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेले हैं। उनके पास रहने को छत है, लेकिन संवाद के लिए कोई अपना नहीं; परिवार है, लेकिन समय नहीं; संतान है, लेकिन अपनापन कम होता जा रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस वृद्ध ने जीवनभर परिवार को अपने केंद्र में रखा, सेवानिवृत्ति के बाद वही परिवार उसे अपने केंद्र से बाहर करने लगता है। नौकरी में रहते हुए जिस व्यक्ति की सलाह महत्वपूर्ण थी, नौकरी से मुक्त होते ही उसकी उपयोगिता जैसे समाप्त मान ली जाती है।
वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या: एक चिंताजनक संकेत
वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इसी बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है। हर वृद्धाश्रम दुख की कहानी नहीं है; कुछ स्थानों पर वे अकेले और असहाय वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षा और देखभाल का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। लेकिन जब वृद्धाश्रम उन माता-पिता का अंतिम ठिकाना बन जाए जिन्हें सक्षम संतान केवल इसलिए घर से दूर कर देती है कि वे आधुनिक जीवन की सुविधाओं के बीच ‘असुविधा’ बन गए हैं, तब प्रश्न केवल परिवार का नहीं, पूरे समाज के संस्कारों का बन जाता है। संपत्ति अपने नाम कराने के बाद माता-पिता से दूरी बना लेना, उनकी बीमारी को बोझ समझना या उन्हें केवल घरेलू जिम्मेदारियों के लिए उपयोग करना ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जिन पर समाज को गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए।
वरिष्ठ नागरिकों की स्वयं की भूमिका और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यह भी सच है कि वृद्धावस्था की समस्या केवल युवाओं की संवेदनहीनता से पैदा नहीं होती। वरिष्ठ नागरिकों को भी बदलते समय के साथ स्वयं को बदलना होगा। नई पीढ़ी की स्वतंत्रता, निजी निर्णय और जीवनशैली को समझना होगा। अनावश्यक हस्तक्षेप से बचते हुए अपने अनुभव को आदेश नहीं, मार्गदर्शन के रूप में प्रस्तुत करना होगा। उम्र बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन मन का बूढ़ा हो जाना अनिवार्य नहीं। वरिष्ठ नागरिक यदि सामाजिक गतिविधियों, अध्ययन, सेवा, आध्यात्मिकता, सामुदायिक कार्यक्रमों और रचनात्मक कार्यों से जुड़े रहें तो उनका जीवन अधिक सक्रिय, सार्थक और आनंदपूर्ण बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट का कल आया फैसला बुजुर्गों के लिए कानूनी संजीवनी की तरह है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि संतान माता-पिता की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने में विफल रहती है, तो वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति और सम्मान की रक्षा के लिए कानून के तहत बच्चों को उस संपत्ति से बेदखल करने का रास्ता खुला है।

सरकारी पहल: आयुष्मान भारत और अटल वयो अभ्युदय योजना
सरकार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। विशेष रूप से 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को आय की परवाह किए बिना आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवरेज देना एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकार के अनुसार अक्टूबर 2024 में शुरू हुए इस विस्तार से लगभग छह करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है; जून 2026 तक योजना के अंतर्गत 70 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए कवरेज का दायरा इसी दिशा में आगे बढ़ाया गया है। इसी प्रकार अटल वयो अभ्युदय योजना का उद्देश्य केवल वृद्धों को आश्रय देना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, आवास, सक्रिय एवं उत्पादक वृद्धावस्था, कौशल, परिवहन तथा पीढ़ियों के बीच संबंधों को मजबूत करना भी है। योजना में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सहायता, वृद्धाश्रम, सहायक उपकरण, सक्रिय वृद्धावस्था और अनुभव आधारित रोजगार जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है। ये प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं की सफलता अंततः उनके अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी पहुंचने पर निर्भर करती है। पेंशन, स्वास्थ्य सुविधा, डिजिटल सेवाओं और कानूनी संरक्षण को अधिक सरल, सुलभ और स्थानीय स्तर पर प्रभावी बनाना अभी भी आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023 के आंकड़े इस आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
भावनात्मक सुरक्षा: आर्थिक सुरक्षा से अधिक जरूरी
वरिष्ठ नागरिकों के लिए आर्थिक सुरक्षा जितनी जरूरी है, उससे कहीं अधिक जरूरी भावनात्मक सुरक्षा है। पैसा दवा खरीद सकता है, लेकिन अकेलेपन का उपचार नहीं कर सकता। अस्पताल शरीर का इलाज कर सकता है, लेकिन उपेक्षा से घायल मन का उपचार परिवार का प्रेम ही कर सकता है। इसलिए वृद्ध कल्याण को केवल सरकारी योजना या पेंशन के दायरे में नहीं देखा जा सकता। परिवार को यह समझना होगा कि वृद्ध माता-पिता को केवल भोजन और दवा नहीं चाहिए; उन्हें बातचीत चाहिए, सम्मान चाहिए, निर्णयों में सहभागिता चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि वे परिवार के लिए अब भी महत्वपूर्ण हैं। आज की युवा पीढ़ी को यह बात विशेष रूप से समझनी होगी कि माता-पिता का वर्तमान हमारे भविष्य का संकेत है। जो व्यवहार हम आज अपने वृद्ध माता-पिता के साथ करेंगे, आने वाला समय उसी व्यवहार को हमारे सामने खड़ा करेगा। आज हम युवा हैं, कल हम वृद्ध होंगे। आज जिन आंखों को हम अनदेखा कर रहे हैं, कल उन्हीं जैसी आंखों में हमारी अपनी संतानों के व्यवहार का प्रतिबिंब दिखाई दे सकता है। इसलिए वृद्धों की सेवा दया नहीं, कर्तव्य है; उनका सम्मान उपकार नहीं, संस्कार है।
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस का वास्तविक संदेश
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस की वास्तविक सार्थकता तभी होगी जब यह एक दिन का आयोजन न रहकर जीवन की स्थायी दृष्टि बने। परिवार में सप्ताह में एक दिन नहीं, प्रतिदिन संवाद हो; समाज में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सक्रिय सामुदायिक मंच हों; स्थानीय संस्थाएं उन्हें ज्ञान, अनुभव और सेवा के अवसर दें; सरकार स्वास्थ्य, पेंशन और सुरक्षा की व्यवस्थाओं को मजबूत करे और युवा पीढ़ी अपनी सोच में परिवर्तन लाए। वृद्धावस्था जीवन की संध्या है, लेकिन संध्या का अर्थ अंधेरा नहीं होता। वह दिनभर की यात्रा के बाद सुनहरी रोशनी का समय भी हो सकती है। आवश्यकता केवल इतनी है कि परिवार उस रोशनी को बुझने न दे। हमारे वृद्ध जीवन के बीते हुए पन्ने नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुभव की खुली किताब हैं। यदि हम उनके अंतिम वर्षों को भय, अकेलेपन और उपेक्षा से भर देंगे तो हम केवल उनके साथ अन्याय नहीं करेंगे, बल्कि अपनी सभ्यता और संस्कारों को भी कमजोर करेंगे। इसलिए आज संकल्प होना चाहिए-वृद्धों के जीवन में अंधेरा नहीं, सम्मान का उजाला हो; अकेलापन नहीं, अपनापन हो; उपेक्षा नहीं, सहभागिता हो और शेष जीवन बोझ नहीं, आनंद एवं गरिमा का उत्सव बने। यही विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस का वास्तविक संदेश और हमारी सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है।

