लेखक: देवानंद सिंह
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर पैदा हुआ विवाद अब केवल परीक्षा रद्द होने या जारी रहने का मामला नहीं रह गया है। यह सवाल राज्य की परीक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णयों और सरकार की विश्वसनीयता से जुड़ गया है। जेपीएससी की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर परीक्षा को लेकर राज्य सरकार के फैसले पर हाई कोर्ट की रोक ने इस पूरे प्रकरण को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। छात्रों के लंबे आंदोलन और सरकार के निर्णय के बाद अब अदालत की दखल ने अभ्यर्थियों के सामने फिर से अनिश्चितता खड़ी कर दी है।
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं पर गहराता संकट
राज्य में भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा प्रक्रिया, प्रश्नपत्र, परिणाम और नियुक्तियों को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन युवाओं को होता है, जो वर्षों तक मेहनत कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। एक परीक्षा उनके लिए केवल प्रश्नपत्र और परिणाम नहीं होती, बल्कि उनके भविष्य, परिवार की उम्मीद और रोजगार की संभावना से जुड़ी होती है।
सरकार ने छात्रों के आंदोलन के दबाव में परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय लिया।
सरकार का तर्क अपनी जगह हो सकता है और यदि किसी परीक्षा में गंभीर अनियमितता के प्रमाण हों तो निष्पक्ष जांच जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी परीक्षा को रद्द करने से पहले पूरी प्रक्रिया को कानूनी और प्रशासनिक रूप से मजबूत बनाया गया था? यदि निर्णय अदालत में चुनौती देने पर तत्काल रोक के घेरे में आ जाता है, तो इससे सरकारी निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हाई कोर्ट ने सरकार के संबंधित आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि परीक्षा को लेकर अंतिम फैसला हो गया है। अभी न्यायिक प्रक्रिया आगे चलेगी और सरकार का जवाब सामने आएगा। इसलिए अभ्यर्थियों को भी किसी निष्कर्ष पर जल्दबाजी में पहुंचने के बजाय अदालत के अंतिम आदेश की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि झारखंड का युवा बार-बार परीक्षा और नियुक्ति के विवादों के बीच फंस रहा है। पहले परीक्षा की तैयारी, फिर परीक्षा, उसके बाद परिणाम और अंत में नियुक्ति हर चरण पर यदि विवाद खड़ा हो जाए तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है। सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, उसे यह समझना होगा कि रोजगार परीक्षाओं में प्रयोग और जल्दबाजी की कोई गुंजाइश नहीं है।
सरकार के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है। एक ओर उसे हाई कोर्ट के समक्ष अपने निर्णय का ठोस आधार रखना होगा, वहीं दूसरी ओर ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनानी होगी जिससे भविष्य में परीक्षाओं को रद्द करने की नौबत ही न आए। परीक्षा संचालन से लेकर प्रश्नपत्र की सुरक्षा, मूल्यांकन, परिणाम और नियुक्ति तक हर स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
झारखंड के युवाओं को आंदोलन नहीं, अवसर चाहिए। उन्हें बार-बार सड़क पर उतरकर अपनी परीक्षा और नियुक्ति बचाने की लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए। सरकार और आयोग दोनों की जिम्मेदारी है कि प्रतियोगी परीक्षाओं को राजनीतिक विवाद से दूर रखकर पूरी पारदर्शिता और विश्वसनीयता के साथ संचालित किया जाए।
हाई कोर्ट की रोक फिलहाल एक कानूनी पड़ाव है, अंतिम समाधान नहीं। असली समाधान तभी होगा जब झारखंड में भर्ती परीक्षाओं की ऐसी विश्वसनीय व्यवस्था बने, जिसमें मेहनत करने वाले युवा को अपने भविष्य के लिए अदालत, आंदोलन और अनिश्चितता के बीच न झूलना पड़े। परीक्षा व्यवस्था का भरोसा टूटना, किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता है।
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आगे की राह
झारखंड सरकार को अब परीक्षा सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। जेपीएससी और अन्य भर्ती आयोगों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित करना आवश्यक है। अधिक जानकारी के लिए झारखंड हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट देखें।
अभ्यर्थियों का विश्वास बहाल करने के लिए समयबद्ध परीक्षा कैलेंडर, सुरक्षित प्रश्नपत्र प्रबंधन और त्वरित परिणाम घोषणा जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य हैं। केवल यही सुनिश्चित कर सकता है कि युवा शक्ति सड़कों पर नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में लगे।

