लेखक: महेन्द्र तिवारी
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं है। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों, राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना से जुड़ा हुआ ऐसा राष्ट्रगीत है, जिसने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाली पीढ़ियों में असाधारण उत्साह पैदा किया था। यही कारण है कि जब इसके गायन के तरीके या इसके किसी हिस्से को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा होता है तो मामला केवल संगीत या शब्दों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय भावना और इतिहास की व्याख्या से जुड़ जाता है।
कांग्रेस का ऐतिहासिक निर्णय और 1937 की परंपरा
19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति ने स्पष्ट किया कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो पद गाए जाएंगे। कांग्रेस ने इसे कोई नया निर्णय नहीं बताया, बल्कि 1937 में लिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय की निरंतरता बताया है। उस समय कांग्रेस ने सार्वजनिक और राष्ट्रीय आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो पदों को ही स्वीकार करने का निर्णय किया था।
वंदे मातरम् पर धार्मिक प्रतीकों की चिंता
कांग्रेस का तर्क है कि शुरुआती दो पदों में देश की धरती के प्रति श्रद्धा, मातृभूमि की वंदना और राष्ट्रीय भावना का ऐसा स्वरूप है जिसे सभी समुदाय सहजता से स्वीकार कर सकते हैं। बाद के पदों में धार्मिक प्रतीकों और देवी स्वरूप से जुड़े संदर्भ आने के कारण उस समय यह चिंता सामने आई थी कि कहीं राष्ट्रगीत का स्वरूप किसी विशेष धार्मिक पहचान से जुड़ा हुआ न माना जाने लगे। इसलिए कांग्रेस ने 1937 में एक ऐसा रास्ता चुना जिसे वह व्यापक राष्ट्रीय एकता के अनुकूल मानती थी।
भाजपा का पूर्ण गायन पर जोर
लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी की ओर से ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण स्वरूप को अधिक प्रमुखता देने की कोशिश की जा रही है। 2026 में संसद में भी इसके गायन को विशेष सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इसके ऐतिहासिक महत्व को नए सिरे से सामने लाया गया। इससे स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठने लगा कि क्या राष्ट्रगीत को उसके पूर्ण स्वरूप में स्वीकार किया जाना चाहिए या फिर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्थापित परंपरा के अनुसार उसके शुरुआती दो पदों को ही पर्याप्त माना जाना चाहिए।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के निर्णय की आलोचना करते हुए इसे राष्ट्रगीत के प्रति अनादर के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरी ओर कांग्रेस का कहना है कि उस पर राष्ट्रगीत का अपमान करने का आरोप लगाना इतिहास को अधूरा देखने के समान है। उसके अनुसार 1937 का निर्णय स्वतंत्रता से पहले राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखकर लिया गया था और आज भी वही भावना प्रासंगिक है। इस प्रकार दोनों पक्ष एक ही गीत को लेकर अलग अलग ऐतिहासिक दृष्टिकोण सामने रख रहे हैं।
राष्ट्रीय प्रतीकों का राजनीतिकरण
वास्तविक समस्या यह है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हथियार बनाने से उनकी गरिमा प्रभावित हो सकती है। ‘वंदे मातरम्’ का इतिहास किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। यह उस स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत है जिसमें अलग अलग विचारधाराओं, भाषाओं, क्षेत्रों और समुदायों के लोगों ने योगदान दिया था। इसलिए इस गीत को लेकर बहस हो तो उसमें इतिहास, तथ्य और संवैधानिक मर्यादा का स्थान आरोप और राजनीतिक कटुता से ऊपर होना चाहिए।
राष्ट्रभक्ति की असली कसौटी
यह भी समझना जरूरी है कि पहले दो पदों का गायन अपने आप में राष्ट्रभावना की कमी का प्रमाण नहीं हो सकता। इसी प्रकार पूरे गीत के प्रति सम्मान रखने वाले व्यक्ति को केवल इसलिए संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए कि वह पूर्ण स्वरूप के समर्थन में है। राष्ट्रभक्ति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर करना उचित नहीं कि कोई व्यक्ति राष्ट्रगीत की कितनी पंक्तियां गाता है। राष्ट्र के प्रति उसका आचरण, संविधान के प्रति उसकी निष्ठा और देश के नागरिकों के प्रति उसका व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
नई पीढ़ी तक पहुंचाएं इतिहास
आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘वंदे मातरम्’ को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने के बजाय उसके ऐतिहासिक योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। युवाओं को बताया जाए कि यह गीत किस दौर में राष्ट्रीय जागरण का प्रतीक बना, स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे किस भावना से अपनाया और स्वतंत्र भारत ने इसे राष्ट्रगीत का सम्मान क्यों दिया।
संतुलित रास्ता ही श्रेयस्कर
कांग्रेस का दो पदों पर कायम रहना एक राजनीतिक निर्णय है, लेकिन इसे राष्ट्रभक्ति की अंतिम कसौटी बनाना उचित नहीं होगा। इसी तरह पूरे गीत के गायन को राष्ट्रभक्ति का एकमात्र प्रमाण मानना भी उचित नहीं है। भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। इसलिए ‘वंदे मातरम्’ को लेकर सबसे बेहतर रास्ता वही होगा जिसमें इतिहास का सम्मान हो, राष्ट्रीय भावना बनी रहे और किसी भी भारतीय नागरिक को उसकी आस्था या पहचान के कारण राष्ट्र से अलग महसूस न कराया जाए। राष्ट्रगीत का वास्तविक सम्मान तभी होगा जब उसके साथ जुड़ी मातृभूमि की भावना राजनीति से ऊपर उठकर प्रत्येक भारतीय के मन में जीवित रहे। वंदे मातरम् का इतिहास जानने के लिए विकिपीडिया पढ़ें।

