बीच सफर में बदलाव क्यों? छात्राओं का आक्रोश जायज़ है देवानंद सिंह
राष्ट्र संवाद संवाददाता
झारखंड की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों असमंजस और असंतोष की भट्ठी में झुलस रही है। कल जमशेदपुर के बिष्टुपुर में उस समय असाधारण दृश्य देखने को मिला, जब कॉलेजों में पढ़ रही छात्राओं ने राज्य के शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन को घेरकर विरोध दर्ज कराया। मंच तो अभिनंदन का था, लेकिन बाहर की तस्वीर गुस्से, बेचैनी और नाराजगी की थी। छात्राओं ने हंगामे के बीच मांगपत्र सौंपते हुए साफ कहा — “हमें कॉलेज बदलना मंजूर नहीं!”

मामला है नई शिक्षा नीति (NEP) के जल्दबाज़ी में लागू करने का। इस नीति के तहत राज्य सरकार ने निर्देश जारी किया है कि इंटर कॉलेजों की पढ़ाई अब स्कूलों में करवाई जाएगी। यानी, वे छात्राएं जो अभी कॉलेज में 12वीं की पढ़ाई कर रही हैं, उन्हें छह महीने बाद स्कूल में शिफ्ट कर दिया जाएगा। ये वही छात्राएं हैं, जिनकी पढ़ाई वर्ष 2026 में पूरी होनी है — वही साल जब यह नीति लागू होनी चाहिए थी।

यह समझ से परे है कि सरकार ने क्यों उन छात्राओं पर दबाव बनाया है, जो पहले से अपनी पढ़ाई के अंतिम चरण में हैं। शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों की गुणवत्ता और सुविधा बढ़ाना होना चाहिए, न कि उनके मनोबल को तोड़ना। क्या कोई भी यात्री सफर के अंतिम स्टेशन से पहले ही गाड़ी बदलना चाहेगा, जब वह लगभग मंज़िल पर पहुंच चुका हो?

छात्राओं की मांग एकदम व्यावहारिक और तार्किक है। वे सिर्फ इतना चाहती हैं कि उन्हें उसी संस्थान से अपनी पढ़ाई पूरी करने दी जाए, जहां उन्होंने 12वीं की शुरुआत की थी। बदलाव की प्रक्रिया को एक नियत और स्पष्ट समय सीमा के तहत लागू किया जाना चाहिए, न कि आधे रास्ते में नियम बदलकर।

सरकार को यह भी समझना होगा कि शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम या पाठशालाओं तक सीमित नहीं है, यह भरोसे, निरंतरता और स्थिरता से भी जुड़ी है। जब विद्यार्थी को यह आश्वासन नहीं होगा कि वह जहां से पढ़ाई शुरू कर रहा है, वहीं से उसे पूरी करने दी जाएगी, तब उसकी शैक्षणिक यात्रा में अनिश्चितता और मानसिक तनाव पैदा होगा।

कल जो आवाज़ें माइकल जॉन ऑडिटोरियम के बाहर गूंजीं, वे सिर्फ विरोध नहीं थीं — वे भविष्य के प्रति चिंता की पुकार थीं। सरकार को चाहिए कि वह इस निर्णय की समीक्षा करे और मौजूदा छात्राओं को उसी संस्थान में पढ़ाई पूरी करने की छूट दे।
नई शिक्षा नीति को लेकर संवाद ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़रूरी है — संवेदनशीलता।

