कांग्रेस के राजद के आगे सिर झुकाने की रणनीतिक विवशता के मायने?
देवानंद सिंह
23 अक्टूबर की सुबह पटना का होटल मौर्या एक बार फिर सियासी हलचल का केंद्र बन गया। आमतौर पर ऐसे आयोजनों में मीडिया को अंदाज़ा होता है कि मंच पर क्या होने वाला है, लेकिन इस बार हवा कुछ और ही थी। बाहर लगे पोस्टरों से लेकर अंदर बैठे नेताओं के चेहरे तक, सब कुछ एक अलग कहानी कह रहे थे। पोस्टरों पर लिखा था — तेजस्वी हमारा चेहरा, बिहार की उम्मीद। संदेश साफ़ था — महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव होंगे।
पर इस ऐलान से ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि कांग्रेस, जिसने पिछले कुछ महीनों में पहली बार राजद के मुकाबले अपने दमख़म की झलक दिखानी शुरू की थी, अचानक से एक बार फिर झुक गई। ऐसा क्यों हुआ? क्या कांग्रेस ने वाकई अपने राजनीतिक आत्मसम्मान से समझौता किया, या फिर यह एक सोचा-समझा कदम था ताकि चुनावी नुकसान से बचा जा सके?
पटना में 23 अक्टूबर की सुबह जब कांग्रेस और राजद की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस का आमंत्रण मीडिया को मिला, तो किसी को अंदाज़ा नहीं था कि मंच पर कौन-कौन होगा, लेकिन जैसे ही राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत होटल मौर्या में दाखिल हुए, समीकरण बदलते दिखे। गहलोत, जो पार्टी में राहुल गांधी के सबसे भरोसेमंद और अनुभवी रणनीतिकारों में गिने जाते हैं, बिहार में कांग्रेस के इस यू-टर्न की प्रतीक बन गए।
कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने कुछ ही दिन पहले राजद पर तीखे बयान दिए थे। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस अब किसी की बैसाखी पर नहीं चलेगी, अपनी ताकत पर मैदान में उतरेगी। राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा के दौरान जब पत्रकारों ने उनसे तेजस्वी यादव को सीएम उम्मीदवार घोषित करने पर सवाल किया, तो उन्होंने चुप्पी साध ली, यह संकेत था कि कांग्रेस अब अपने दम पर बिहार की राजनीति में पहचान बनाना चाहती है, लेकिन दो दिन के भीतर सारा रुख बदल गया। मंच पर अशोक गहलोत ने खुद यह घोषणा की कि महागठबंधन की ओर से चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, और बस, बिहार की राजनीति में एक बार फिर पुराना दृश्य दोहराया गया, कांग्रेस पीछे और राजद आगे।
ऐसे में, सवाल यह उठता है कि आखिर कांग्रेस ने अपना स्टैंड इतनी जल्दी क्यों बदला? जानकारों के मुताबिक, इसके पीछे दो स्तरों पर वजहें हैं, पहला, राजनीतिक विवशता और दूसरा, चुनावी गणित। पहली वजह यह है कि कांग्रेस को इस बात का डर सताने लगा था कि अगर, राजद नाराज़ हो गया, तो महागठबंधन का वोट ट्रांसफर खतरे में पड़ सकता है। बिहार में मुस्लिम-यादव समीकरण आज भी तेजस्वी यादव के पक्ष में सबसे मज़बूत है। कांग्रेस जानती है कि इस वोट बैंक के एक बड़े हिस्से का समर्थन उसे केवल तभी मिलता है जब राजद उसका साथ दे। अगर, राजद ने खीझ में यह वोट ट्रांसफर रोक दिया, तो कांग्रेस के उम्मीदवारों की लुटिया डूबना तय थी।
दूसरी वजह यह भी बताई जा रही है कि राहुल गांधी नहीं चाहते थे कि बिहार में विपक्षी एकता की तस्वीर बिगड़े। 2024 के आम चुनाव के बाद कांग्रेस पहले से ही राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन को संभालने में लगी है। ऐसे में, अगर, बिहार में कांग्रेस और राजद आमने-सामने आते, तो इसका असर दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता था। इसलिए दिल्ली से संकेत गया। फिलहाल, झुक जाओ, वक्त आने पर हिसाब बराबर करेंगे। दरअसल, यह कोई पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने राजद के आगे सिर झुकाया हो। विशेषज्ञों का कहना है कि 1990 के बाद से कांग्रेस कभी भी बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने का साहस नहीं जुटा पाई। उसने हमेशा सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए राजद की बैसाखी का सहारा लिया। नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे उसका संगठन और वोट बैंक दोनों कमजोर हो गए। अगर, हम बिहार के राजनीतिक इतिहास को देखें तो इस कथन में सच्चाई झलकती है। 1990 में जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, तब कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए भी उनके साथ अप्रत्यक्ष सहयोग किया। 1997 में जब लालू ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल बनाई, तब भी कांग्रेस ने सत्ता के लिए उनके साथ गठबंधन बनाए रखा।
उस दौर में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी थे। कहा जाता है कि केसरी ने लालू को समर्थन देकर यह उम्मीद जताई थी कि बिहार में मुस्लिम-दलित वोटों पर कांग्रेस की पकड़ बनी रहेगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा। कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक धीरे-धीरे राजद में समा गया। वहीं, शहरी, ऊपरी और युवा वर्ग बीजेपी की ओर खिसकता चला गया। यानी, कांग्रेस ने खुद ही अपनी राजनीतिक ज़मीन खोदी और फिर उसी में गिरती चली गई।
जब बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने जुलाई में कहा था कि अब कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ेगी”, तो पार्टी के कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा दिखी थी। सोशल मीडिया पर #CongressRisingInBihar जैसे हैशटैग चलने लगे थे। स्थानीय कार्यकर्ताओं को लगा कि तीन दशक बाद पार्टी अपने पैरों पर खड़ी होने जा रही है, लेकिन 23 अक्टूबर के बाद माहौल ठंडा पड़ गया।
पटना के एक युवा कांग्रेसी नेता ने मीडिया से बातचीत में कहा, हमने सोचा था कि इस बार पार्टी की आवाज़ सुनी जाएगी, लेकिन फिर वही कहानी दोहराई गई। ऊपर से आदेश आया और सब बदल गया। राजद के दबाव में कांग्रेस का झुकना इस बात का संकेत है कि पार्टी आज भी निर्णय लेने में आत्मनिर्भर नहीं हो पाई है। बिहार में कांग्रेस का संगठन बेहद कमजोर है। जिलों में सक्रिय कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार घट रही है। युवाओं का झुकाव क्षेत्रीय पार्टियों या बीजेपी की ओर बढ़ गया है। ऐसे में, राजद के साथ गठबंधन बनाए रखना कांग्रेस की चुनावी मजबूरी भी बन गई है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस के पास दो ही विकल्प हैं, या तो वह राजद के साए में रहकर धीरे-धीरे पुनर्जीवित होने की कोशिश करे, या फिर एक साहसिक कदम उठाकर स्वतंत्र पहचान बनाए, लेकिन दूसरा रास्ता जोखिम भरा है। बिहार की राजनीति जातिगत समीकरणों पर टिकी है। यादव और मुसलमान वोट राजद के साथ हैं।
ऊपरी जातियां और पिछड़े वर्ग का बड़ा हिस्सा एनडीए के साथ। दलित और महादलित वोट जे.डी.यू. और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) में बंटे हुए हैं। ऐसे में, कांग्रेस के पास कोई स्पष्ट जातीय आधार नहीं बचा है। उसकी अपील केवल शहरी, पढ़े-लिखे या पारंपरिक सेक्युलर वोटरों तक सीमित हो गई है। यही वजह है कि पार्टी को मजबूरन राजद के साथ गठबंधन करना पड़ता है, ताकि कम से कम सीटों का गणित उसे हाशिये पर न धकेल दे।
तेजस्वी यादव अब बिहार की विपक्षी राजनीति का निर्विवाद चेहरा बन चुके हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने महागठबंधन को लगभग जीत के करीब पहुंचा दिया था। उनके नेतृत्व में राजद अब केवल लालू यादव की पार्टी नहीं रही, बल्कि युवाओं के बीच एक नई पहचान बना रही है, हालांकि कांग्रेस के लिए यही सबसे बड़ा जोखिम भी है। तेजस्वी के उभार के बीच कांग्रेस पूरी तरह हाशिये पर चली जा रही है। महागठबंधन में सीट बंटवारे की बात हो या रणनीति निर्धारण। अंतिम फैसला राजद का होता है। कांग्रेस केवल सहयोगी की भूमिका में रह जाती है।
इस बार भी यही हुआ। गहलोत की मौजूदगी में भले ही कांग्रेस ने एकता का संदेश दिया हो, लेकिन अंदरखाने में असंतोष की लहर है। कई कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि तेजस्वी के चेहरे पर चुनाव लड़ने से कांग्रेस के अपने नेता और चेहरों की पहचान धुंधली पड़ जाएगी। राजद बहुत अच्छी तरह समझती है कि कांग्रेस को कहां और कैसे दबाव में लाना है। बिहार के हर राजनीतिक सौदे में राजद यह सुनिश्चित करती है कि कांग्रेस उसकी शर्तों पर खेले। बदले में वह उसे साझेदारी का प्रतीकात्मक सम्मान दे देती है। विशेषज्ञों के अनुसार, राजद की रणनीति हमेशा यह रही है कि कांग्रेस को बराबरी का पार्टनर न बनने दिया जाए। यही कारण है कि जब-जब कांग्रेस ने अपने पैर फैलाने की कोशिश की, राजद ने सीट बंटवारे या नेतृत्व के सवाल पर उसे झुका दिया। कांग्रेस, जो कभी बिहार में सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार थी, अब अनुयायी बन चुकी है।
राहुल गांधी का दृष्टिकोण राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को बचाए रखना है, लेकिन इसके लिए उन्हें राज्यों में कई बार समझौते करने पड़ते हैं। राजस्थान, झारखंड, महाराष्ट्र और अब बिहार — हर जगह कांग्रेस को सहयोगी दलों के आगे झुकना पड़ा है। बिहार का मामला इसलिए खास है, क्योंकि यहां पार्टी का अस्तित्व ही गठबंधन पर निर्भर है। राहुल गांधी का यह दांव इस सोच पर टिका है कि अगर तेजस्वी के चेहरे पर महागठबंधन की जीत होती है, तो कांग्रेस को सत्ता में कुछ हिस्सा और राजनीतिक ऑक्सीजन दोनों मिल जाएंगे, लेकिन यही दांव अगर उल्टा पड़ा, तो पार्टी और भी कमजोर हो सकती है।
अगर, कांग्रेस वाकई बिहार में फिर से खड़ी होना चाहती है, तो उसे तीन स्तरों पर काम करना होगा। पहला, जिला और ब्लॉक स्तर पर नई नेतृत्व टीम तैयार करनी होगी।
दूसरा, जनता को यह समझाना होगा कि कांग्रेस सिर्फ राजद का छोटा संस्करण नहीं है। तीसरा, युवाओं और महिलाओं के मुद्दों पर सक्रिय अभियान चलाना होगा ताकि वैकल्पिक राजनीति की छवि बने। राजनीति में स्थायी गठबंधन नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। अगर, कांग्रेस बार-बार झुकती रही, तो धीरे-धीरे उसका अस्तित्व केवल सहयोगी दल तक सीमित रह जाएगा। कुल मिलाकर, पटना के होटल मौर्या में जो हुआ, वह महज़ एक राजनीतिक घोषणा नहीं थी, बल्कि बिहार की कांग्रेस के लिए एक प्रतीकात्मक क्षण था।
यह क्षण बताता है कि पार्टी अभी भी अपने अतीत की छाया से बाहर नहीं निकल पाई है। हो सकता है, राहुल गांधी और अशोक गहलोत का यह कदम वास्तविकता को स्वीकार करने का हो — यानी प्रोग्राम ओवर प्राइड, लेकिन जनता के बीच जो संदेश गया, वह यह था कि कांग्रेस फिर से राजद के सामने झुक गई। बिहार की राजनीति में यह झुकना केवल सीटों का नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक वर्चस्व का मामला है, और जब तक कांग्रेस इस वर्चस्व को चुनौती देने की हिम्मत नहीं जुटाती, तब तक पटना का हर पोस्टर, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, और हर चुनावी मंच यही कहता रहेगा, तेजस्वी आगे, कांग्रेस पीछे।

