लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर में साधु-संतों के अपमान का आरोप लगाकर विहिप ने जताया विरोध और कार्रवाई की मांग की है।
विहिप ने जताया विरोध: संसद में भगवा वस्त्र पर आपत्ति
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) लंबे समय से धार्मिक प्रतीकों और संतों के सम्मान की रक्षा के लिए मुखर रहा है। हालिया घटनाक्रम में संसद परिसर में सांसद पप्पू यादव द्वारा भगवा वस्त्र धारण करने को लेकर संत समाज में गहरा रोष व्याप्त है। विहिप का मानना है कि भगवा वस्त्र सनातन परंपरा का अभिन्न अंग है और इसका राजनीतिक मंच पर उपयोग धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।
जमशेदपुर, 31 जुलाई: विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के सिंहभूम विभाग मंत्री अरुण सिंह ने संसद परिसर में सांसद पप्पू यादव द्वारा भगवा वस्त्र धारण किए जाने और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उपस्थिति को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटना से साधु-संतों और सनातन समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।
अरुण सिंह ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि इस घटना को लेकर देशभर में संत समाज और सनातन धर्मावलंबियों में रोष है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके नेताओं ने पहले भी हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर आपत्तिजनक रुख अपनाया है।
विहिप नेता ने कहा कि यदि किसी धर्म विशेष की वेशभूषा का सम्मान किया जाता है तो सभी धर्मों के प्रतीकों और संतों का भी समान सम्मान होना चाहिए। उन्होंने इस मामले में सार्वजनिक रूप से माफी की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की घटनाएं जारी रहीं तो संगठन लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराएगा।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और कानूनी पहलू
इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। भाजपा नेताओं ने विहिप की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए धार्मिक प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है। वहीं, कांग्रेस ने इसे राजनीतिक स्टंट करार दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि संसद परिसर में धार्मिक वेशभूषा पहनने पर कोई स्पष्ट कानून नहीं है, लेकिन सदन की मर्यादा भंग होने पर कार्रवाई संभव है।
विहिप के इतिहास और उद्देश्यों के बारे में अधिक जानकारी के लिए विश्व हिंदू परिषद देखें।
मुख्य मांगें
- सांसद पप्पू यादव से सार्वजनिक माफी की मांग
- संसद में धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग पर स्पष्ट दिशानिर्देश
- भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त नियम
इस बीच, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने धार्मिक सहिष्णुता और संवैधानिक मर्यादा के बीच संतुलन स्थापित करने पर जोर दिया है। उनका कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी धर्म विशेष के प्रतीकों का अपमान उचित नहीं है। संसद जैसी सर्वोच्च संस्था में ऐसे कृत्य लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं।
विहिप ने स्पष्ट किया है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो देशव्यापी लोकतांत्रिक आंदोलन चलाया जाएगा। संत समाज के प्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाई है। आने वाले दिनों में यह मामला संसद के दोनों सदनों में गूंज सकता है।

