आधुनिक शिक्षा और विकास के साथ अपनी भाषा, संस्कृति, कला और पहचान को बचाना भी उतना ही आवश्यक है: डीसी
मृत्युंजय बर्मन
राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला
ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक परिधानों की रंगत और छऊ से लेकर मुंडारी नृत्य तक की मनमोहक प्रस्तुतियों ने नगर भवन, सरायकेला को झारखंड की आदिवासी संस्कृति के जीवंत मंच में बदल दिया। विश्व आदिवासी दिवस पर आयोजित जिला स्तरीय समारोह में संस्कृति, भाषा और परंपरा के संरक्षण के साथ जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा आदिवासी समाज के सशक्तीकरण का संकल्प दोहराया गया।
सिंहभूम लोकसभा सांसद जोबा मांझी की अध्यक्षता में आयोजित समारोह से पूर्व उपायुक्त नितिश कुमार सिंह, एसपी मनोज स्वर्गियारी एवं अन्य पदाधिकारियों ने सिदो-कान्हू पार्क, बिरसा चौक तथा समाहरणालय परिसर स्थित महापुरुषों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर शहीदों के संघर्ष और बलिदान को नमन किया। इसके बाद दीप प्रज्वलित कर मुख्य कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
परियोजना निदेशक आईटीडीए उषा मुंडू ने स्वागत संबोधन किया। स्थानीय कलाकारों ने सरायकेला छऊ, नटुआ, मानभूम छऊ, मुंडारी और महिला पाइका नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से स्थानीय कला एवं लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।
उपायुक्त नितिश कुमार सिंह ने कहा कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन आदिवासी समाज की विशिष्ट पहचान है। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी जरूरी है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कौशल विकास के अवसर बढ़ाने के साथ युवाओं को आगे लाने और बालिकाओं की शिक्षा व महिलाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात कही।
उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा और विकास के साथ अपनी भाषा, संस्कृति, कला और पहचान को बचाना भी उतना ही आवश्यक है। स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक क्षमता के उपयोग से विकास को अधिक समावेशी बनाया जा सकता है।
समारोह में अपर उपायुक्त जयवर्धन कुमार, एसडीओ अभिनव प्रकाश, सिविल सर्जन सरयू प्रसाद राय सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी, जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में आम लोग उपस्थित रहे।

