मनरेगा की आत्मा पर सीधा प्रहार है वीबी-जी राम जी’ बिल
देवानंद सिंह
नीति आयोग के दस्तावेज़ों और सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों की भाषा चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, लेकिन भारत के ग्रामीण जीवन की वास्तविक धड़कन आज भी खेत, मज़दूरी और अनिश्चित रोज़गार से ही तय होती है। इसी ग्रामीण यथार्थ के बीच महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा ने पिछले दो दशकों में न केवल एक योजना के रूप में, बल्कि एक अधिकार आधारित सामाजिक सुरक्षा कवच के रूप में अपनी पहचान बनाई। यही कारण है कि नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज़ ने 2016 में इसे भारत का सबसे मौलिक और नवोन्मेषी कार्यक्रम बताया था और पूरी दुनिया को इससे सीखने की सलाह दी थी।
लेकिन अब वही मनरेगा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मोदी सरकार ने 20 साल पुराने इस क़ानून की जगह एक नया विधेयक पेश किया है, जिसे ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’, नाम दिया गया है, जिसे संक्षेप में ‘वीबी-जी राम जी’ कहा जा रहा है। नाम बदलने के साथ-साथ इस नए अधिनियम में कई ऐसे संरचनात्मक बदलाव प्रस्तावित हैं, जिन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था, संघीय ढांचे और सामाजिक न्याय को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मनरेगा को समझने के लिए इसे केवल एक रोज़गार योजना के रूप में देखना अपर्याप्त होगा। यह भारत का पहला ऐसा क़ानून था जिसने ग्रामीण परिवारों को रोज़गार की कानूनी गारंटी दी। साल 2005 में यूपीए सरकार द्वारा लाए गए इस अधिनियम के तहत हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन अकुशल काम की गारंटी दी गई। यदि 15 दिनों के भीतर काम न मिले, तो बेरोज़गारी भत्ते का प्रावधान रखा गया। यह व्यवस्था अपने आप में क्रांतिकारी थी, क्योंकि इसने रोज़गार को सरकार की कृपा से निकालकर नागरिक का अधिकार बना दिया। राजस्थान जैसे सूखा-प्रवण राज्यों में, जहां गांव के लोग कभी सरपंचों के दरवाज़े पर हाथ जोड़कर काम मांगते थे, मनरेगा ने शक्ति-संतुलन को बदला। अब मज़दूर मांग करता था, और सरकार जवाबदेह होती थी।मनरेगा की सबसे बड़ी प्रासंगिकता कोविड-19 महामारी के दौरान सामने आई। जब शहरों से लाखों मज़दूर बेरोज़गार होकर गांव लौटे, तब मनरेगा ही वह अंतिम सहारा था जिसने ग्रामीण भारत को पूरी तरह टूटने से बचाया। 2020-21 में मनरेगा का बजट रिकॉर्ड 1.11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। रोज़गार की मांग अभूतपूर्व स्तर पर थी, और यह साफ हो गया कि संकट के समय मनरेगा केवल रोज़गार योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन का सामाजिक स्तंभ बन चुका है।
सरकार का तर्क है कि नया अधिनियम ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के अनुरूप है और इसमें रोज़गार के दिन बढ़ाकर 125 दिन किए गए हैं। पहली नज़र में यह बदलाव सकारात्मक लग सकता है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या यह रोज़गार अब भी गारंटीड रहेगा? नए बिल में सबसे विवादास्पद प्रावधान यह है कि अब योजना पूरे देश में स्वतः लागू नहीं होगी, यह तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा कि किन राज्यों और किन इलाक़ों में यह लागू होगी, केंद्र और राज्यों के बीच खर्च का अनुपात 60:40 कर दिया गया है। यह बदलाव मनरेगा की आत्मा पर सीधा प्रहार है।
अब तक मनरेगा में मज़दूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी, जबकि सामग्री और प्रशासनिक खर्च में राज्यों की सीमित भागीदारी थी। इससे राज्यों को रोज़गार की मांग बढ़ाने में झिझक नहीं होती थी, लेकिन नए प्रस्ताव में राज्यों को कुल खर्च का 40% उठाने की बाध्यता है। ऐसे समय में जब अधिकांश राज्य पहले से ही वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं, यह बदलाव उन्हें योजना से दूर कर सकता है। जानकार कहते हैं कि अगर, रोज़गार की मांग बढ़ेगी, तो राज्यों का खर्च भी बढ़ेगा। ऐसे में, कई राज्य या तो योजना को सीमित करेंगे या उसमें रुचि ही नहीं लेंगे।इसका सीधा अर्थ है कि रोज़गार की गारंटी काग़ज़ों तक सीमित हो सकती है।
मनरेगा का एक अहम पक्ष यह था कि राज्यों की प्रशासनिक भूमिका। ग्राम पंचायतों से लेकर ज़िला स्तर तक स्थानीय शासन को इसमें निर्णायक स्थान मिला। इससे लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को बल मिला। नए बिल में यह संतुलन बिगड़ता दिखता है। सेक्शन 5(1) के तहत यह तय करने का अधिकार केंद्र को दिया गया है कि योजना कहां लागू होगी और कितनी राशि दी जाएगी। इसका मतलब है कि अब रोज़गार की गारंटी बजट पर निर्भर होगी, अधिकार पर नहीं। यह बदलाव मनरेगा को अधिकार आधारित योजना से डिस्क्रेशनरी स्कीम में बदलने का संकेत देता है।
मनरेगा का एक बड़ा सामाजिक योगदान यह रहा है कि इसमें 56% से अधिक भागीदारी महिलाओं की है, अनुसूचित जाति और जनजाति को प्राथमिकता दी गई,
छोटे और सीमांत किसानों की निजी ज़मीन पर भी काम की अनुमति दी गई, लेकिन नए प्रस्ताव में योजना को जल संसाधन, सड़क, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण आवास से जोड़ा जा रहा है। ऐसे क्षेत्र, जिनके लिए पहले से अलग मंत्रालय और योजनाएं मौजूद हैं। इससे आशंका है कि मनरेगा का बजट ग्रामीण रोज़गार से हटकर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में डायवर्ट किया जाएगा। इसका नुकसान सबसे पहले उन्हीं अकुशल मज़दूरों को होगा, जिनके लिए यह योजना बनी थी।
विवाद का एक पहलू प्रतीकात्मक भी है। कांग्रेस का आरोप है कि इस नए अधिनियम से महात्मा गांधी का नाम हटाया गया है। यह केवल नाम का सवाल नहीं है, बल्कि उस विचारधारा का भी है जिसमें गांव, श्रम और आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखा गया था। आजादी के बाद यह पहला मौका है, जब किसी राष्ट्रीय योजना से गांधी का नाम हटाया गया है। यह बदलाव उस वैचारिक दूरी को भी दर्शाता है, जो मौजूदा शासन और गांधीवादी सोच के बीच बढ़ती जा रही है।
यह सच है कि मनरेगा भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूता नहीं रहा। फर्जी जॉब कार्ड, बिना काम भुगतान और कागज़ी रोज़गार जैसी शिकायतें सामने आईं, लेकिन इन समस्याओं का समाधान योजना को कमज़ोर करना नहीं, बल्कि उसे पारदर्शी बनाना था। आरटीआई, सोशल ऑडिट, आधार आधारित भुगतान और डिजिटल ट्रैकिंग जैसे उपायों ने मनरेगा को पहले से कहीं अधिक जवाबदेह बनाया। यह दिखाता है कि सुधार संभव था, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति होती।
कुल मिलाकर, मनरेगा भारत के ग्रामीण समाज के लिए केवल रोज़गार योजना नहीं रही। यह पलायन रोकने का साधन बनी, महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता मिली, दलित-आदिवासी समुदाय को गरिमा के साथ काम करने का अवसर मिला और गांवों में टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण हुआ। नया अधिनियम अगर सचमुच विकसित भारत की ओर ले जाना चाहता है, तो उसे मनरेगा की आत्मा—रोज़गार की गारंटी, अधिकार आधारित ढांचा और संघीय संतुलन को बनाए रखना होगा।
अन्यथा यह आशंका गहरी है कि ‘वीबी-जी राम जी’ एक ऐसी योजना बनकर रह जाएगी, जो नाम में बड़ी, लेकिन असर में सीमित होगी, और भारत का ग्रामीण मज़दूर एक बार फिर अनिश्चितता के उसी चक्र में लौट जाएगा, जिससे बाहर निकालने के लिए मनरेगा बना था। आज सवाल यह नहीं है कि मनरेगा में सुधार होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारत अपने सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा कानून को अधिकार से हटाकर अनुदान में बदलने को तैयार है?

