नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होने वाले तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों को अयोग्य करार देने की मांग वाली याचिका पर जल्द निर्णय लेंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मौखिक रूप से कहा कि वह अभिषेक बनर्जी की याचिका को जीवित रखना चाहेगा और उठाए गए मुद्दों पर हुई प्रगति की निगरानी करना चाहेगा. साथ ही और उठाए गए मुद्दों पर हुई प्रगति की निगरानी करना चाहेगा. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की बेंच ने कहा कि उन्हें पता है कि वे लोकसभा अध्यक्ष को निर्देश नहीं दे सकते, लेकिन अदालत महज उन्हें मामले के शीघ्र समाधान के लिए स्मरण कराना चाहते हैं.
यह याचिका पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी ने दायर की है. याचिका में लोकसभा अध्यक्ष और महासचिव के साथ-साथ 20 बागी सांसदों को मामले में प्रतिवादी बनाया गया है. वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अभिषेक का प्रतिनिधित्व किया. वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लोकसभा अध्यक्ष का प्रतिनिधित्व किया.
सुनवाई के दौरान कल्याण बनर्जी ने कहा कि लोकसभा स्पीकर ने अगस्त में बागी सांसदों को नोटिस जारी किया था लेकिन उन्होंने शुरुआती 14 दिन के समय में अपने जवाब दाखिल नहीं किए थे. बेंच को बताया गया कि स्पीकर ने बाद में जवाब दाखिल करने का समय 22 सितंबर तक बढ़ा दिया था. हालांकि सांसदो ने फिर से समय बढ़ाने की मांग की है.
लोकसभा अध्यक्ष की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं पर पहले ही नोटिस जारी कर चुके हैं. मेहता ने कहा, लोकसभा अध्यक्ष को पता है कि उन्हें क्या करना है. वह मामले की गंभीरता को समझते हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, हमें उम्मीद है कि जिस मामले में जल्द फैसले की जरूरत है, उस पर तेजी से कार्रवाई होगी. मामले की प्रकृति ही ऐसी है कि उस पर जल्द निर्णय लेने की जरूरत है. हम महज उन्हें मामले के शीघ्र समाधान का स्मरण दिलाना चाहते हैं.
इसके बाद मेहता ने दलील दी, मैं खुद एक सवाल पूछना चाहता हूं. क्या एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति दूसरे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को उसके संवैधानिक कर्तव्य की याद दिला सकता है. उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में अदालत को लोकसभा अध्यक्ष के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं करनी चाहिए. न्यायमूर्ति बागची ने कहा, हम बस प्राधिकार को याद दिला रहे हैं कि वे 10वीं अनुसूची के बेहद अहम होने को ध्यान में रखते हुए इस मामले का जल्द समाधान सुनिश्चित करें. हो सकता है कि हम कोई कड़ा निर्देश न दें, लेकिन केशम मेघचंद्र सिंह मामले में आए निर्णय को ध्यान में रखते हुए, इस मुद्दे का जल्द समाधान किया जाए.
केशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (2020) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि अध्यक्ष को दल-बदल के मामलों पर उचित समय के भीतर बेहतर होगा कि तीन महीने के अंदर निर्णय करना चाहिए. न्यायमूर्ति बागची ने मेहता से अध्यक्ष के फैसले के बारे में एक समय-सीमा तय करने को कहा. हालांकि, मेहता ने कहा कि वह कोई वादा नहीं कर सकते.
मेहता ने कहा, मैं कोई वादा नहीं करूंगा. मैं इस पर विचार करूंगा, हो सकता है कि इस मामले में कोर्ट की निगरानी न्यायसंगत न हो. मेरा आग्रह है कि अध्यक्ष के लिए समय सीमा तय न की जाए. अदालत ने बागी सांसदों की यह दलील दर्ज कर ली कि वे चार हफ्ते के अंदर जवाब दाखिल करेंगे और मामले की सुनवाई टाल दी. पूर्व में अदालत ने अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति जताई थी और 20 सांसदों को नोटिस जारी किया था.
तृणमूल नेता ने अपनी याचिका में बागी सांसदों के खिलाफ शुरू की गई अयोग्यता की कार्यवाही पर निर्णय लेने में हुई कथित देरी को चुनौती दी है. उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से संविधान के दल-बदल विरोधी प्रावधानों के अनुसार अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने का निर्देश देने का अदालत से अनुरोध किया है.

