नई दिल्ली. साइबर अपराध के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए मुकदमे की सुनवाई तेजी से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है. सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने आरोपी के खिलाफ समान प्रकृति के पूर्व आपराधिक मामलों का उल्लेख करते हुए साइबर अपराध को आसान पैसे से जुड़ी लत जैसा बताया. अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी करीब एक साल से हिरासत में है, लेकिन इस अवधि में केवल एक गवाह से पूछताछ हुई है. सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को आज से छह महीने के भीतर पूरा करने को कहा है.
मामला पिंटू दास उर्फ पिंटू कुमार दास बनाम झारखंड राज्य, डायरी नंबर 51817/2026 का है. आरोपी देवघर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-द्वितीय सह साइबर क्राइम विशेष अदालत में लंबित साइबर अपराध मामले में आरोपी है. उसने झारखंड हाई कोर्ट द्वारा जमानत से इनकार किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था.
मोबाइल और सिम कार्ड के साथ पकड़े जाने का मामला
मामले के अनुसार, आरोपी और उसके साथ एक अन्य आरोपी को सिम कार्ड और मोबाइल फोन के साथ पकड़ा गया था. जांच के दौरान जब्त मोबाइल फोन से ऐसी सामग्री मिलने की बात सामने आई, जिसमें फ्लिपकार्ट कस्टमर केयर, अमेजन कस्टमर केयर, एयरटेल पेमेंट बैंक, फोनपे कस्टमर केयर और प्रधानमंत्री किसान योजना के नाम पर कथित धोखाधड़ी से संबंधित सामग्री शामिल थी.
झारखंड हाई कोर्ट ने इसी सामग्री को जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना था. हाई कोर्ट ने पाया था कि जब्त मोबाइल से मिली सामग्री आरोपी की कथित साइबर गतिविधियों से जुड़ी दिखाई देती है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने 10 जुलाई 2026 को उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. साथ ही अदालत ने उम्मीद जताई थी कि मुकदमे की सुनवाई छह महीने में पूरी कर ली जाएगी.
इन धाराओं में दर्ज है मामला
आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. इनमें धारा 111(2), 111(3), 111(4), 319(2), 318(4), 338, 336(3), 340(2) और 61(2) शामिल हैं. इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66बी, 66सी और 84सी के तहत भी आरोप लगाए गए हैं.
मामला साइबर क्राइम केस नंबर 160/2025 से संबंधित है, जो देवघर साइबर थाना केस नंबर 132/2025 से जुड़ा है और देवघर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-द्वितीय सह साइबर क्राइम विशेष अदालत में विचाराधीन है.
हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे आरोपी
झारखंड हाई कोर्ट से जमानत नहीं मिलने के बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आरोपी की ओर से कहा गया कि वह करीब एक वर्ष से हिरासत में है. यह भी दलील दी गई कि मामले में सह-आरोपी को एक वर्ष हिरासत में रहने के आधार पर हाई कोर्ट से जमानत मिल चुकी है.
आरोपी की ओर से उसकी उम्र 26 वर्ष होने, एक बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी होने और आय का कोई दूसरा साधन नहीं होने का भी उल्लेख किया गया. बचाव पक्ष ने मुकदमे की धीमी गति को भी जमानत के पक्ष में महत्वपूर्ण आधार बताया.
एक साल में सिर्फ एक गवाह की हुई गवाही
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बचाव पक्ष ने विशेष रूप से यह तर्क रखा कि आरोपी लगभग एक साल से जेल में है, लेकिन अब तक केवल एक गवाह से पूछताछ हुई है. यानी ट्रायल की गति काफी धीमी है.
अदालत ने भी इस तथ्य को अपने आदेश में दर्ज किया कि अभी तक केवल एक गवाह से पूछताछ हुई है. हालांकि, इसी के साथ पीठ ने स्पष्ट किया कि मुकदमे को अब तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए और इसे छह महीने के भीतर पूरा किया जाए.
राज्य ने तीन समान आपराधिक मामलों का हवाला दिया
जमानत का विरोध करते हुए राज्य की ओर से आरोपी के खिलाफ दर्ज पूर्व आपराधिक मामलों का हवाला दिया गया. राज्य ने अदालत को बताया कि आरोपी के खिलाफ समान प्रकृति के तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं.
यही तथ्य जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के विचार में महत्वपूर्ण रहा. पीठ ने कहा कि यदि आरोपी के खिलाफ इसी तरह के अन्य मामले हैं तो जमानत के सवाल पर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
सुनवाई के दौरान इसी संदर्भ में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने साइबर अपराध में आसानी से पैसा मिलने के पहलू का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की कि साइबर अपराध एक लत की तरह हो सकता है. यह टिप्पणी आरोपी के कथित समान प्रकृति के आपराधिक मामलों के संदर्भ में सामने आई.
बचाव पक्ष ने तीन नहीं एक मामले की जानकारी होने की बात कही
सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण स्थिति तब बनी जब पीठ ने आरोपी के खिलाफ तीन समान प्रकृति के आपराधिक मामलों का उल्लेख किया. आरोपी की ओर से पेश वकील ने कहा कि उन्हें अपने मुवक्किल के खिलाफ केवल एक ऐसे मामले की जानकारी है.
इस तरह अदालत के समक्ष आरोपी के पूर्व आपराधिक मामलों की संख्या को लेकर दोनों पक्षों के दावों में अंतर भी सामने आया. सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को अपने रिकॉर्ड में दर्ज किया.
ट्रायल तेज करने पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
जमानत याचिका पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल चल रहा है और अब तक केवल एक गवाह से पूछताछ हुई है. अदालत ने मुकदमे को तेजी से आगे बढ़ाने पर जोर दिया.
पीठ ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में आरोपी की जमानत याचिका पर विचार किया जा सकता था, लेकिन उसके खिलाफ बताए गए समान प्रकृति के पूर्व मामलों को देखते हुए इस स्तर पर जमानत देने का आधार नहीं बनता. साथ ही अदालत ने ट्रायल को आगे बढ़ाते हुए छह महीने में पूरा करने का निर्देश दिया.
जमानत से इनकार, छह महीने में सुनवाई पूरी करने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी. हालांकि, अदालत ने ट्रायल की धीमी गति को देखते हुए मामले को लंबा खिंचने से रोकने के लिए छह महीने की समयसीमा तय की है.
इस आदेश से यह स्पष्ट है कि अदालत ने जमानत के सवाल पर आरोपी की लंबी हिरासत और मुकदमे की धीमी प्रगति को देखा, लेकिन समान प्रकृति के पूर्व मामलों के उल्लेख को भी महत्वपूर्ण माना. अब संबंधित विशेष अदालत में मुकदमे को तेजी से आगे बढ़ाना होगा.
साइबर अपराध मामलों में अदालत की टिप्पणी चर्चा में
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुनवाई के दौरान साइबर अपराध को आसान पैसे से जुड़ी लत के रूप में संदर्भित किया गया. हालांकि, जमानत से इनकार का आधार केवल यह मौखिक टिप्पणी नहीं थी. अदालत के सामने आरोपी की कथित साइबर गतिविधियों से संबंधित जब्त सामग्री, पूर्व आपराधिक मामलों का राज्य द्वारा किया गया उल्लेख और ट्रायल की वर्तमान स्थिति सहित कई तथ्य थे.
फिलहाल आरोपी को जमानत नहीं मिली है और मामला देवघर की विशेष अदालत में जारी रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने में ट्रायल पूरा करने का निर्देश दिया है. पिंटू दास उर्फ पिंटू कुमार दास बनाम झारखंड राज्य मामले में आगे की कार्यवाही अब इसी समयसीमा के भीतर पूरी किए जाने पर केंद्रित रहेगी.

