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    समय के साथ-साथ बदल गया किसान आंदोलनों का स्वरूप

    News DeskBy News DeskFebruary 23, 2024No Comments4 Mins Read
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    समय के साथ-साथ बदल गया किसान आंदोलनों का स्वरूप

     

    देवानंद सिंह

    किसान प्रतिनिधियों और सरकार के नुमाइदों के बीच कई स्तर की बातचीत के बाद भी सहमति नहीं बन पा रही है। देश के कई बॉर्डर वाले हिस्सों से किसान दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं, लेकिन सरकार की भी पूरी कोशिश है कि किसानों को किसी भी तरह दिल्ली कूच ना करने दिया जाए, लेकिन यह सब कब तक चलता रहेगा, यह सबसे बड़ा सवाल है।

     

    दरअसल, यूपी से लेकर पंजाब-हरियाणा के किसानों ने ’13 फरवरी को ‘दिल्ली चलो’ का नारा बुलंद किया था। संयुक्त किसान मोर्चा (अराजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा ने फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के संबंध में कानून बनाने समेत विभिन्न मांगों को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव डालने के तहत दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने का ऐलान किया है। इस आंदोलन को देश के 200 से अधिक किसान यूनियनों का समर्थन हासिल है। किसान एमएसपी के लिए

     

     

    कानूनी गारंटी के अलावा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने, किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए पेंशन, कृषि ऋण माफी, पुलिस मामलों को वापस लेने और लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों के लिए ‘न्याय’ की भी मांग कर रहे हैं। यह उन शर्तों में से एक है, जो किसानों ने तब निर्धारित की थी, जब वे 2021 में कृषि कानूनों के खिलाफ अपना आंदोलन वापस लेने पर सहमत हुए थे, लेकिन इस बार फिर ऐसे ही मांगों को लेकर किसान सड़क पर उतर आए, यह कब चलता रहेगा, यह तय नहीं है। वैसे, इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो

     

     

    देश में 1858 से 1914 के बीच किसान आंदोलन की शुरुआत हुई थी, लेकिन तब के आंदोलन स्थानीय स्तर पर ही सीमित रहे, जिनका मुख्य कारण किसानों पर अत्याचार, भारतीय उद्योगों पर ब्रिटिश नीतियों का दुष्प्रभाव और अन्यायपूर्ण आर्थिक नीतियां थीं। किसानों को मनमाना लगान, अवैध टैक्स और बंधुआ मजदूरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके विरोध में किसानों ने वक्त-वक्त पर आंदोलन किए। इसी क्रम में 1920 से 1940 के बीच कई किसान संगठनों की स्थापना हुई, जिनमें बिहार प्रांतीय किसान सभा और

     

     

     

    अखिल भारतीय किसान सभा प्रमुख थे। इन संगठनों ने जमींदारी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई। 1858 और 1947 के बीच भारत में किसान आंदोलनों ने कई चरणों में विकास किया। 1914 से पहले ये आंदोलन लोकलाइज्ड, असंबद्ध और विशेष शिकायतों तक सीमित थे। 1914 के बाद गांधीजी के नेतृत्व में आंदोलन राष्ट्रवादी चरण में प्रवेश कर गए। 1859-62 बंगाल में नील की खेती करने वाले किसानों ने यूरोपीय बागान मालिकों के शोषण के खिलाफ विद्रोह किया था। वहीं, 1870-80 के बीच पाबना आंदोलन के तहत पूर्वी बंगाल में जमींदारों ने लगान और टैक्स बढ़ाए तो किसानों ने आंदोलन किया।

     

     

    1875 में दक्कन के किसानों ने मारवाड़ी और गुजराती साहूकारों के शोषण के खिलाफ विद्रोह किया। 1917 में बिहार के चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में जमींदारों के शोषण के खिलाफ आंदोलन किया। 1918 में गुजरात के खेड़ा में किसानों ने सूखे के बावजूद भू-राजस्व माफ करने से सरकार के इनकार के खिलाफ आंदोलन किया, जबकि 1928 गुजरात के बारदोली में किसानों ने लैंड रेवेन्यू बढ़ाने के खिलाफ सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में आंदोलन। यानी किसान अपनी मांगों को लेकर पहले से ही आंदोलन करते रहे है, लेकिन धीरे-धीरे जिस तरह इन आंदोलनों का स्वरूप बदल है, वह राजनीति से प्रेरित अधिक दिखाई देता है, क्योंकि इससे आम आदमी के जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है, हर तरफ से राजधानी दिल्ली कैद है।

     

     

    हालांकि, पंजाब- हरियाणा से किसानों के 13 फरवरी के दिल्ली कूच के ऐलान के बाद पुलिस ने दिल्ली-चंडीगढ़ हाइवे का रूट डायवर्ट किया हुआ है। वहीं, अंबाला और पंजाब की तरफ से आने वाले रास्तों पर ट्रैफिक बंद है। दिल्ली में सिंघु बॉर्डर के साथ ही गाजीपुर बॉर्डर, लोनी बॉर्डर, चिल्ला बॉर्डर, रजोकरी बॉर्डर, कापसहेड़ा बॉर्डर और कालिंदी कुंज-डीएनडी-नोएडा बॉर्डर पर सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं, लेकिन ये व्यवस्थाएं भी नाकाफी लग रही हैं।

     

     

     

    समय के साथ-साथ बदल गया किसान आंदोलनों का स्वरूप देवानंद सिंह राष्ट्र संवाद संपादकीय
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