विश्व पर्यावरण दिवस पर आयोजित आठ दिवसीय कार्यक्रम का प्रेरणादायी एवं विश्लेषणात्मक समापन पर्यावरण संरक्षण को जन-जागरूकता से जन-आंदोलन बनाने का संदेश
राष्ट्र संवाद संवाददाता
घाटशिला, झारखंड: सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला, झारखंड में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित आठ दिवसीय पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम का आज आठवें एवं अंतिम दिवस पर भव्य, प्रेरणादायी एवं गरिमामय वातावरण में समापन किया गया। यह कार्यक्रम केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा युवाओं की सहभागिता को केंद्र में रखकर एक व्यापक जन-जागरूकता अभियान के रूप में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य छात्र-छात्राओं के भीतर प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना, पर्यावरणीय चुनौतियों को समझाना तथा व्यवहारिक स्तर पर संरक्षण की भावना को मजबूत करना था।
समापन समारोह का शुभारंभ पारंपरिक रूप से लेम्प लाइट (दीप प्रज्वलन) के साथ किया गया। दीप प्रज्वलन केवल कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत नहीं थी, बल्कि यह ज्ञान, चेतना, जिम्मेदारी और प्रकृति संरक्षण के प्रति सामूहिक संकल्प का प्रतीक बना। कार्यक्रम का संचालन अंग्रेजी विभाग की विभागाध्यक्ष सुश्री अनुसूआ राय ने अत्यंत प्रभावपूर्ण, व्यवस्थित एवं गरिमामय शैली में किया। उनके संयोजन और मंच संचालन ने कार्यक्रम को सुव्यवस्थित एवं जीवंत बनाए रखा।
विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित इस आठ दिवसीय कार्यक्रम के दौरान अनेक शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं जागरूकता आधारित गतिविधियों का आयोजन किया गया। इनमें योग अभ्यास, पोस्टर एवं स्लोगन लेखन प्रतियोगिता, पर्यावरण विषयक क्विज प्रतियोगिता, जागरूकता कार्यक्रम, संवाद एवं रचनात्मक गतिविधियाँ शामिल थीं। इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं था, बल्कि उन्हें पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाकर समाधान की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करना था।
समापन समारोह के दौरान पूर्व में आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं एवं गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को विश्वविद्यालय के आदरणीय कुलपति प्रोफेसर डॉ० ब्रज मोहन पाट पिंगुवा तथा गणित विभाग के विभागाध्यक्ष कृष्णेंदु दत्ता द्वारा प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित एवं उत्साहवर्धित किया गया। यह सम्मान केवल उपलब्धियों की औपचारिक स्वीकृति नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों के प्रयासों, रचनात्मक सोच और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का सार्वजनिक सम्मान था। प्रमाण-पत्र प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के चेहरे पर प्रसन्नता, आत्मविश्वास और नई प्रेरणा स्पष्ट दिखाई दे रही थी, जिसने समारोह के वातावरण को और अधिक उत्साहपूर्ण बना दिया।
इस अवसर पर अर्थशास्त्र विभाग की सहायक प्राध्यापिका सुश्री प्रिंसी ने पर्यावरण संरक्षण विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकट केवल वैज्ञानिक या प्राकृतिक समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक एवं वैश्विक विकास से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित औद्योगिकीकरण, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, बढ़ता प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित न रखकर सामाजिक आंदोलन का रूप देना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों को जल संरक्षण, ऊर्जा बचत एवं पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान विभाग की छात्रा मोनाली महंता ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति और मानव जीवन का संबंध परस्पर निर्भरता पर आधारित है और यदि प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है तो उसका सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों तथा सामाजिक जीवन पर पड़ता है। उन्होंने युवाओं से वृक्षारोपण, स्वच्छता, प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए आगे आने की अपील की। उनके विचारों ने छात्र-छात्राओं के बीच सकारात्मक ऊर्जा और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ० ब्रज मोहन पाट पिंगुवा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक दिन या एक कार्यक्रम का विषय नहीं, बल्कि जीवन की निरंतर प्रक्रिया और नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई और जैव विविधता के संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उन्हें सामाजिक चेतना और पर्यावरणीय नेतृत्व विकसित करने का केंद्र बनना होगा।
उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनना है। यदि युवा पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेकर आगे बढ़े तो समाज में व्यापक परिवर्तन संभव है। उन्होंने प्रत्येक विद्यार्थी से कम-से-कम एक पौधा लगाने, जल संरक्षण करने तथा पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को अपने दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में कहा कि प्रकृति मानव सभ्यता की आधारशिला है और उसका संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब वह पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के साथ आगे बढ़े। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि युवा वर्ग परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति है और उनकी जागरूकता एवं सक्रिय भागीदारी से पर्यावरण संरक्षण का अभियान जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।
कार्यक्रम का समापन संगीत विभाग की विभागाध्यक्ष संगीता चौधरी द्वारा राष्ट्रीय गीत एवं राष्ट्रगान की भावपूर्ण प्रस्तुति के साथ किया गया। उनकी मधुर प्रस्तुति ने समारोह को राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक गरिमा और भावनात्मक एकता से ओत-प्रोत कर दिया तथा उपस्थित सभी लोगों ने एकजुट होकर राष्ट्र और प्रकृति संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः व्यक्त किया।
अंत में विश्वविद्यालय परिवार ने इस सफल आयोजन के लिए अंग्रेजी विभाग की विभागाध्यक्ष अनुसूआ राय के कुशल मार्गदर्शन, प्रभावी समन्वय एवं समर्पित प्रयासों की सराहना की। उनके नेतृत्व और सहयोग से विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित यह आठ दिवसीय कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और सतत विकास की दिशा में विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा।

