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    Home » भारत की दवा उद्योग की चमक के पीछे का अंधेरा चिंताजनक
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    भारत की दवा उद्योग की चमक के पीछे का अंधेरा चिंताजनक

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीOctober 10, 2025No Comments8 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    भारत दुनिया की ‘फार्मेसी’ कहा जाता है। यह एक गर्व की बात है, लेकिन हाल की घटनाएं इस गौरव को गहरे सवालों के घेरे में ला खड़ा करती हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में ‘कफ सिरप’ पीने के बाद कई बच्चों की मौतें हुई हैं। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस बड़े तंत्र की विफलता का प्रतीक है जो दवा सुरक्षा, गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी का जिम्मेदार है। जब एक ऐसी दवा, जो राहत देने के लिए बनाई गई हो, मौत का कारण बन जाए, तो यह न केवल चिकित्सा प्रणाली की बल्कि नियामक ढांचे की विश्वसनीयता पर भी गहरी चोट है।

     

     

     

    यह विडंबना ही है कि जिस देश ने जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र में दुनिया को सस्ता और असरदार विकल्प दिया, वही देश आज अपनी ही दवाओं की सुरक्षा को लेकर कठघरे में है। भारत दवा उत्पादन के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है। यहां से लगभग 200 देशों में दवाओं का निर्यात होता है। भारत का फार्मास्युटिकल मार्केट करीब 60 अरब डॉलर का है और सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक इसे 130 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाए। यह उद्योग लाखों लोगों के लिए रोजगार और विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत है, लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक डरावनी सच्चाई छिपी है, वह है क्वालिटी कंट्रोल और निगरानी का अभाव। भारत में करीब 10,000 से ज्यादा फार्मास्युटिकल निर्माता हैं, जिनमें बड़ी संख्या छोटी और मध्यम (MSME) कंपनियों की है। इन कंपनियों में से कई के पास न तो पर्याप्त तकनीकी संसाधन हैं, न ही आधुनिक गुणवत्ता जांच उपकरण। यही कारण है कि बार-बार इनकी दवाएं सब-स्टैंडर्ड यानी निर्धारित मानक से कम गुणवत्ता वाली पाई जाती हैं।

     

     

    तमिलनाडु की दवा कंपनी श्रीसन फार्मास्युटिकल्स के ‘कोल्ड्रिफ’ नामक कफ सिरप के नमूने में जो सामने आया, वह किसी साजिश से कम नहीं लगता। इस सिरप में डाई एथिलीन ग्लाइकॉल की मात्रा 48.6% पाई गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार यह 0.10% से अधिक नहीं होनी चाहिए। डाई एथिलीन ग्लाइकॉल एक इंडस्ट्रियल केमिकल है, जिसका प्रयोग आमतौर पर गाड़ियों, मशीनों और ब्रेक फ्लुइड में किया जाता है। जब यह शरीर में जाता है तो यह किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में जिन बच्चों की मौतें हुईं, उनकी किडनियां पूरी तरह फेल हो गई थीं।

     

     

    ऐसे में, सवाल उठता है कि इतना बड़ा जहर दवा में कैसे पहुंच गया? क्या यह केवल मानवीय भूल थी, या निगरानी तंत्र की ढिलाई ने इसे संभव बनाया? यह पहली बार नहीं है, जब भारतीय कफ सिरप पर सवाल उठे हों। 2022 में गाम्बिया में 70 से अधिक बच्चों की मौत के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत की एक कंपनी के कफ सिरप पर वैश्विक चेतावनी जारी की थी। उसके बाद उज्बेकिस्तान, कैमरून और इराक से भी इसी तरह की शिकायतें आईं। हर बार कहा गया कि जांच होगी, सुधार होंगे, लेकिन घटनाओं की पुनरावृत्ति बताती है कि भारत ने अपनी पिछली गलतियों से कुछ खास नहीं सीखा।

     

     

    2023 और 2024 में केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन ने कई राज्यों में दवाओं के सैंपल की जांच की थी। 2023 की रिपोर्ट में 65% कंपनियों की दवाएं मानक से नीचे पाई गईं, जबकि 2024 की अप्रैल रिपोर्ट में यह संख्या 68% तक पहुंच गई। यानी, स्थिति सुधारने के बजाय और बिगड़ी है। यह समस्या किसी एक कंपनी या राज्य तक सीमित नहीं है। यह सिस्टम की कमजोरी है, वह सिस्टम जो दवाओं के उत्पादन से लेकर वितरण तक हर चरण पर निगरानी रखने के लिए जिम्मेदार है। भारत में दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी दो स्तरों पर होती है — केंद्रीय नियामक और राज्य स्तरीय ड्रग कंट्रोलर, परंतु दोनों के बीच तालमेल और समन्वय की भारी कमी है।

     

     

    कई राज्यों में ड्रग इंस्पेक्टरों की कमी है। कई जगह एक निरीक्षक सैकड़ों इकाइयों की जांच का जिम्मा संभालता है, जो व्यवहारिक रूप से असंभव है। नतीजा यह होता है कि जांच केवल कागजों पर पूरी हो जाती है। साथ ही, कई बार राजनीतिक या कारोबारी दबाव भी नियामक प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। छोटी दवा कंपनियों पर कार्रवाई करने में स्थानीय प्रशासन झिझकता है, क्योंकि वे स्थानीय रोजगार या राजनीतिक चंदे का स्रोत होती हैं। यही लापरवाही आगे चलकर गाम्बिया, उज्बेकिस्तान या अब राजस्थान-मध्य प्रदेश जैसी त्रासदियों में बदल जाती है।

     

     

    भारत को अक्सर सस्ती दवाओं का केंद्र कहा जाता है। यही वजह है कि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई गरीब देश भारत पर निर्भर हैं। भारत की दवा कंपनियां दुनिया की जेनेरिक मेडिसिन्स का 20% से अधिक हिस्सा बनाती हैं। लेकिन अगर यही सस्ता इलाज मौत का सौदा बन जाए, तो भारत की छवि को गहरी चोट लगना तय है। गाम्बिया घटना के बाद WHO की चेतावनी ने भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को हिला दिया था। अब जब घरेलू स्तर पर भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो सवाल और गंभीर हो जाते हैं। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी है। दवा उद्योग में एक छोटी सी गलती हजारों जिंदगियां निगल सकती है, और भारत में बार-बार ऐसा होना हमारी संवेदनहीनता को दर्शाता है।

     

     

    घटना के बाद तमिलनाडु की कंपनी के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। दवाएं वापस ली जा रही हैं, और सीडीएससीओ ने कई राज्यों में जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन क्या इससे कुछ बदलेगा?
    पिछली घटनाओं में भी यही हुआ, जांच, बयान, रिपोर्ट और फिर भूल जाना। कोई सख्त पॉलिसी रिव्यू या स्ट्रक्चरल सुधार नहीं हुआ। दोषियों को सजा मिलना तो दूर, कई मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं की गई।

     

    यदि, भारत को दवा उत्पादन के वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी पहचान बचानी है, तो अब पोस्ट-इंसिडेंट एक्शन से आगे बढ़कर प्रिवेंटिव सिस्टम विकसित करना होगा। यानी, ऐसा तंत्र जो इस तरह की घटनाओं को घटित होने से पहले ही रोक सके।

     

     

    भारत में फार्मा उद्योग का ढांचा असमान है। कुछ बड़ी कंपनियां, जैसे सन फार्मा, डॉ. रेड्डी, सिप्ला या ल्यूपिन, वैश्विक मानकों पर काम करती हैं। इनके पास आधुनिक लैब्स, गुणवत्ता नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन होते हैं, लेकिन इन बड़ी कंपनियों के नीचे हजारों छोटी और मझोली इकाइयां हैं जो बेहद सीमित संसाधनों में काम करती हैं। यही कंपनियां घरेलू बाजार और ग्रामीण इलाकों की बड़ी जरूरतें पूरी करती हैं। इन एमएसएमई कंपनियों की दवाएं अक्सर स्थानीय बाजारों में सस्ती मिलती हैं, लेकिन इन्हीं में से अधिकांश की मैन्युफैक्चरिंग क्वालिटी पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। सरकार की रिपोर्टों में बार-बार यह कहा गया है कि ये कंपनियां गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस का पालन नहीं करतीं, और कई बार बिना पर्याप्त लैब टेस्टिंग के ही उत्पाद बाजार में उतार देती हैं।

     

     

    अब समय आ गया है कि भारत अपने फार्मा सेक्टर की नियामक प्रणाली को संरचनात्मक रूप से पुनर्गठित करे। केवल राज्य स्तर पर जांच करने से काम नहीं चलेगा। हर दवा, हर बैच और हर निर्माता की जानकारी एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज होनी चाहिए, ताकि किसी भी शिकायत की स्थिति में ट्रेसबिलिटी आसान हो। सरकार के अधीन नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र निकाय को दवा गुणवत्ता की वार्षिक जांच का अधिकार दिया जाए। जिस कंपनी के उत्पाद में जानलेवा तत्व पाए जाएं, उसका लाइसेंस तुरंत रद्द किया जाए और सीईओ/मालिक पर आपराधिक मुकदमा चले।

     

     

    केंद्र और राज्यों के ड्रग कंट्रोलर के बीच रीयल-टाइम सूचना साझाकरण की प्रणाली बने। ड्रग इंस्पेक्टरों की संख्या बढ़ाई जाए, आधुनिक लैब्स को हर राज्य में सशक्त किया जाए। भारत के पास विश्व के सबसे बड़े फार्मा बाजारों में से एक है। यह उद्योग न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देश की वैज्ञानिक प्रगति और वैश्विक जिम्मेदारी का प्रतीक भी है। जब भारत की दवा किसी अफ्रीकी या एशियाई बच्चे की जान बचाती है, तो यह मानवता की सेवा है। लेकिन जब वही दवा किसी बच्चे की जान लेती है, तो यह मानवता पर कलंक है। यह बात सरकार, उद्योग और समाज, तीनों को समझनी होगी। केवल निर्यात का आंकड़ा बढ़ाना ही उपलब्धि नहीं है, गुणवत्ता और सुरक्षा की गारंटी देना ही असली उपलब्धि है।

     

     

    कुल मिलाकर, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हुई मौतें सिर्फ स्थानीय प्रशासन की चूक नहीं हैं; वे भारत के फार्मास्युटिकल ढांचे की सामूहिक असफलता का आईना हैं। यह वही देश है जो खुद को वैश्विक हेल्थकेयर पार्टनर कहता है, लेकिन अपने बच्चों को सुरक्षित दवा तक नहीं दे पा रहा। अब यह सवाल केवल क्या गलत हुआ का नहीं, बल्कि अब और गलत न हो का है। भारत को अपनी दवा उद्योग की दिशा बदलनी होगी, मुनाफे से ज्यादा मानवता, उत्पादन से ज्यादा पारदर्शिता और निर्यात से ज्यादा नैतिकता की दिशा में। अगर, यह नहीं हुआ, तो भारत की फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड की पहचान धीरे-धीरे ट्रैजेडी ऑफ द वर्ल्ड में बदल सकती है, और यह न केवल आर्थिक, बल्कि मानवीय पतन होगा, ऐसा पतन जिसकी भरपाई कोई भी डॉलर नहीं कर सकता।

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