लेखक: देवानंद सिंह
अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के कथित इस्तीफे की खबरों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ईरान की सत्ता का वास्तविक केंद्र कौन है। यद्यपि राष्ट्रपति ने स्वयं इस्तीफे की अटकलों को खारिज करते हुए साफ कहा है कि वह अपना काम जारी रखेंगे, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने ईरान की आंतरिक सत्ता संरचना और पश्चिम एशिया की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है।
ईरान की सत्ता का वास्तविक केंद्र: जटिल राजनीतिक व्यवस्था
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था सामान्य लोकतांत्रिक ढांचे से अलग है। यहां राष्ट्रपति जनता द्वारा चुना जाता है, लेकिन सर्वोच्च अधिकार सुप्रीम लीडर के पास होता है। इसके अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) केवल एक सैन्य संगठन नहीं, बल्कि राजनीति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में भी प्रभावशाली भूमिका निभाता है। ऐसे में जब राष्ट्रपति और सुरक्षा प्रतिष्ठान के बीच मतभेदों की खबरें सामने आती हैं, तो उनका असर केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ता है।
क्षेत्रीय दबाव और अमेरिका-ईरान वार्ता
वर्तमान समय में ईरान कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। एक ओर अमेरिका के साथ समझौते की कोशिशें जारी हैं, दूसरी ओर इजरायल और लेबनान के बीच बढ़ता संघर्ष क्षेत्रीय तनाव को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा रहा है। ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी समझौते को लेबनान में स्थायी युद्धविराम से जोड़कर यह संकेत दिया है कि वह अपने क्षेत्रीय सहयोगियों और रणनीतिक हितों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। इससे स्पष्ट है कि परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध और सुरक्षा संबंधी मुद्दों के साथ-साथ क्षेत्रीय राजनीति भी वार्ता का अहम हिस्सा बन चुकी है।
इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान में सैन्य अभियान का विस्तार और हिज्बुल्लाह की जवाबी कार्रवाइयां इस संकट को और गंभीर बना रही हैं। यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो अमेरिका-ईरान वार्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। पश्चिम एशिया का इतिहास बताता है कि किसी एक मोर्चे पर बढ़ा तनाव अक्सर पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेता है। ईरान-अमेरिका संबंधों पर अधिक जानकारी के लिए पढ़ें।
होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में IRGC की सक्रियता भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। विश्व के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। यदि यहां किसी प्रकार की अस्थिरता पैदा होती है तो उसका सीधा असर तेल की कीमतों, परिवहन लागत और वैश्विक बाजारों पर पड़ना तय है। हाल के दिनों में तेल कीमतों में आई तेजी इसी आशंका का संकेत है।
कूटनीति बनाम टकराव: पश्चिम एशिया का भविष्य
दिलचस्प बात यह है कि इन तमाम तनावों के बावजूद एशियाई बाजारों ने अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाया है। निवेशकों को अभी भी उम्मीद है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत किसी न किसी समाधान तक पहुंचेगी। लेकिन यह आशावाद तभी कायम रह सकता है जब संबंधित पक्ष संयम और कूटनीति को प्राथमिकता दें।
आज पश्चिम एशिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां एक छोटी राजनीतिक घटना भी बड़े भू-राजनीतिक संकट का रूप ले सकती है। राष्ट्रपति पेजेश्कियन के इस्तीफे की अफवाहों से लेकर अमेरिका-ईरान वार्ता, इजरायल-लेबनान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य की गतिविधियों तक, हर घटना आपस में जुड़ी हुई है। दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति टकराव पर भारी पड़ेगी या फिर क्षेत्र एक नए और लंबे संकट की ओर बढ़ेगा। आने वाले दिन केवल ईरान या पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा भी तय कर सकते हैं। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

