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    Home » बदलती बुजुर्गों की स्थिति: भारत के आंकड़े और भविष्य
    मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय संवाद विशेष

    बदलती बुजुर्गों की स्थिति: भारत के आंकड़े और भविष्य

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 2, 2026No Comments4 Mins Read
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    बुजुर्गों की स्थिति
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    लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी

    भारत में बुजुर्गों की स्थिति अब केवल पारिवारिक चिंता नहीं रही। यह एक सामाजिक और आर्थिक वास्तविकता बन चुकी है। सरकारी आंकड़े और न्यायालय के निर्णय इस बदलाव की पुष्टि करते हैं।

    भारत में बुजुर्गों की स्थिति: एक बदलता परिदृश्य

    2011 की जनगणना के अनुसार 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या 10 करोड़ थी। तकनीकी समूह जनसंख्या अनुमान प्रतिवेदन के अनुसार 2036 तक यह संख्या 23 करोड़ हो जाएगी। कुल जनसंख्या में बुजुर्गों का भाग 8 प्रतिशत से बढ़कर 15 प्रतिशत होने का अनुमान है। यूएनएफपीए की इंडिया एजिंग प्रतिवेदन 2023 भी दर्शाती है कि 2050 तक प्रत्येक पाँचवाँ भारतीय 60 वर्ष से अधिक आयु का होगा। 2046 तक बुजुर्गों की संख्या बच्चों से अधिक हो सकती है। यह परिवर्तन चिकित्सा सुविधाओं और जीवन प्रत्याशा बढ़ने का परिणाम है।

    वृद्धाश्रम और कानूनी ढाँचा

    वृद्धाश्रमों की बढ़ती भूमिका

    सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की आईपीएसआरसी योजना के अंतर्गत देश में 603 वृद्धाश्रम संचालित हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 84 नए वृद्धाश्रम जोड़े जाने का प्रस्ताव है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने फरवरी 2026 में राज्य के 31 आश्रमों की जाँच के आदेश दिए। न्यायालय ने स्वीकार किया कि 2050 तक 20 प्रतिशत जनसंख्या वरिष्ठ नागरिकों की होगी। 26 जून 2025 को नोएडा में एक वृद्धाश्रम से 40 बुजुर्गों को अमानवीय स्थिति में पाया गया। जाँच में सामने आया कि न्यास का पंजीकरण भी नहीं था। यह घटना नियमन की कमी को दर्शाती है। यद्यपि सभी वृद्धाश्रमों की स्थिति एक जैसी नहीं है, पर ऐसी घटनाएँ व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

    कानूनी सुरक्षा और चुनौतियाँ

    माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 लागू है। उड़ीसा उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक मामले में बहू को ससुर के घर से बेदखल करने का आदेश दिया ताकि बुजुर्ग को किराये की आय मिल सके। दिल्ली उच्च न्यायालय 2023 में स्पष्ट कर चुका है कि वरिष्ठ नागरिक को अपनी संपत्ति पर शांतिपूर्ण अधिकार है। धारा 23 के अंतर्गत प्रतिकूल परिस्थितियों में की गई उपहार विलेख रद्द हो सकती है। उच्चतम न्यायालय ने भी माना है कि न्यायाधिकरण पुत्र और पुत्रवधू को संपत्ति से बेदखल कर सकता है। राष्ट्रीय सहायता दूरभाष 14567 संचालित है। इसके उपरांत भी अधिकांश माता-पिता संतान के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही से बचते हैं। पारिवारिक संबंध और सामाजिक दबाव बड़े कारण हैं। इसलिए कानून का अस्तित्व तो है, पर उसका उपयोग सीमित है।

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    बुजुर्गों के सामने आर्थिक और स्वास्थ्य चुनौतियाँ

    प्रेक्षक अनुसंधान प्रतिष्ठान की सितंबर 2024 की प्रतिवेदन के अनुसार 40 प्रतिशत बुजुर्ग सबसे निर्धन वर्ग में आते हैं। प्रत्येक पाँच में से एक वरिष्ठ नागरिक के पास आय का कोई स्रोत नहीं है। लासी सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 6 प्रतिशत बुजुर्गों ने भोजन कम कर दिया, 5 प्रतिशत भूखे सोए और 4 प्रतिशत पूरा दिन बिना भोजन के रहे। स्वास्थ्य के स्तर पर 35 प्रतिशत को हृदय रोग, 32 प्रतिशत को उच्च रक्तचाप और 13 प्रतिशत को मधुमेह है। 5 प्रतिशत ने परिवार के सदस्यों द्वारा दुर्व्यवहार की बात स्वीकारी। निवृत्ति वेतन की अनुपलब्धता और औषधियों का व्यय बड़ी समस्या है।

    सरकारी पहल और भावी रणनीति

    अक्टूबर 2024 से 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी नागरिकों को आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा दी जा रही है। अव्यय योजना 2021 से बुजुर्गों के कल्याण के लिए चल रही है। नई शिक्षा नीति 2020 में मूल्य शिक्षा को सम्मिलित किया गया है। ये कदम दर्शाते हैं कि नीतिगत स्तर पर प्रयास हो रहे हैं, यद्यपि क्रियान्वयन की गति बढ़ाने की आवश्यकता है।

    बदलती पारिवारिक संरचना और अकेलापन

    एजवेल प्रतिष्ठान की 2024 की अध्ययन के अनुसार देश में 14 प्रतिशत बुजुर्ग अकेले रहते हैं। इनमें से 31 प्रतिशत अपनी इच्छा से, 26 प्रतिशत बच्चों के विदेश जाने के कारण और 21 प्रतिशत निजता के लिए अलग रहते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि अकेले रहना सदैव विवशता नहीं होता। पारिवारिक संरचना परिवर्तित हो रही है। पलायन, आर्थिक दबाव और व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ इसके मुख्य कारण हैं।

    आगे का रास्ता: समन्वय और साझा उत्तरदायित्व

    आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, वृद्धाश्रमों की माँग बढ़ रही है और परिवार संकुचित हो रहे हैं। इसके लिए कोई एक कारक उत्तरदायी नहीं है। आर्थिक कारण, नगरीकरण, पलायन, कानूनी जागरूकता की कमी और सामाजिक सोच में परिवर्तन, सभी ने भूमिका निभाई है। समाधान केवल सरकारी योजनाओं या वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ाने में नहीं है। समाधान समन्वय में है। वरिष्ठ नागरिकों को भार न मानकर अनुभव और आशीर्वाद के स्रोत के रूप में देखना होगा। परिवार, समाज और सरकार की साझा उत्तरदायित्व से ही यह संतुलन स्थापित हो सकता है। जब यह समझ विकसित होगी, तब वृद्धाश्रम अंतिम विकल्प होंगे, पहला नहीं।

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