छल की नींव, धोखे की दीवार: शोषण के शमशान पर खड़ी दुनिया
मुंबई (इंद्र यादव) सत्ता, संपत्ति और रसूख की भूख में इंसान यह भूल गया है कि ‘धोखा’ ही वह दीमक है जो समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है।
आज के दौर में जिसे हम ‘स्मार्टनेस’ या ‘दुनियादारी’ कहते हैं, असल में वह नग्न शोषण है। जब एक इंसान दूसरे की सादगी को उसकी कमजोरी समझकर उसे ठगता है, तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक विश्वास की हत्या करता है। यह ‘छल’ ही वह बीज है, जो वक्त के साथ ‘तबाही की ज्वाला’ बनकर फूटता है।
धोखा: आधुनिक युग का सबसे बड़ा हथियार
शोषण अब केवल कोड़ों की मार या बेगारी तक सीमित नहीं रहा। आज का शोषण ‘सफेदपोश छल’ है।
मीठी जुबान, कड़वे इरादे: चेहरे पर मुस्कान और हाथ में छुरी लेकर अपनों और परायों को लूटना आज का नया चलन है।
भरोसे का कत्ल: जब कोई अपनी मेहनत की कमाई, अपनी उम्मीदें और अपना भविष्य किसी के हाथ में सौंपता है और बदले में उसे ‘धोखा’ मिलता है, तो वह दर्द एक शांत ज्वालामुखी बन जाता है।
याद रखिये, दबे हुए व्यक्ति की खामोशी ‘शांति’ नहीं, बल्कि आने वाले तूफान की आहट है।
अतीत की राख में दबी चिंगारी
इतिहास गवाह है कि किसी भी साम्राज्य का पतन बाहरी आक्रमण से उतना नहीं हुआ, जितना भीतर से पनपे ‘छल’ और ‘अन्याय’ से हुआ। आप जिसे आज ‘बीती बात’ कहकर दबा देना चाहते हैं, वह मृत नहीं हुई है।
वह अपमान, वह धोखा और वह छल—इंसान के मरने के बाद भी उसके परिवार और समाज की स्मृतियों में ‘प्रतिशोध’ बनकर जीवित रहता है।
जब यह दबी हुई चिंगारी फूटती है, तो वह न तो तर्क सुनती है और न ही दया दिखाती है। वह केवल तबाही लाती है।
प्रकृति का क्रूर न्याय: अंत तो सबका तय है
इंसान भूल जाता है कि वह मिट्टी का पुतला है। जिस दौलत और पद के लिए उसने अपनों को छला, गैरों को ठगा और समाज का शोषण किया, वह सब यहीं धरा रह जाएगा।
मिट्टी की हकीकत: अंततः राजा और रंक, शोषक और शोषित—दोनों को एक ही मिट्टी में मिलना है।
विरासत का जहर: आप अपने पीछे महलों की जगह नफरत की वह विरासत छोड़ जाते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को चैन से सोने नहीं देगी।
समय का तकाज़ा
छल और धोखे को ‘सफलता’ का मंत्र मानना बंद कीजिये। यदि समाज की नींव में अन्याय की ईंटें लगी हैं, तो वह इमारत एक न एक दिन ढहेगी ही। प्रकृति का नियम अटल है—जो आप बोएंगे, वही काटेंगे। आज का ‘छल’ कल का ‘विनाश’ है।
“किसी के विश्वास को कुचलकर जीती गई जंग, हार से भी बदतर होती है। क्योंकि शरीर मर सकता है, पर धोखे की गूँज सदियों तक पीछा नहीं छोड़ती।”

