बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 15 अगस्त के बाद पंचायत और जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों से सामान्य मरीजों को अनावश्यक रूप से बड़े अस्पतालों में रेफर करने पर संबंधित चिकित्सकों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की घोषणा की है। यह निर्णय राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही एक गंभीर समस्या को संबोधित करता है और प्रशासन की उस मंशा को दर्शाता है जिसमें स्थानीय स्तर पर ही गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
ग्रामीण और जिला अस्पतालों से बड़ी संख्या में मरीजों को पटना अथवा अन्य बड़े चिकित्सा संस्थानों में भेजा जाना आम बात रही है। कई बार यह रेफरल चिकित्सकीय आवश्यकता के कारण होता है, किंतु अनेक मामलों में यह स्थानीय अस्पतालों की उदासीनता, संसाधनों के अपर्याप्त उपयोग या जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति का परिणाम भी होता है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है, जिन्हें इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है तथा अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
मुख्यमंत्री का यह कहना कि गंभीर और विशेष मामलों को छोड़कर अधिकांश रोगियों का उपचार पंचायत और जिला स्तर पर ही सुनिश्चित किया जाना चाहिए, एक व्यावहारिक और जनहितकारी दृष्टिकोण है। यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों को आधुनिक उपकरण, पर्याप्त दवाएं, प्रशिक्षित चिकित्सक और आवश्यक जांच सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाएं, तो बड़ी संख्या में मरीजों का उपचार स्थानीय स्तर पर ही संभव है।
हालांकि इस निर्णय की सफलता सरकार की तैयारियों पर निर्भर करेगी। केवल कठोर चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। चिकित्सकों पर कार्रवाई तभी उचित होगी जब अस्पतालों में आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। यदि डॉक्टरों के पास न पर्याप्त उपकरण हों, न विशेषज्ञ सहयोग और न ही दवाओं की उपलब्धता, तो रेफरल रोकना व्यावहारिक कठिनाइयों को जन्म दे सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं के विकेंद्रीकरण का उद्देश्य यही होना चाहिए कि लोगों को अपने ही जिले और प्रखंड में बेहतर इलाज मिले। इससे बड़े अस्पतालों पर दबाव कम होगा और चिकित्सा व्यवस्था अधिक संतुलित तथा प्रभावी बनेगी। बिहार जैसे विशाल और जनसंख्या बहुल राज्य के लिए यह नीति विशेष महत्व रखती है।
सरकार ने यदि 15 अगस्त तक स्थानीय अस्पतालों को वास्तव में सक्षम बना दिया और प्रशासनिक निगरानी को प्रभावी रखा, तो यह पहल स्वास्थ्य व्यवस्था में एक सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकती है। जनता को उम्मीद है कि यह घोषणा केवल प्रशासनिक निर्देश बनकर न रह जाए, बल्कि सरकारी अस्पतालों में उपचार की गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों में वास्तविक सुधार दिखाई दे।



