शीर्षक: महंगाई की मार और मौन सत्ता आखिर कहां सोया है —–?
देवानंद सिंह
देश में महंगाई एक बार फिर आम आदमी की कमर तोड़ती नजर आ रही है। रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 1000 रुपये के पार पहुंच जाना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा गहरा असर है। यह सवाल अब हर घर, हर गली और हर चौपाल में गूंज रहा है “जनता महंगाई की मार से करती हाहाकार, आखिर कहां सोया है —–?”
एक समय था जब महंगाई को लेकर सड़कों पर आंदोलन होते थे, विपक्ष सरकार को घेरता था और जनता की आवाज़ को गंभीरता से सुना जाता था। लेकिन आज हालात कुछ और ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। गैस सिलेंडर, पेट्रोल-डीजल, दाल, तेल, सब्जियां—हर जरूरी चीज की कीमतें आसमान छू रही हैं। मध्यम वर्ग और गरीब तबका सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है, जिनकी आय स्थिर है लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
रसोई गैस, जो कभी आम गृहिणी के लिए राहत का साधन बनी थी, अब एक बोझ बन चुकी है। उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त कनेक्शन जरूर मिले, लेकिन सिलेंडर भरवाने की बढ़ती कीमतों ने उन चूल्हों को फिर से ठंडा कर दिया है। गांवों और कस्बों में कई परिवार दोबारा लकड़ी और कोयले की ओर लौटने को मजबूर हैं। क्या यही विकास का मॉडल है?
महंगाई केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह सामाजिक असंतोष का भी कारण बनती है। जब आम आदमी की थाली से रोटी कम होने लगे, तो उसकी आवाज़ में आक्रोश आना स्वाभाविक है। आज वही आक्रोश सवाल बनकर सत्ता से जवाब मांग रहा है। जनता पूछ रही है कि आखिर वे वादे कहां गए, जिनमें अच्छे दिनों की बात कही गई थी?
सरकार की ओर से अक्सर वैश्विक परिस्थितियों, अंतरराष्ट्रीय बाजार और युद्ध जैसी वजहों का हवाला दिया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का असर भारत पर भी पड़ता है, लेकिन यह भी सच है कि देश के भीतर कर व्यवस्था और नीतिगत फैसले भी कीमतों को प्रभावित करते हैं। पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स, गैस सब्सिडी में कटौती और आवश्यक वस्तुओं पर नियंत्रण की कमी ने हालात को और बिगाड़ा है।
विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर है, लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि महंगाई का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलेगा। इसके लिए ठोस नीति, पारदर्शिता और जनहित में फैसले जरूरी हैं। सरकार को चाहिए कि वह महंगाई पर नियंत्रण के लिए तत्काल प्रभाव से कदम उठाए, जैसे करों में राहत, सब्सिडी की पुनर्बहाली और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण।
साथ ही, यह भी जरूरी है कि सरकार जनता के साथ संवाद स्थापित करे। लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह नीतियों की असली हितधारक होती है। यदि जनता परेशान है, तो उसकी बात सुनना और उस पर कार्रवाई करना सरकार की जिम्मेदारी है।
आज जब महंगाई अपने चरम पर है, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सत्ता में बैठे लोग वास्तव में जनता की तकलीफों को समझ पा रहे हैं? क्या उन्हें उस गृहिणी की चिंता है, जो हर महीने का बजट बनाने में असफल हो रही है? क्या उन्हें उस मजदूर की फिक्र है, जिसकी कमाई से अब घर का खर्च नहीं चल पा रहा?
“गैस सिलेंडर की कीमत भी 1000 से पार ——
जनता महंगाई की मार से करती हाहाकार, कहां सोया है—— ।”
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि देश के करोड़ों लोगों की पीड़ा का प्रतीक बन चुका है। अब वक्त आ गया है कि सत्ता इस आवाज़ को सुने, समझे और ठोस कदम उठाए। क्योंकि यदि जनता की रसोई बुझी रहेगी, तो विकास के सारे दावे भी खोखले साबित होंगे।
अंततः, महंगाई पर नियंत्रण केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। सरकार को यह समझना होगा कि जब तक आम आदमी राहत महसूस नहीं करेगा, तब तक किसी भी विकास की कहानी अधूरी ही

