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    Home » अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध: भारत पर असर और गहराता गैस संकट
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    अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध: भारत पर असर और गहराता गैस संकट

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 23, 2026No Comments7 Mins Read
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    अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध
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    अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध के मिल रहे घातक संकेत

    निशिकांत ठाकुर

    यकायक अमेरिका-इजराइल द्वारा संयुक्त रूप से ईरान पर फिर किए गए हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली हुसैनी खामेनेई सहित उनके परिवार के कई सदस्यों की मौत हो गई थी। फिर इस युद्ध को अब लगभग तीन सप्ताह से ऊपर हो गए हैं, लेकिन जंग थमने के बजाय बढ़ती ही जा रही है और इसकी आग खाड़ी के देशों में बुरी तरह फैल चुकी है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियांन युद्ध को समाप्त करने के लिए एक्स पर एक पोस्ट लिखकर तीन शर्तें रखी हैं कि अमेरिका और इजराइल को ईरान के अधिकारों को मान्यता देनी होगी, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई करनी होगी और भविष्य में किसी भी हमले के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गारंटी देनी होगी। जैसे—जैसे खड़ी क्षेत्रों में तनाव बढ़ रहा है, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रमुख सलाहकारों ने ईरान की युद्धक प्रतिक्रिया का आकलन करने में गंभीर रूप से गलती की है। व्हाइट हाउस को आशा थी कि सैन्य कार्यवाही से ईरान घुटने टेक देगा, लेकिन इसके विपरीत तेहरान के वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अमेरिकी हितों पर कड़ा प्रहार किया है।

    अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे तनाव के दौरान भारत की नीति अपने रणनीतिक हितों, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता की रक्षा पर केंद्रित है। भारत ने सीधे तौर पर किसी का पक्ष लेने के बजाय तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान की अपील की है। भारत ने इज़राइल के साथ मजबूत रक्षा सहयोग और ईरान के साथ ऐतिहासिक रिश्तों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है, जिस पर विश्लेषकों ने इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। भारत सरकार ईरान में फंसे करीब 9,000 नागरिकों की सुरक्षा और उन्हें वापस लाने के लिए सक्रिय है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने के कारण भारत के लिए अपनी ऊर्जा जरूरतों (तेल आयात) को सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। भारत, यूएई की तरह बातचीत और कूटनीति के जरिये संघर्ष को खत्म करने की भूमिका निभा सकता है। कुल मिलाकर, भारत की स्थिति ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को बनाए रखने की है, ताकि वह किसी एक गुट के पक्ष में न होकर अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके।

    पश्चिम एशिया (ईरान-इजराइल/मिडिल ईस्ट) में चल रहे युद्ध के कारण भारत में एलपीजी और तेल की आपूर्ति में व्यवधान आ चुका है। भारत अपनी एलपीजी आवश्यकता का 60-85% आयात करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली 90% आपूर्ति पर संकट के कारण घबराहट बढ़ी है। घरेलू मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने और अमेरिका से 10 लाख टन अतिरिक्त एलपीजी आयात करने के आदेश दिए हैं। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है। व्यावसायिक प्रतिष्ठान (रेस्टोरेंट/होटल) प्रभावित हो गए हैं, लेकिन सरकार ने आम घरों के लिए सिलेंडर की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने का दावा किया है। बता दें कि भारत अपनी एलपीजी जरूरत का 60-85% से अधिक हिस्सा सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे देशों से आयात करता है। भारत का लगभग 40-50% क्रूड ऑयल इसी क्षेत्र से होकर आता है। सरकार ने एसेंशियल कमोडिटी एक्ट के तहत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं। आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए अमेरिका से 10 लाख टन अतिरिक्त एलपीजी मंगवाई है। आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट के कारण कई राज्यों में सिलेंडरों की किल्लत की लबी लाइन लगी हैं, लेकिन सरकार ने ‘घबराने की जरूरत नहीं’ की सलाह दी है।

    भारत सरकार द्वारा अनेक घोषणाओं के बावजूद रसोई गैस (एलपीजी) की किल्लत से देश के आम उपभोक्ता को जुझना पड़ रहा है। जो स्थिति बनी हुई है उसमें देश के विभिन्न शहरों के रेस्टोरेंट, ढाबे बंद होते जा रहे हैं। यहां तक कि अयोध्या में निःशुल्क भोजन कराने वाली राम रसोई अनिश्चित काल के लिए बंद कर दी गई है। देश में कालाबाजारी और जमाखोरों ने भी गैस सिलेंडर को गुप्त स्थानों पर जमा कर लिया गया है। रही ग्रामीण क्षेत्रों की बात, तो वहां पुराने काल की यादें ताजा हो रही हैं। एलपीजी गैस की कमी के कारण लकड़ी और गोबर से बनी उपलों की दुकानों पर लंबी लाइन देखी जा सकती है। पश्चिम एशिया में ईरान पर इजरायल, अमेरिका के हमले के बाद पैदा हुए गंभीर सुरक्षा संकट के बाद भारत ने दुनिया के प्रमुख देशों के साथ उच्च स्तरीय कूटनीतिक बातचीत को आगे बढ़ा दिया है।

    भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर पिछले दिनों 11 मार्च को फ्रांस, रूस और यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों से टेलीफोन पर बातचीत की है। जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अगरची से भी द्विपक्षीय संबंधों के साथ ही पश्चिम एशिया के हालत पर चर्चा की है। ऐसी विकट स्थिति के होते हुए आज पूरा देश ही नहीं, विश्व स्तब्ध है। वह इस भरोसे पर है कि ऐसी स्थिति रोज नहीं होती और इसलिए देश इससे भी उबर आएगा। एलपीजी गैस, पेट्रोल—डीजल के दामों में बेहिसाब बढ़ोतरी के कारण लोग कई तरह के कयास लगा रहे हैं। यह भी कह रहे हैं कि हो सकता है कि इस हाहाकार के कारण तीसरा विश्वयुद्ध न छिड़ जाए। स्थिति तो सुधरेगी ही और सबकुछ का समाधान भी होगा, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2026 के मध्य में (संभवतः 12-13 मार्च के आसपास) ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर बात की। इस बातचीत में, मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री ने कूटनीति और बातचीत के जरिए समाधान खोजने की अपील की। भारत ने अपनी प्राथमिकता बताते हुए भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और ऊर्जा (तेल/गैस) की अबाधित आपूर्ति पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने युद्ध के कारण नागरिकों की मौत और बुनियादी ढांचे को हो रहे नुकसान पर गहरी चिंता जताई। मोदी ने युद्ध के बजाय कूटनीति और संवाद से समस्या का समाधान निकालने पर जोर दिया। ईरान में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और उनके सही-सलामत वापस आने की आवश्यकता को प्राथमिकता दी गई।

    भारत के लिए तेल और गैस की निर्बाधआपूर्ति महत्वपूर्ण है, इस पर चर्चा हुई यह बातचीत, ईरान संघर्ष के बढ़ते तनाव और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच हुई है। समाचार यह भी है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से पारस की खड़ी में 28 भारतीय जहाज फंसे हुए हैं। इन जहाजों में 778 भारतीय नाविक है। केंद्र सरकार इन सभी जहाजों और कर्मचारियों की लगातार निगरानी कर रही हैं। अब आखिर में यह प्रश्न अब तक अनुत्तरित ही रह जाता है कि जब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा, यह अफरातफरी बनी ही रहेगी? यदि नहीं, तो कि कब तक स्थिति सामान्य हो जाएगी, जिसका एकमात्र रास्ता कूटनीति ही है। सामान्य नागरिक तो यही आशा कर सकता है। कूटनीति की रणनीति क्या होगी, इसका निर्णय तो शीर्ष पर बैठे को ही करना है, आम जनता को तो समस्या का समाधान ही चाहिए।

    अब आगे किस देश का कितना नुकसान हुआ, युद्ध समाप्त होने के बाद विशेषज्ञ ही पता लगाएंगे, लेकिन आज जो खबर है उसके अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने पश्चिम एशिया के सहयोगी देशों की उन कोशिशों को नकार दिया है कि जिनका उद्देश्य ईरान युद्ध समाप्त करने के लिए कूटनीतिक बातचीत शुरू करना था। खबरों के अनुसार व्हाइट हाउस ने साफ कर दिया है कि फिलहाल उसकी प्राथमिकता सैन्य अभियान जारी रखना है, न कि युद्ध विराम पर चर्चा। दूसरी ओर ईरान ने भी स्पष्ट किया है कि जब तक इजराइल और अमेरिका के हमले बंद नहीं होते, तबतक किसी भी युद्ध विराम पर बातचीत संभव नहीं है। ईरानी सूत्रों के अनुसार कई देशों ने मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन तेहरान ने अपनी शर्तों से पीछे हटने से इनकार कर दिया है। ईरान और अमेरिका दोनों की अनिच्छा के संदेश मिल रहे हैं जिससे लगता है कि युद्ध लंबा खिंच सकता है।

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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