बिहार की सियासत में गठबंधन का गणित, सीटों से ज्यादा अहम है भरोसे की लड़ाई
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति हमेशा से गठबंधन की उलझनों, जोड़-घटाव और सियासी समीकरणों का केंद्र रही है। यहां चुनाव केवल मतपेटी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह दलों के बीच शक्ति-संतुलन को परिभाषित करता है। इस बार भी नज़ारा कुछ अलग नहीं है, फर्क बस इतना है कि समीकरण और पेचीदा हो गए हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और महागठबंधन, दोनों ही खेमों में सीटों के बंटवारे को लेकर जारी खींचतान बता रही है कि गठबंधन की राजनीति में साथ चलना और साथ निभाना दोनों ही अलग बातें हैं।
नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी के बीच हुए बराबरी के सीट समझौते को एक समय राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक कहा गया था। माना गया कि इस बार एनडीए ने विपक्ष से पहले ही सीटों का स्पष्ट खाका पेश कर बढ़त बना ली। लेकिन कुछ ही दिनों में तस्वीर धुंधली पड़ने लगी। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा का यह बयान कि एनडीए में सब ठीक नहीं है उस राजनीतिक असहजता को उजागर करता है, जो सतह के नीचे उबल रही थी।
हालांकि बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद कुशवाहा ने कहा कि जीतेगा तो एनडीए ही, लेकिन तब तक उनके असंतोष की चर्चा आम हो चुकी थी। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के प्रमुख जीतनराम मांझी का यह कहना कि उनकी पार्टी को कम सीटें दी गई हैं, इस बात को और पुष्ट करता है कि गठबंधन के भीतर सब कुछ सहज नहीं है।
नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा संतुलन की रही है, वे कभी भी किसी एक दल को पूरी तरह हावी नहीं होने देते। भाजपा के साथ बराबरी का सीट बंटवारा इसी रणनीति का हिस्सा था, परंतु वास्तविकता यह है कि भाजपा का कार्यकर्ता वर्ग और कुछ वरिष्ठ नेता अब भी खुद को छोटे भागीदार की भूमिका में सहज महसूस नहीं कर रहे। वहीं, नीतीश कुमार, जो बार-बार राजनीतिक पलटवार करने की वजह से अनिश्चितता के प्रतीक बन चुके हैं, इस बार अपनी विश्वसनीयता बचाने की कोशिश में हैं।
अगर, एनडीए के भीतर की यह खींचतान आगे बढ़ती है, तो यह न केवल सीटों के समीकरण बल्कि मतों के स्थानांतरण की संभावनाओं को भी प्रभावित कर सकती है। बिहार की राजनीति में यह एक बड़ा तत्व होता है कि किस हद तक गठबंधन के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर होते हैं, और यहां भरोसे की कमी, पूरी चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है।
विपक्षी महागठबंधन की स्थिति और भी उलझी हुई नजर आ रही है। राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बीच चल रही सीट-बंटवारे की रस्साकशी इस गठबंधन की कमजोरी को उजागर करती है। जिस समय एनडीए ने अपना सीट समझौता तय कर लिया था, तब महागठबंधन अभी भी यह तय करने में लगा था कि कौन कहां से लड़ेगा।
राष्ट्रीय जनता दल ने सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा से पहले ही कुछ सीटों पर अपने चुनाव-चिह्न जारी कर दिए थे, यह कदम कांग्रेस को स्पष्ट संदेश था कि निर्णय का केंद्र हम हैं, लेकिन इस जल्दबाजी ने न केवल कांग्रेस को नाराज़ किया बल्कि गठबंधन के भीतर की असहमति को सार्वजनिक कर दिया। मजबूरन बाद में राष्ट्रीय जनता दल को अपने चुनाव-चिह्न वापस लेने पड़े।
दूसरी ओर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी सीट बंटवारे से पहले अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी, जो यह दिखाता है कि समन्वय की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है। यह स्थिति उस समय और गंभीर हो जाती है जब आप याद करते हैं कि विपक्षी एकता का पूरा एजेंडा मोदी सरकार के खिलाफ एकजुटता पर आधारित था। परंतु जब अंदर ही अंदर अहंकार की टकराहटें और राजनीतिक असुरक्षा इतनी गहरी हो, तो कोई भी एकजुटता टिक नहीं पाती।
कांग्रेस, जो राष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ रही है, बिहार में अपने पुराने वर्चस्व को वापस पाना चाहती है। वहीं राष्ट्रीय जनता दल, जो अब लालू प्रसाद के बजाय तेजस्वी यादव की नेतृत्वकारी छवि पर टिकी है, अपने बड़े भाई वाले रुतबे को बनाए रखना चाहता है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री पद के चेहरे पर भी सहमति नहीं बन पा रही। इस चुनाव में एक और दिलचस्प मोड़ है, प्रशांत किशोर की वापसी। वह अब किसी दल के रणनीतिकार नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में मैदान में हैं। उनका जन सुराज आंदोलन जमीनी स्तर पर सक्रिय है और युवाओं व शिक्षित वर्ग में धीरे-धीरे पकड़ बना रहा है, हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रशांत किशोर किसी बड़े मतदाता वर्ग को प्रभावित कर पाएंगे, लेकिन उनका अभियान पारंपरिक दो-ध्रुवीय मुकाबले को त्रिकोणीय लड़ाई में बदल सकता है। बिहार की राजनीति में ऐसा बहुत कम हुआ है कि तीसरी ताकत ने निर्णायक भूमिका निभाई हो, पर इस बार का परिदृश्य कुछ अलग है।
प्रशांत किशोर का फोकस शिक्षा, रोजगार और स्थानीय शासन जैसे बुनियादी मुद्दों पर है, इससे उन मतदाताओं का झुकाव बदल सकता है जो परंपरागत जातीय राजनीति से ऊब चुके हैं। अगर, उनका मत प्रतिशत भले ही 8-10% के आसपास भी गया, तो यह दोनों बड़े गठबंधनों के लिए खेल बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है।
राज्य में पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख 17 अक्टूबर तय है। ऐसे में सीट निर्धारण में देरी न केवल दलों की चुनावी रणनीति को प्रभावित कर रही है, बल्कि उम्मीदवारों के मनोबल पर भी असर डाल रही है। बिहार जैसे राज्य में जहां चुनाव जातीय और स्थानीय समीकरणों पर टिका होता है, वहां उम्मीदवार की पहचान और क्षेत्रीय तैयारी के लिए समय बहुत अहम होता है। महागठबंधन के भीतर इस देरी ने कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। जब तक यह साफ नहीं होगा कि कौन किस सीट से लड़ेगा, तब तक बूथ-स्तरीय योजना और प्रचार तंत्र को गति नहीं मिल पाएगी। यही वजह है कि भाजपा और जेडीयू ने सीटों का ऐलान पहले करके एक मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली है।
बिहार का मतदाता भावनाओं से ज्यादा भरोसे पर वोट देता है। उसने कई बार देखा है कि गठबंधन बनते हैं और टूटते हैं, कभी सत्ता के लिए, कभी स्वार्थ के लिए। 2015 में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद का महागठबंधन भारी बहुमत से जीता, लेकिन दो साल बाद ही नीतीश ने पलटी मारकर फिर एनडीए में वापसी कर ली। इस पृष्ठभूमि में मतदाता अब हर गठबंधन को शक की निगाह से देखता है। अगर सीट बंटवारे को लेकर इतनी खींचतान चुनाव से कुछ दिन पहले तक जारी रहती है, तो इसका सीधा असर मतदाता के भरोसे पर पड़ता है। लोग यह सोचने लगते हैं कि जो दल चुनाव से पहले ही एकमत नहीं हैं, वे सरकार चलाने में कैसे एकजुट रहेंगे?
बिहार में इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं है, बल्कि गठबंधन की राजनीति के भविष्य की परीक्षा भी है। एनडीए के भीतर नीतीश कुमार और भाजपा के रिश्ते यह तय करेंगे कि क्या बराबरी के भागीदार मॉडल टिकाऊ है या नहीं। वहीं महागठबंधन के लिए यह चुनाव संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व क्षमता का परीक्षण होगा। अगर, महागठबंधन सीट बंटवारे पर आखिरी समय तक सहमति नहीं बना पाता, तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि यह सुविधा का गठबंधन है, न कि सिद्धांतों का। इसके विपरीत अगर एनडीए आंतरिक मतभेदों को दबाकर एकजुटता दिखाने में सफल रहता है, तो उसे एक एकीकृत मोर्चे के रूप में देखा जाएगा, जो चुनावी दृष्टि से एक बड़ा लाभ है।
बिहार की राजनीति में गठबंधन हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन इस बार चुनौती सिर्फ सीटों के बंटवारे की नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या दल आपसी अविश्वास और स्वार्थ की राजनीति से ऊपर उठकर जनता को भरोसा दिला पाएंगे? प्रशांत किशोर की एंट्री ने जहां सियासी समीकरण में नई हलचल मचा दी है, वहीं पारंपरिक गठबंधन राजनीति एक नई कसौटी पर खड़ी है। एनडीए को अपने भीतर की असहमति को नियंत्रित रखना होगा, जबकि महागठबंधन को अपनी अस्पष्टता और नेतृत्व संघर्ष से बाहर निकलना पड़ेगा। आखिरकार, बिहार का मतदाता अब सीटों की गणना से ज़्यादा भरोसे के समीकरण को अहमियत देता है, और यही तय करेगा कि इस बार किसका गठबंधन गणित सही बैठता है, और किसका भरोसा जनता के बीच टूट जाता है।

