वो साँवली सी लड़की
वह जो सांवली सी लड़की है,
कयामतखेज आँखोंवाली
उसकी आँखों में सिर्फ आकर्षण नहीं,
एक दर्द का दरिया भी अवरुद्ध है —
सड़कों पर,गलियों में, मॉल में,
घूरती और समीक्षा करती आँखें हैं,
हर जगह प्रश्न करते चेहरे हैं ।
हर दृष्टि जो उसे आंकती है,
हर टिप्पणी जो उसे छूती है,
बस एक परत हटा देती है
उसके आत्मसम्मान की।
उसकी सांवली त्वचा में बसी हैं
कहानियाँ संघर्ष कीं,
सपने अपनी राह बनाने की,
दबावों और उपेक्षाओं के बावजूद
वह खड़ी रहती है,
अपने सपने और आत्मसम्मान की लौ जलाये।
लोग परिचय देते हैं-भौंहें सिकोड़ते हुए
वह साँवली सी लड़की
पर वह जानती है-
उसका रंग उसकी कमज़ोरी नहीं,
उसकी ताक़त है
वो क़यामतखेज आँखें प्रत्युत्तर हैं
उसका दर्द उसकी कमजोरी नहीं
उसकी गहन संवेदनशीलता है
वह मुस्कुराती है – तीखे व्यंग्य के साथ।
क्योंकि हर टिप्पणी, हर आलोचना,
सिर्फ दिखाती है कि दुनिया
अभी भी अपनी ऑंखों में अंधेरा लिए घूम रही है।
रूप तो वक्त का मेहमान है,
पर उसकी कृतियाँ उसके संघर्ष की कहानियाँ कहेंगी
उसके सांवलेपन के भीतर छुपा है
साहस का सूरज,
जो न किसी शब्द से बुझ सकता है,
न किसी नजर से कम हो सकता है।
वह ‘साँवली’,केवल एक लड़की नहीं,
बल्कि एक अनुभव है,
एक ऐसा अनुभव है जो सोचने पर मजबूर कर दे!
क्या सच में सुंदरता केवल देखने की चीज़ है,
या इसे महसूस करना भी एक कला है?
वह सांवली लड़की दरअसल
एक प्रश्नचिह्न है सृष्टि के चेहरे पर,
जो पूछती है —
क्या सचमुच सुंदरता गोरी होती है?
या फिर,
जीवन का रंग हमेशा सांवला या धूसर ही होता है…
न पूरी तरह सफेद या गोरी न पूरी तरह काली।
शीला पात्रो
विलेज रोड,गोविंदपुर (धनबाद)झारखंड

