धरती की पुकार: “हरित पुनर्जन्म”
मैं धरती हूँ… तुम्हारी जननी।
अब भी घूम रही हूँ,
पर मेरी धड़कनें थकी-थकी सी हैं,
साँसें उखड़ने लगी हैं।
पेड़ों ने अब बोलना छोड़ दिया,
हवाओं ने कराहना सीख लिया है।
नदियाँ बहती तो हैं,
पर उनके स्वर में अब संगीत नहीं —
बस एक करुण रूदन है।
पहाड़ अब भी खड़े हैं,
पर उनकी चोटियों से बर्फ पिघल चुकी है।
आकाश अब नीला नहीं रहा,
हवा में मिट्टी की वह पवित्र गंध नहीं रही।
कभी जो वृक्ष छाँव देते थे —
अब स्मृतियों में उगते हैं।
पक्षियों के गीत इतिहास बन चुके हैं,
और वर्षा —
मानो ईश्वर की कोई चेतावनी हो गई है।
युग बदल रहा है…
पर क्या चेतना बदलेगी?
क्या फिर से अंकुर फूटेंगे उस विश्वास के,
जो हरियाली के संग मर गया था?
यदि तुम समझो…
यदि तुम फिर से प्रेम करो —
तो मैं अपने आँचल में हरियाली लौटाऊँगी,
नदियाँ फिर गीत गाएँगी,
हवाएँ मधुर सुर सुनाएँगी,
और आकाश फिर नीला हो जाएगा।
अब समय है —
मिट्टी से संवाद का,
पेड़ों से क्षमा का,
और नदियों से नया संकल्प लेने का।
युग बदल रहा है…
और मैं —
धरती —
इंतज़ार में हूँ,
अपने “हरित पुनर्जन्म ” की।
शीला पात्रो

