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    Home » जरुरी है शिक्षक – छात्र के बीच मज़बूत भावनात्मक सम्बन्ध ।
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    जरुरी है शिक्षक – छात्र के बीच मज़बूत भावनात्मक सम्बन्ध ।

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीOctober 13, 2025No Comments5 Mins Read
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    जरुरी है शिक्षक – छात्र के बीच मज़बूत भावनात्मक सम्बन्ध
    इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा की प्रक्रिया में शिक्षक और छात्र ये दो प्रमुख केंद्र बिंदु होते हैं। ऐसे में यह भी सच है कि इन दोनों के बीच अगर समृद्ध और सशक्त भावनात्मक संबंध हो तो इससे छात्रों की शैक्षणिक उपलब्धि में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। यह भावनाएं ही तो हैं जो हमारे ह्रदय में
    किसी व्यक्ति के लिए विशेष भाव पैदा करते हैं । वर्षों तक हम अपने शिक्षकों को याद करते हैं। उनकी सराहना उनकी सलाह को याद रखते हैं तो सिर्फ इसलिए कि उनसे हमारा भावनात्मक जुड़ाव होता है। आज की शिक्षा प्रणाली यूं तो तकनीक और भौतिकवादी संस्कृति के प्रवाह में भावनाओं से थोड़ी अलग-थलग नजर आती है पर फिर भी शिक्षा अपने मूलभूत उद्देश्य को तभी‌ प्राप्त कर पाती है जब वह भावनाओं के साथ शैक्षणिक यात्रा तय करे ।

    मानव के व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास में शिक्षा का बहुत ही महत्त्व रहा है । शिक्षा ही वह पुल है जिससे होकर मानव संस्कृति एक युग से दूसरे युग तक की यात्रा करती है । शैक्षणिक
    व्यवस्था की इस यात्रा में शिक्षक और छात्र दोनों समाज रूपी
    व्यक्ति के दो पैर है जिसके माध्यम से समाज विकसित होता है , आगे बढ़ता है । ऐसे में दोनों एक गति
    और लय से आगे बढ़े तभी मानवीय रिश्तों में संतुलन और समन्वय की संभावना बन सकती है ।
    यहाँ यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि शिक्षक दाहिना पैर है जो पहले

     

     

    आगे – आगे बढता है और शिष्य बायाँ जो उसके पीछे बढ़ता है । ऐसे में शिष्य से ज्यादा अहमियत शिक्षक
    की होती है । समाज का निर्माण व्यक्ति से होता है और इतिहास की बात हो या वर्तमान की , यह निर्विवादित सत्य है कि व्यक्ति के निर्माण में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । वे न होते तो शायद एक व्यक्तित्त्व के रूप में हमारा विकास अधूरा ही रह जाता । उन्हीं के सिखाये सन्देश और प्रेरक शब्दों के

     

    द्वारा हमें एक दिशा मिलती है,जो आगे चल कर हमारी उपलब्धि बन जाती है । यह कार्य प्राथमिक स्तर से ले कर विश्वविद्यालय स्तर के सभी शिक्षकों द्वारा होता है । कहीं से भी किसी का भी महत्त्व कम नहीं है क्योंकि लम्बी यात्रा की शुरुआत भी पहले कदम से ही होती है तो पहला कदम भी उतनी ही अहमियत रखता है जितनी अहमियत मंज़िल की होती है ।

    कदाचित यही कारण है कि विश्व की कोई भी संस्कृति हो वहाँ शिक्षक को किसी न किसी रूप में महत्त्वपूर्ण माना गया है । भारतीय संस्कृति की भी यह सर्वकालीन परम्परा रही है कि यहाँ गुरु को ब्रह्म से भी श्रेष्ठ माना गया है । तभी तो गुरु पूर्णिमा के रूप में गुरु की आराधना का दिन भारतीय संस्कृति का
    अभिन्न अंग है ।

     

    गुरु का यह महत्त्व कबीर भी स्वीकार करते हैं उन्हीं के शब्दों में –
    “गुरु गोबिंद दोउ खड़े,काके लागूं पाँय ,
    बलिहारी गुरु आपनों ,जिन गोबिंद दियो बताय।”
    यह पंक्ति गुरु और शिष्य के बीच के संबंधों की निकटता और पवित्रता को व्यक्त करने के
    लिए काफी है , पर आज के भौतिक और तकनीकी साधनों से लैस युग में इस सम्बन्ध के बीच एक दूरी
    सी नज़र आने लगी है जो किसी भी दृष्टिकोण से स्वस्थ समाज के लिए सही संकेत नहीं है ।
    इस सम्बन्ध के बीच की यह हल्की सी दूरी शिक्षा प्रणाली का आतंरिक संघर्ष है , जो ऊपरी सतह से तो
    दृष्टिगोचर नहीं होता पर कहीं भीतर तक सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है ।

    प्राय : यह देखा गया है कि छात्रों को कोई विषय दुरूह लगता है, उन पर बढि़या अंक लाने का दबाव
    होता है और ऊपर से मानवीय संबंधों की सामान्य दिक्कतें भी उनके जीवन का हिस्सा होती हैं । इस तरह की समस्याओं से छात्र इसलिए जूझते है क्योंकि शिक्षक और छात्र भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से स्वयं को संबंधित महसूस नहीं करते ।

     

     

    अब गौर से देखें तो इस समस्या के दो कारण हैं- पहला तो है ज्ञान और सूचना को लेकर शिक्षक का अहंकार और दूसरा कक्षा से बाहर शिक्षक और छात्र के बीच मैत्रीपूर्ण संवाद का अभाव।
    साथ ही पुस्तक और शिक्षक केंद्रित शिक्षा, ज्ञान व सूचना का संवर्धन और महिमामंडन और इसके परिणामस्वरूप शिक्षक के व्यवहार में उपजने वाला एक अनावश्यक अहंकार , इसने ही छात्रों के नज़र में शिक्षा को एक बोझ बना डाला है और टूटे – बुझे मन से शिक्षा प्राप्त करने वाला छात्र समाज के लिए
    अपना सर्वश्रेष्ठ देने में अक्षम सिद्ध होता है ।

    यह स्पष्ट है कि बगैर स्नेह और मैत्री भाव के किसी को शिक्षक बनने का अधिकार भी नहीं
    होना चाहिए, क्योंकि सही शिक्षा सिर्फ चार दीवारों के बीच अचेतन कुर्सियों और मेजों के साथ शिक्षक और
    छात्र के बीच एक दूरी कायम रखते हुए ज्ञान और सूचनाओं के संप्रेषण तक ही सीमित नहीं रहती । उसे कक्षा से बाहर छात्र और शिक्षक के बीच जीवन की समस्याओं पर एक सार्थक संवाद के जरिए भी संप्रेषित किया जाना चाहिए । यह तभी मुमकिन होगा जब शिक्षा शुद्ध रूप से पुस्तक और शिक्षक केंद्रित न रहे, जीवन और छात्र पर केंद्रित हो। यदि शिक्षक और छात्र के बीच स्वस्थ संबंध हैं, स्नेह और सम्मान है तो
    फिर पढ़ना-लिखना, विषय को समझना, यह सब कुछ इस स्वस्थ संबंध का एक सह उत्पाद मात्र होगा।
    उसके लिए थोड़ा प्रयास ही काफी होगा और छात्रों को विषयों के बोझ के अलावा अपने आपसी संबंधों में
    उपजती पीड़ा पर समय और ऊर्जा व्यर्थ नहीं करनी पड़ेगी ।

    डॉक्टर कल्याणी कबीर
    प्रिंसिपल
    रंभा कॉलेज ऑफ एजुकेशन

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