xरांची। झारखंड के पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार को बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति के लिए बनाए गए 2025 के नियमों पर प्रथम दृष्टया सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित प्रावधान उसके प्रकाश सिंह फैसले में तय किए गए मानकों के विपरीत दिखाई देता है। अदालत ने मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को भी अपना पक्ष रखने का अवसर देने का निर्देश दिया है, क्योंकि यदि विवादित नियम रद्द किए जाते हैं तो उनकी नियुक्ति पर भी सीधा असर पड़ सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने गुरुवार को मामले की सुनवाई की। झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि राज्य विवादित नियमों पर दोबारा विचार करने के लिए तैयार है। अदालत ने मामले को एक सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की बात कही है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा नियम प्रकाश सिंह फैसले से टकराते दिख रहे
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने झारखंड के डीजीपी नियुक्ति नियमों पर गंभीर सवाल उठाया। अदालत ने प्रथम दृष्टया कहा कि ऐसा प्रावधान प्रकाश सिंह मामले में दिए गए कानून के सीधे विपरीत प्रतीत होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विवादित नियम को अदालत रद्द करती है तो उसके आधार पर की गई तदाशा मिश्रा की डीजीपी नियुक्ति पर भी असर पड़ेगा। इसी वजह से अदालत ने मिश्रा को अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी माना।
इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल तदाशा मिश्रा की नियुक्ति रद्द कर दी है। अभी अदालत ने नियमों की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। मिश्रा को नोटिस देकर उनका पक्ष मांगा गया है और मामले की अगली सुनवाई के बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
विवाद की जड़ में छह महीने की सेवा का नियम
पूरे विवाद का केंद्र डीजीपी पद के लिए अधिकारी की बची हुई सेवा अवधि है। प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को लेकर जो व्यवस्था तय की थी, उसमें डीजीपी पद के लिए विचार किए जाने वाले अधिकारी की कम से कम छह महीने की शेष सेवा को महत्वपूर्ण माना गया है।
इसका उद्देश्य यह है कि राज्य के पुलिस प्रमुख को नियुक्ति के तुरंत बाद सेवानिवृत्ति की स्थिति का सामना न करना पड़े और पुलिस नेतृत्व को स्थिरता मिले। साथ ही डीजीपी का चयन वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड और अनुभव जैसे मानकों के आधार पर तय प्रक्रिया से हो।
केंद्र सरकार का आरोप है कि झारखंड ने अपने 2025 के नियमों में ऐसी व्यवस्था बनाई, जिससे छह महीने से कम सेवा शेष रहने वाले अधिकारी को भी डीजीपी नियुक्त किया जा सकता है। इसी प्रावधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अब प्रथम दृष्टया आपत्ति जताई है।
तदाशा मिश्रा की नियुक्ति क्यों आई सवालों के घेरे में
तदाशा मिश्रा को झारखंड का डीजीपी 30 दिसंबर 2025 को नियुक्त किया गया था। केंद्र की ओर से अदालत में उठाए गए मुद्दे के अनुसार उस समय उनकी सेवानिवृत्ति अगले ही दिन यानी 31 दिसंबर 2025 को निर्धारित थी।
केंद्र का कहना है कि ऐसे समय में डीजीपी नियुक्ति और उसके बाद उन्हें दो साल का कार्यकाल मिलना सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से मेल नहीं खाता। केंद्र ने इसी आधार पर नियुक्ति को चुनौती दी है।
मामले में यह भी बताया गया कि झारखंड सरकार ने तदाशा मिश्रा की नियुक्ति से एक दिन पहले यानी 29 दिसंबर 2025 को संबंधित नियम में बदलाव किया था। केंद्र का आरोप है कि नियम में किए गए इस बदलाव से ऐसी नियुक्ति का रास्ता तैयार हुआ जिसमें सेवानिवृत्ति के बिल्कुल करीब पहुंच चुके अधिकारी को डीजीपी बनाया जा सका।
हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट फिलहाल नियमों और उनके आधार पर की गई नियुक्तियों की वैधता की जांच कर रहा है।
केंद्र ने झारखंड के नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी
केंद्र सरकार ने झारखंड के Selection and Appointment of Director General and Inspector General of Police, Jharkhand (Head of the Police Force) Regulations, 2025 को चुनौती दी है। यह नियम 8 जनवरी 2025 को अधिसूचित किए गए थे।
केंद्र का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियम सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले में निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप नहीं हैं। केंद्र ने इन नियमों के आधार पर की गई डीजीपी नियुक्तियों पर भी सवाल उठाया है।
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि केंद्र ने झारखंड सरकार को पहले भी इन नियमों को लेकर अपनी आपत्ति से अवगत कराया था। उनका कहना था कि यदि किसी दूसरे राज्य में भी इसी तरह के नियम बनाए गए हैं तो वहां भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप स्थिति की जांच होनी चाहिए।
सिर्फ तदाशा मिश्रा नहीं पहले की नियुक्ति भी सवालों में
मामला केवल तदाशा मिश्रा की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। केंद्र ने झारखंड के पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता की नियुक्ति का मुद्दा भी उठाया है।
केंद्र की याचिका के अनुसार, अनुराग गुप्ता को फरवरी 2025 में डीजीपी बनाया गया था, जबकि उस समय उनकी सेवानिवृत्ति में करीब तीन महीने ही बचे थे। केंद्र का तर्क है कि यह नियुक्ति भी प्रकाश सिंह फैसले में निर्धारित छह महीने की शेष सेवा की शर्त के संदर्भ में जांच के दायरे में आती है।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यह बड़ा सवाल है कि राज्य सरकारें डीजीपी नियुक्ति के लिए अपने स्तर पर कितनी अलग व्यवस्था बना सकती हैं और किस सीमा तक वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से तय दिशा-निर्देशों में बदलाव कर सकती हैं।
प्रकाश सिंह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
पुलिस सुधारों से जुड़े प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और संस्थागत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए थे।
डीजीपी की नियुक्ति के मामले में अदालत ने चयन प्रक्रिया में योग्यता, वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड और अनुभव जैसे पहलुओं को महत्व दिया। इसके अलावा चयनित पुलिस प्रमुख को स्थिरता देने के लिए न्यूनतम दो साल के कार्यकाल का सिद्धांत भी सामने रखा गया, भले ही अधिकारी की सामान्य सेवानिवृत्ति की तारीख उससे पहले क्यों न आती हो।
इसी व्यवस्था को लेकर वर्तमान विवाद खड़ा हुआ है। केंद्र का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के केवल उस हिस्से को नहीं अपनाया जा सकता जो दो साल के कार्यकाल की गारंटी देता हो, जबकि चयन प्रक्रिया और छह महीने की शेष सेवा जैसी शर्तों को अलग कर दिया जाए।
राज्य सरकार ने कहा नियमों पर दोबारा विचार करेंगे
सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा कि राज्य विवादित नियमों पर फिर से विचार करेगा। हालांकि, उन्होंने तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का बचाव करने की इच्छा भी जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को दो विकल्प दिए हैं। पहला, वह विवादित नियम पर दोबारा विचार कर सकता है। दूसरा, राज्य अदालत के सामने जवाबी हलफनामा दाखिल कर नियम का बचाव कर सकता है। मामले की अगली सुनवाई करीब एक सप्ताह बाद होगी।
तदाशा मिश्रा को अपना पक्ष रखने का मौका
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि किसी नियम को रद्द करने से किसी व्यक्ति की नियुक्ति प्रभावित होती है तो उस व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया गया है।
अदालत ने कहा कि मिश्रा अपना पक्ष अदालत के सामने रख सकती हैं और मामले में सहायता कर सकती हैं। इसलिए फिलहाल उनकी नियुक्ति को अवैध घोषित नहीं किया गया है। उनकी नियुक्ति का भविष्य अब इस बात पर भी निर्भर करेगा कि सुप्रीम कोर्ट विवादित नियम की वैधता को लेकर आगे क्या फैसला देता है।
दूसरे राज्यों के DGP नियम भी जांच के दायरे में आ सकते हैं
इस सुनवाई का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमित्र यानी अमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन को केवल झारखंड के नियमों तक सीमित नहीं रहने को कहा है।
अदालत ने उनसे दूसरे राज्यों में डीजीपी नियुक्ति से जुड़े कानूनों और नियमों की भी जांच करने को कहा है। UPSC को इस प्रक्रिया में उनकी सहायता करने के लिए कहा गया है। इससे संकेत मिलता है कि मामला केवल झारखंड की एक नियुक्ति तक सीमित नहीं रह सकता और अन्य राज्यों में डीजीपी नियुक्ति की प्रक्रिया भी न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है।
अब आगे क्या होगा
फिलहाल तीन स्तर पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। पहला, तदाशा मिश्रा अदालत में अपना जवाब दाखिल करेंगी। दूसरा, झारखंड सरकार बताएगी कि वह विवादित नियमों में बदलाव करती है या उनका कानूनी बचाव करती है। तीसरा, सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि 2025 के नियम प्रकाश सिंह फैसले के अनुरूप हैं या नहीं।
यदि अदालत अंततः विवादित नियम को रद्द करती है और उसके आधार पर हुई नियुक्तियों को भी अस्वीकार करती है, तो तदाशा मिश्रा की डीजीपी नियुक्ति पर असर पड़ सकता है। लेकिन 8 अक्टूबर 2026 की सुनवाई के बाद की स्थिति में उनकी नियुक्ति अभी रद्द नहीं हुई है और अंतिम निर्णय आना बाकी है।
इसलिए फिलहाल इस मामले को तदाशा मिश्रा की कुर्सी जाने के फैसले के तौर पर नहीं, बल्कि डीजीपी नियुक्ति के नियमों और सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह निर्देशों के बीच टकराव पर चल रही न्यायिक सुनवाई के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।

