सिसकता न्याय, सुलगता आक्रोश: समाज के जख्मों की पड़ताल!
राष्ट्र संवाद संवाददाता
मुंबई (इंद्र यादव) किसी भी देश के लिए सबसे डरावना पल वह होता है, जब वहां के लोग यह कहना शुरू कर दें कि “अदालत जाने से कोई फायदा नहीं।”
एक आम इंसान पुलिस या कोर्ट के पास तब जाता है जब वह हर तरफ से हार जाता है। उसके लिए कोर्ट की सीढ़ियां मंदिर की सीढ़ियों जैसी होती हैं, जहाँ उसे लगता है कि उसके साथ हुआ गलत अब ठीक हो जाएगा। लेकिन अगर उसे वहां सिर्फ ‘तारीख पर तारीख’ मिले, अगर उसे लगे कि सच बोलने वाले की हार और ताकतवर की जीत हो रही है, तो उसके मन का वह भरोसा टूट जाता है।
यह केवल केस नहीं, एक इंसान की उम्मीद का टूटना है
सोचिए उस गरीब मां के बारे में जिसका बेटा किसी दुर्घटना का शिकार हुआ, या उस किसान के बारे में जिसकी जमीन छीन ली गई। जब वे सालों तक न्याय के लिए भटकते हैं और अंत में खाली हाथ रह जाते हैं, तो उनके भीतर का दुख ‘गुस्से’ में बदल जाता है।
खतरनाक चुप्पी: जब जनता चुप हो जाती है और अदालत जाना छोड़ देती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह शांत है। इसका मतलब है कि वह अंदर ही अंदर सुलग रही है।
कानून अपने हाथ में लेना: जब न्याय नहीं मिलता, तो लोग खुद फैसला करने की सोचने लगते हैं। यही वह मोड़ है जहाँ से समाज में अराजकता और ‘भीड़ तंत्र’ की शुरुआत होती है।
क्रांति की आहट
इतिहास बताता है कि जनता बड़ी से बड़ी परेशानी सह लेती है, लेकिन अन्याय नहीं सहती। जब लोगों को लगता है कि कानून केवल अमीरों और रसूखदारों की ढाल बन गया है, तो उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचता। यही वह बिंदु है जहाँ एक ‘नई क्रांति’ जन्म लेती है।
“जिस घर में न्याय की रोशनी बुझ जाती है, वहां अंधेरा और आक्रोश अपना कब्जा कर लेते हैं।”
न्यायपालिका को केवल बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि एक आम आदमी की आंखों में चमकते भरोसे से नापा जाना चाहिए। अगर देश को बचाना है, तो न्याय को सस्ता, सुलभ और तेज बनाना ही होगा। वरना, जनता की हताशा जब बाहर निकलेगी, तो वह किसी भी व्यवस्था के लिए संभालना नामुमकिन होगा।

