शिबानी फाउंडेशन: यूपी के गांवों में शिक्षा की पहल
परिवर्तन कभी-कभी अत्यंत धीमे और शांत कदमों से आता है— किसी सुदूर गाँव की पाठशाला से या फिर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती किसी महिला के आत्मविश्वास से। हाल ही में उत्तर प्रदेश के कुछ पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा के दौरान, मुझे और मेरे पुत्र रितेश शर्मा को एक ऐसे ही सकारात्मक परिवर्तन का साक्षी बनने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ। ‘शिबानी इकोनॉमिक एजुकेशन डेवलपमेंट फाउंडेशन’ (Shibani Economic Education Development Foundation) नामक स्वयंसेवी संस्था के निमंत्रण पर की गई इस यात्रा ने हमारे मन में मानवीय संवेदनाओं का एक नया ज्वार जगा दिया।
बच्चों के साथ शिक्षा का आदान-प्रदान: सपनों को मिली नई भाषा
संस्था द्वारा संचालित तीन विद्यालयों के भ्रमण के दौरान हमने एक अद्वितीय शैक्षिक परिवेश देखा। जिन क्षेत्रों में आर्थिक विपन्नता बचपन को पंगु बना देती है, वहाँ यह फाउंडेशन शिक्षा की ज्योति जला रहा है। यहाँ छात्र न केवल पूरी तरह नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि उनकी लेखन सामग्री, पुस्तकें और अन्य आवश्यक संसाधन भी संस्था द्वारा ही उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मैंने और रितेश ने उन मासूम बच्चों के साथ काफी समय बिताया। उनके साथ संवाद करते हुए हमें यह गहरा अहसास हुआ कि यदि अवसर मिले, तो ये निर्दोष बच्चे ही भविष्य में देश के सुदृढ़ आधार स्तंभ बनेंगे। उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति और सरल प्रश्नों ने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया।
महिला स्वावलंबन: आत्म-प्रत्यय का एक नया अध्याय
केवल औपचारिक शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा नहीं है; इस विचार के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए महिलाओं को जिस प्रकार आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, वह वास्तव में अनुकरणीय है। ‘शिबानी इकोनॉमिक एजुकेशन डेवलपमेंट फाउंडेशन’ महिलाओं को सिलाई और अचार बनाने जैसे व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने के साथ-साथ नि:शुल्क सिलाई मशीनें और उत्पादन सामग्री भी उपलब्ध करा रहा है।
महिलाओं से बातचीत कर मैंने अनुभव किया कि वे अब केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने वाली साहसी योद्धा बन चुकी हैं। जहाँ आज के दौर में भी बेटियों और बहुओं का बाहर निकलना सहज नहीं है, वैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी इस संस्था ने महिलाओं के भीतर जो आत्मविश्वास जगाया है, उसे देखकर हमें असीम सुखद अनुभूति हुई।
समर्पित नेतृत्व की एकनिष्ठ साधना
इस संपूर्ण मानवीय अभियान के पीछे संस्था की अध्यक्षा श्रीमती बर्नाली खारा और उपाध्यक्ष व शारदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर शिवराम खारा का सशक्त नेतृत्व है। साथ ही, एनटीपीसी (NTPC) के पूर्व महाप्रबंधक एवं सलाहकार परिषद के सदस्य श्रीवास्तव जी का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान है। इन महानुभावों ने इस यात्रा में हमारा विशेष सहयोग किया। अपने निजी वाहन से हमें उन दुर्गम क्षेत्रों तक ले जाना और निर्धनतम लोगों के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति ने हमें अत्यंत प्रभावित किया। विशेष रूप से श्रीमती बर्नाली खारा और प्रोफेसर शिवराम खारा का व्यक्तिगत प्रयास और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता वंदनीय है।
उत्तर प्रदेश के उन गाँवों की धूल-मिट्टी के बीच हमें जो अनुभव प्राप्त हुए, वे केवल एक यात्रा का विवरण मात्र नहीं हैं, बल्कि मानवता का एक दुर्लभ पाठ हैं। वंचित बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने और महिलाओं को स्वावलंबी बनाने की यह पहल समाज में एक विशिष्ट पहचान बना रही है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मानवता की यह सुगंध हर जागरूक व्यक्ति को पीड़ितों और वंचितों की सहायता के लिए प्रेरित करेगी।
एक विनम्र आह्वान
व्यक्तिगत प्रयास किसी बड़े परिवर्तन के लिए पर्याप्त नहीं होते। अतः, मैं विनम्रतापूर्वक निम्नलिखित विषयों पर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ:
• सरकार से अनुरोध: मैं सरकार और संबंधित अधिकारियों से अनुरोध करता हूँ कि इन वंचित क्षेत्रों के शैक्षिक और आर्थिक उत्थान के लिए विशेष योजनाएँ लागू की जाएँ, ताकि इस संस्था के प्रयासों को और गति मिल सके। विशेषकर महिलाओं के स्वावलंबन हेतु सरकारी सहायता अत्यंत अनिवार्य है।
• सक्षम नागरिकों से अपील: समाज के हर जागरूक और सामर्थ्यवान व्यक्ति से मेरा आह्वान है कि वे इन निराश्रित लोगों की ओर मदद का हाथ बढ़ाएँ। आपका छोटा सा सहयोग किसी बच्चे का भविष्य बदल सकता है।
आइए, हम सब मिलकर इस मानवीय यात्रा के सहभागी बनें। सरकारी और गैर-सरकारी, दोनों पक्षों का सकारात्मक सहयोग और संवेदनशीलता ही इस पिछड़े समाज को मुख्यधारा में लाने में सक्षम होगी।
”सेवा ही परम धर्म है— और इस धर्म का पालन जब सरकार और समाज मिलकर करते हैं, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है।”
मूल लेखिका
मनीषा शर्मा
अनुवादक:– रितेश शर्मा
पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

