लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
सावन के पावन महीने में जब चारों ओर हरियाली छाई रहती है और बारिश की फुहारें मन को भिगो देती हैं, तब सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएं भी अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए ऐसे आयोजन करती हैं जो परंपरा को जीवंत बनाए रखें। इसी कड़ी में जमशेदपुर की प्रतिष्ठित बहुभाषीय संस्था ‘सहयोग’ ने एक यादगार सावन मिलन समारोह का आयोजन कर शहर की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाई दी। यह आयोजन न केवल मनोरंजन का साधन बना, बल्कि इसने आपसी सौहार्द, सामाजिक एकजुटता और लोक संस्कृति के संरक्षण का सशक्त संदेश भी दिया। तुलसी भवन स्थित चित्रकूट कक्ष में आयोजित इस भव्य समारोह ने उपस्थित हर सदस्य के मन को भक्ति और उल्लास के रंग में रंग दिया।
भव्य सावन मिलन समारोह की झलकियां
बहुभाषीय संस्था ‘सहयोग’ के तत्वावधान में तुलसी भवन स्थित चित्रकूट कक्ष में सावन मिलन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सदस्याओं ने पारंपरिक परिधानों में भाग लेते हुए सावन की लोक संस्कृति, आपसी सौहार्द और सामाजिक एकजुटता का संदेश दिया।
समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और शिव वंदना से हुआ। रीना सिन्हा ने पूजन थाली तैयार की और अतिथियों व सदस्याओं का रोली-टीका लगाकर स्वागत किया। सुदीप्ता जेठी राउत ने शिव वंदना प्रस्तुत की।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में ‘रिमझिम गिरे सावन’ सहित विभिन्न गीतों पर एकल एवं सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किए गए। अरुणा झा ने महाकवि विद्यापति की सावन केंद्रित रचनाओं का पाठ किया। विद्या तिवारी, अरुणा झा और संध्या सिन्हा ने पारंपरिक कजरी प्रस्तुत की, जबकि संगीता मिश्रा ने भजन से माहौल भक्तिमय बना दिया।
कार्यक्रम का संयोजन एवं मंच संचालन अरुणा झा ने किया। संध्या सिन्हा ने स्वागत भाषण दिया। अध्यक्षता डॉ. रागिनी भूषण ने की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन परंपराओं को सहेजने के साथ सामाजिक प्रगाढ़ता को मजबूत करते हैं। अंत में भारती ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और सामाजिक सरोकार
इस सावन मिलन समारोह की विशेषता यह रही कि इसमें पीढ़ियों के बीच का सेतु स्पष्ट दिखाई दे रहा था। जहां एक ओर वरिष्ठ सदस्याओं ने कजरी और विद्यापति की रचनाओं के माध्यम से शास्त्रीय और लोक परंपरा की गहराई को छुआ, वहीं युवा सदस्याओं ने समूह नृत्य के जरिए आधुनिक लय में परंपरा को प्रस्तुत किया। डॉ. रागिनी भूषण के अध्यक्षीय उद्बोधन ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे आयोजन महज उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के आवश्यक उपकरण हैं। तुलसी भवन का चित्रकूट कक्ष देर शाम तक तालियों की गड़गड़ाहट और भक्तिरस से गूंजता रहा। आयोजन की सफलता में संयोजक अरुणा झा की सूझबूझ और सदस्याओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी निर्णायक रही। जमशेदपुर जैसे औद्योगिक नगर में ‘सहयोग’ जैसी संस्थाओं का यह प्रयास साबित करता है कि विकास की दौड़ में भी संस्कृति की जड़ें गहरी बनी हुई हैं। अधिक जानकारी के लिए आप झारखंड पर्यटन की वेबसाइट देख सकते हैं।

