सेवक कभी मालिक नहीं हो सकता: लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक
इंद्र यादव | मुंबई
लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच साल में एक बार मतदान करना नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे लोगों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराना भी है। चुनाव के समय जनता के सामने हाथ जोड़कर खुद को सेवक बताने वाले नेता सत्ता मिलते ही अक्सर खुद को मालिक समझने लगते हैं। यही मानसिकता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री हो या मंत्री—कोई भी पद जनता से ऊपर नहीं है। देश की संपत्ति, खजाना और व्यवस्था किसी व्यक्ति या परिवार की निजी जागीर नहीं, बल्कि जनता की साझी धरोहर हैं। नेता केवल जनता द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी निभाने वाले जनप्रतिनिधि हैं, देश के मालिक नहीं।
संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। आम नागरिक से लेकर सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति तक, कानून के प्रति जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। पद की गरिमा और सुरक्षा आवश्यक हैं, लेकिन उनके नाम पर वीआईपी संस्कृति, आम जनता को परेशान करना और खुद को विशेषाधिकार प्राप्त समझना उचित नहीं है।
सत्ता का अर्थ अधिकारों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का निर्वहन है। जनप्रतिनिधियों को वेतन और सुविधाएं जनता के करों से मिलती हैं तथा उनकी कुर्सी जनता के विश्वास और मतों पर टिकी होती है। इसलिए उन्हें हर हाल में जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए जागरूक नागरिक और जवाबदेह नेतृत्व दोनों जरूरी हैं। सरकारें बदलती हैं, नेता आते-जाते हैं, लेकिन जनता लोकतंत्र की स्थायी शक्ति है। जिस दिन नागरिक अपने अधिकारों और अपनी ताकत को पहचान लेंगे, उस दिन सत्ता का अहंकार अपने आप कमजोर पड़ने लगेगा।
याद रखना होगा—नेता जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सी सर्वोच्च नहीं, जनता सर्वोच्च है।

