गोल्ड मेडल गले में, ट्रॉली हाथों में: आखिर खिलाड़ियों के सम्मान में सिस्टम पीछे क्यों?
देवानंद सिंह
देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। यह उपलब्धि वर्षों की मेहनत, अनुशासन, संघर्ष और त्याग का परिणाम होती है। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर तिरंगे का मान बढ़ाकर लौटी किसी खिलाड़ी की तस्वीर अपने सामान से भरी ट्रॉली खुद संभालते हुए सामने आती है, तो सवाल केवल उसके स्वागत का नहीं रह जाता, बल्कि उस व्यवस्था पर उठता है जो खिलाड़ियों के सम्मान की बातें तो करती है, लेकिन उनके सम्मानजनक स्वागत की बुनियादी जिम्मेदारी भी हमेशा निभा नहीं पाती।
संजू देवी यादव की उपलब्धि पूरे देश, छत्तीसगढ़ और कोरबा के लिए गर्व का विषय है। एशियन गेम्स 2026 में भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने संसाधनों की कमी भी हमेशा बाधा नहीं बन सकती। लेकिन उनकी उपलब्धि के साथ सामने आई एयरपोर्ट की तस्वीर ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया जिस बेटी की सफलता पर पूरा देश गर्व कर रहा है, उसके स्वागत के लिए क्या व्यवस्था के पास पर्याप्त संवेदनशीलता और तैयारी नहीं होनी चाहिए थी?
यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी खिलाड़ी ने अपना सामान खुद क्यों उठाया। आत्मनिर्भर होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक है। असली सवाल यह है कि क्या देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर लौटने वाले खिलाड़ियों के स्वागत और सम्मान को लेकर हमारी व्यवस्था में कोई स्पष्ट सोच है? क्या खिलाड़ियों का सम्मान केवल समारोहों, मालाओं, प्रशस्ति-पत्रों और घोषणाओं तक सीमित रह गया है? और क्या किसी खिलाड़ी की उपलब्धि को पहचानने के लिए तब तक इंतजार किया जाता है, जब तक उसकी तस्वीर या कहानी सार्वजनिक चर्चा का विषय न बन जाए?
विडंबना यह है कि पदक जीतने के बाद खिलाड़ियों के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित होते हैं, मंच सजते हैं, बधाइयों का सिलसिला चलता है और पुरस्कार राशि के चेक सौंपे जाते हैं। संजू देवी यादव के सम्मान में भी समाज और प्रशासन की ओर से कार्यक्रम हुए तथा राज्य सरकार की ओर से 51 लाख रुपये की सम्मान राशि का चेक दिया गया। यह स्वागतयोग्य कदम है। खिलाड़ियों को आर्थिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए, उनकी उपलब्धियों को सार्वजनिक पहचान मिलनी चाहिए और उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस नीतियां भी होनी चाहिए। लेकिन इन सबके बीच एक बुनियादी प्रश्न अपनी जगह कायम रहता है—क्या सम्मान का अर्थ केवल पदक जीतने के बाद दिया जाने वाला पुरस्कार है, या खिलाड़ी के पूरे संघर्ष और उसकी गरिमा को समझना भी हमारी जिम्मेदारी है?
खिलाड़ी जब मैदान में उतरता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं खेलता। उसकी जीत के साथ देश का नाम जुड़ता है, राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ती है और उसके क्षेत्र के युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। कबड्डी जैसे खेल में, जहां शारीरिक क्षमता, रणनीति, टीम भावना और कठिन अभ्यास की बड़ी भूमिका होती है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना साधारण उपलब्धि नहीं है। ऐसे खिलाड़ियों को केवल सफलता के क्षण में याद करना पर्याप्त नहीं। उनके प्रशिक्षण, सुविधाओं, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा और भविष्य की जरूरतों के प्रति भी सरकार तथा खेल प्रशासन को जवाबदेह होना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना होगा कि एक तस्वीर पूरे घटनाक्रम की सभी परिस्थितियों को अपने आप स्पष्ट नहीं करती। केवल तस्वीर के आधार पर किसी अधिकारी या संस्था की लापरवाही का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि इस तस्वीर ने खिलाड़ियों के स्वागत और सम्मान की व्यवस्थाओं पर बहस छेड़ी है, तो उसे महज एक वायरल दृश्य मानकर नजरअंदाज करना भी गलत होगा। इसकी जगह यह समीक्षा होनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से लौटने वाले खिलाड़ियों के लिए स्वागत, समन्वय और आवश्यक सहायता की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
खेलों को बढ़ावा देने के लिए बड़े बजट, आधुनिक स्टेडियम और प्रतियोगिताओं के आयोजन की घोषणाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन खेल संस्कृति केवल बुनियादी ढांचे से नहीं बनती; वह खिलाड़ियों के प्रति व्यवहार और उनकी मेहनत के प्रति सम्मान से भी बनती है। यदि किसी खिलाड़ी की उपलब्धि पर सरकार और समाज गर्व करते हैं, तो उस गर्व की अभिव्यक्ति व्यवहार में भी दिखनी चाहिए। खिलाड़ियों को सम्मान देने के लिए किसी तस्वीर के वायरल होने या जनाक्रोश पैदा होने की प्रतीक्षा नहीं होनी चाहिए।
संजू देवी यादव की सफलता हमें दो संदेश देती है। पहला, देश की बेटियां अपनी प्रतिभा और परिश्रम से दुनिया में भारत का नाम रोशन कर रही हैं। दूसरा, ऐसी बेटियों को सम्मान देने के मामले में हमारी व्यवस्था को अभी और संवेदनशील, जिम्मेदार तथा जवाबदेह बनने की जरूरत है। सम्मान राशि देना उपलब्धि की स्वीकृति है, लेकिन सम्मानजनक व्यवहार उस स्वीकृति की वास्तविक अभिव्यक्ति है।
आखिरकार, खिलाड़ी देश के लिए पदक जीतते हैं, लेकिन उनके सम्मान की जिम्मेदारी पूरे देश की होती है। संजू देवी यादव के गले में चमकता गोल्ड मेडल भारत की जीत का प्रतीक है। उनकी तस्वीर से उठा सवाल व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का अवसर है। जरूरत इस बात की है कि खिलाड़ियों का सम्मान केवल समारोहों और घोषणाओं में नहीं, बल्कि हर उस व्यवहार में दिखाई दे जो उनकी मेहनत, उपलब्धि और गरिमा के अनुरूप हो। क्योंकि देश का मान बढ़ाने वाली बेटियों को सम्मान देना कोई एहसान नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उनके योगदान का सच्चा प्रत्युत्तर है।

