लोकआस्था के रंग में रंगा सरायकेला
*पदमपुर में धनपति सरदार के घर करम राजा की पूजा, चांडिल में व्रतियों का सम्मान; मांदर-नगाड़े पर थिरके कदम*
मृत्युंजय बर्मन
राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला
जावा की हरियाली, करम डाली की पूजा और मांदर-नगाड़े की थाप के बीच मंगलवार को सरायकेला और आसपास का ग्रामीण इलाका प्रकृति पर्व करम की भक्ति में डूबा रहा। पदमपुर गांव में झारखंड आंदोलनकारी धनपति सरदार के घर के आंगन में करम राजा की पूजा पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ हुई। पूजा में भाई-बहन के प्रेम, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की गई।
करम पर्व की तैयारी करीब एक सप्ताह पहले से शुरू हो गई थी। बालिकाओं ने टोकरियों में जौ, गेहूं, धान, मक्का समेत सात प्रकार के अनाज बोकर जावा तैयार किया। करम डाली की स्थापना के साथ पूजा-अर्चना हुई। पूजा के दौरान करमू-धरमू की पारंपरिक कथा भी सुनाई गई और करम वृक्ष के सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला गया।
पूजा के बाद लोकगीतों और पारंपरिक नृत्य का दौर चला। ‘आज तोरे करम राजा घरे द्वारे…’ जैसे गीतों पर महिलाएं और युवतियां मांदर-नगाड़े की थाप पर झूमती नजर आईं। पदमपुर में बुजुर्गों के साथ युवाओं और महिलाओं की भागीदारी ने पर्व को सामुदायिक रंग दिया।
इधर चांडिल में समाजसेवी अरुण बागाड़िया और विश्व कालिन्दी ने करम डाली लेकर पूजा के लिए जा रहे व्रतियों को कंधे पर तौलिया डालकर सम्मानित किया। इस पहल ने पर्व की पारंपरिक आस्था के साथ सामाजिक सम्मान की भावना को भी जोड़ा।
करम पर्व कृषि, प्रकृति और भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा लोकपर्व है। ग्रामीणों के लिए यह अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना का अवसर भी है।

