लेखक: श्याम किशोर चौबे
‘समय के साथ’: एक जरूरी किताब
‘समय के साथ’ सीनियर पत्रकार आनंद सिंह के लेखों का संग्रह है। इसमें छोटे-बड़े 23 लेख हैं। इसी में भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी का समसामयिक मुद्दों पर इंटरव्यू भी है। यह इंटरव्यू पत्रकारिता पर केंद्रित है, जो पढ़ने-गुनने लायक है।
महज 83 पृष्ठों की यह किताब देश के कई शहरों का भ्रमण कराती है। सांस्थानिक पत्रकारिता के दौर में आनंद सिंह जिन-जिन शहरों में रहे, उनमें से कई से वे परिचय कराते हैं। वे लोकमत समाचार, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान जैसे कई अखबारों में, कई शहरों में काम कर चुके हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सांस्थानिक पत्रकारिता से आजिज आकर, बोर होकर वे फिलहाल पर्यावरण पर केंद्रित एक छोटी सी किंतु महत्वपूर्ण पत्रिका के संपादन कार्य में लगे हुए हैं। यह पत्रिका जमशेदपुर के विधायक सरयू राय द्वारा संपोषित है।
सरयू राय एकीकृत बिहार के दौरान एमएलसी थे, फिर झारखंड अलग होने पर वे इधर ही आ गये। पहले भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गये, मंत्री भी बने लेकिन संगठन की आंतरिक गुटबाजियों के कारण वे निर्दलीय और फिर जदयू के प्लेटफार्म से विधायक चुने गये। वे मिशनरी राजनीति के लिए जाने जाते हैं। आनंद सिंह उनसे जुड़े तो उन पर आधारित जो विचार बने, उनको भी अपनी किताब में जगह दी। यह कोई अजूबा नहीं है।
सरयू राय मूलतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कालक्रम में जनसंघ तथा बीजेपी से जुड़े राजनेता हैं। उनसे आनंद सिंह जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद ऑपरेशन सिंदूर पर ‘रविकिशन तो समोसे के साइज पर अटक गये!’, ‘संसद में ये कैसी लफ्फाजी’, ‘वंचितों, दलितों को आवाज दी है लालू ने’, ‘दिल्ली का रण साधने को टैक्स में छूट!’, ‘विदेश नीति की ‘दिनौंधी’ का इलाज’ जैसे विचार उनके न केवल उनके मन में आये, अपितु उन्होंने उनको लिपिबद्ध कर अपनी किताब में भी पिरोया। इससे समझा जा सकता है कि वे जोखिम उठाने के आदी रहे हैं, जो पत्रकारिता का सामान्य गुण है, जो अब गायब होता जा रहा है।
वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन के पिता धाकड़ आदिवासी नेता शिबू सोरेन के देहांत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हेमंत की भावुक मुलाकात को भी आनंद सिंह ने इस किताब में जगह दी है। उनकी खासियत है, संक्षिप्ति के दायरे में बड़ी बातें कह जाना, जो इस किताब के पन्नों पर नजर आता है।
आनंद सिंह ने ‘श्री सरयू राय: सबसे अलग’ जैसी मन की बात लिखी है, तो बेजा न जाए सैयद आदिल हुसैन की कहानी, सरकार मदद करे तो प्रशांत जीत सकते हैं मिस्टर वल्र्ड ओर मिस्टर एशिया का खिताब, वाटर कलर पेंटिंग से झूमर को नया आयाम दिया है प्रवीण ने और उभरता सितारा: कर्तव्य पांडेय जैसा भी लेख भी लिखा है। यहां तक कि देसी श्वान पर भी लुटाएं प्रेम और पैसा जैसा विषय भी उनकी नजरों से अछूता न रहा।
‘जेन अल्फा’ को भले न याद हो, लेकिन उसकी बाद की पीढ़ियों को जरूर याद होगा, 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान चलाया था। उस अभियान में भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता तक अपने-अपने कार्यक्षेत्र में झाड़ू चलाते नजर आये थे। प्रधानमंत्री के पास इतना समय कहां से हो सकता है कि वे रोज-रोज झाड़ू चलाएं, लेकिन बाकी नेताओं ने भी झाड़ू को तिलांजलि दे दी। आनंद सिंह ने ‘रोज चलाएं स्वच्छता अभियान’ लिखकर भाजपा नेताओं को खूब याद दिलायी है।
समसामयिक विषयों पर निश्चय ही यह पढ़ने लायक किताब है।
समीक्ष्य कृति: समय के साथ
लेखक: आनंद सिंह
मुद्रक: झारखंड प्रिंटर्स प्राइवेट लिमिटेड, जमशेदपुर
सहयोग राशि: 251/रु मात्र

