संकल्प का शोर, सवालों की गूंज
विकसित भारत का सपना और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
देवानंद सिंह
दिल्ली की सियासत में पिछले दो दिनों ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है देश को आगे ले जाने के संकल्प की परीक्षा होगी या सत्ता से जवाब मांगने के अधिकार की? एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का भरोसा दिलाते हुए कहते हैं, “हम करके रहेंगे।” दूसरी तरफ मतदाता अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को लेकर विपक्ष सड़क पर उतरता है। प्रदर्शन, नेताओं की हिरासत और उसके बाद महात्मा गांधी की समाधि पर पहुंचकर सरकार की सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करने की राजनीतिक पहल इन घटनाओं ने सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव को एक बार फिर लोकतंत्र की बहस के केंद्र में ला दिया है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि किसका नारा ऊंचा है, किसका प्रदर्शन बड़ा है या किसकी राजनीतिक रणनीति अधिक प्रभावी है। असली सवाल है क्या देश में विकास के संकल्प और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सवाल एक साथ आगे बढ़ सकते हैं?
प्रधानमंत्री का विकसित भारत का संकल्प अपनी जगह महत्वपूर्ण है। 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना, दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करना, विनिर्माण और तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाना तथा युवाओं के लिए नए अवसर पैदा करना किसी छोटे लक्ष्य की कल्पना नहीं है। देश को बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए। लेकिन बड़े लक्ष्य घोषित कर देना और उन्हें जमीन पर उतार देना, दो अलग-अलग बातें हैं। संकल्प की असली ताकत मंच से बोले गए शब्दों में नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए बदलाव में दिखाई देती है।
रोजगार की तलाश में भटकते युवा, महंगाई से जूझते परिवार, खेती की चुनौतियों से परेशान किसान और बेहतर शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की प्रतीक्षा करते नागरिक यह जानना चाहेंगे कि विकसित भारत का सपना उनके वर्तमान को कितना बेहतर बनाएगा। आखिर विकास का अर्थ केवल अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ना नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी में सुरक्षा, सम्मान और अवसर बढ़ना भी है।
इसी तरह लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव करा देना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों को सुना जाए, मतदाता के अधिकारों की रक्षा हो और संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहे। यही वजह है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष के सवालों को महज राजनीतिक शोर कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इन सवालों के पीछे कितनी तथ्यात्मक मजबूती है, यह प्रमाणों से तय होगा; लेकिन उनका जवाब भी प्रमाणों से ही दिया जाना चाहिए।
यदि विपक्ष के आरोप गलत हैं, तो पारदर्शी तथ्यों के साथ उन्हें गलत साबित किया जाए। यदि प्रक्रिया में कोई कमी है, तो उसे दूर किया जाए। लोकतंत्र में किसी संस्था की प्रतिष्ठा सवालों से नहीं गिरती, बल्कि तब खतरे में पड़ती है, जब सवालों का जवाब देने के बजाय अविश्वास बढ़ने दिया जाता है।याद रखना चाहिए कि मतदाता केवल सरकार चुनने वाला नागरिक नहीं, लोकतंत्र का वास्तविक मालिक भी है। उसके नाम, उसकी पहचान और उसके मताधिकार से जुड़ी हर प्रक्रिया में पारदर्शिता अनिवार्य है। चुनाव की निष्पक्षता पर भरोसा जितना मजबूत होगा, लोकतंत्र की जड़ें उतनी ही गहरी होंगी।
पिछले दो दिनों का घटनाक्रम विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल खड़े करता है। संसद में आवाज उठाना, सरकार से जवाब मांगना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि मतदाता अधिकारों से जुड़े सवालों पर विपक्ष सड़क पर उतरता है, तो उसे केवल सत्ता विरोध की राजनीति कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। लेकिन विपक्ष को भी समझना होगा कि हर राजनीतिक आरोप अपने आप में प्रमाण नहीं बन जाता। लोकतंत्र में विश्वसनीयता केवल विरोध करने से नहीं, बल्कि तथ्यों के साथ विरोध करने से अर्जित होती है।
महात्मा गांधी की समाधि पर पहुंचकर सरकार की सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करना प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन गांधी के विचार केवल प्रतीकों से जीवित नहीं रहते। सत्य, अहिंसा, नैतिक साहस और जवाबदेही उनके विचारों का मूल थे। सत्ता को असहमति के प्रति उदार होना चाहिए और विपक्ष को अपने संघर्ष में सत्य तथा मर्यादा का पालन करना चाहिए। गांधी के नाम पर राजनीति करने से अधिक जरूरी है गांधी के मूल्यों के अनुरूप राजनीतिक आचरण करना।
यहां सत्ता की जिम्मेदारी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि सरकार के पास निर्णय लेने की शक्ति और व्यवस्था चलाने का दायित्व दोनों होते हैं। बहुमत शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन सवालों से मुक्त होने का प्रमाणपत्र नहीं। लोकतंत्र में सरकार की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि उसके खिलाफ कितनी आवाजें उठ रही हैं, बल्कि इससे मापी जाती है कि वह उन आवाजों का सामना कितनी पारदर्शिता और आत्मविश्वास से करती है।
इसी तरह विपक्ष की सफलता इस बात में नहीं है कि वह कितनी बार संसद या सड़क पर टकराव पैदा करता है, बल्कि इसमें है कि वह जनता के वास्तविक मुद्दों को कितनी मजबूती से उठाता है और उनके समाधान के लिए कितना विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करता है।
प्रधानमंत्री ने जाति के आधार पर समाज को बांटने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। निश्चित रूप से सामाजिक विभाजन किसी भी राष्ट्र की प्रगति में बाधा है। लेकिन सामाजिक एकता का रास्ता केवल भाषणों से नहीं निकलता। इसके लिए अवसरों की समानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय और आर्थिक असमानता को कम करने के ठोस प्रयास भी जरूरी हैं। जिस विकसित भारत की कल्पना की जा रही है, उसमें नागरिक की पहचान उसके अवसरों से होनी चाहिए, न कि उसकी मजबूरियों से।
आज देश को ऐसी राजनीति की जरूरत है जो विकास और लोकतंत्र को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा न करे। आर्थिक प्रगति के लिए स्थिरता जरूरी है, लेकिन स्थिरता के नाम पर सवालों की अनदेखी नहीं हो सकती। विपक्ष की सक्रियता जरूरी है, लेकिन विरोध के नाम पर हर संस्थागत प्रक्रिया को संदेह के घेरे में खड़ा करना भी समाधान नहीं है। रास्ता टकराव को स्थायी राजनीति बनाने में नहीं, बल्कि तथ्यों, संवाद और जवाबदेही से विश्वास बहाल करने में है।
प्रधानमंत्री का “हम करके रहेंगे” तभी सार्थक होगा, जब विकास के दावे धरातल पर दिखाई दें और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों का विश्वास मजबूत बना रहे। विपक्ष का संघर्ष तभी सार्थक होगा, जब वह मतदाता के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस प्रमाणों और स्पष्ट मांगों के साथ खड़ा हो। दोनों को यह समझना होगा कि जनता उनके नारों की दर्शक भर नहीं है; वह उनके कामकाज का मूल्यांकन करने वाली सर्वोच्च शक्ति है।
सवाल यह नहीं कि सत्ता का संकल्प बड़ा है या विपक्ष का संघर्ष। सवाल यह है कि इन दोनों के बीच जनता का हित कितना बड़ा है।
2047 का भारत केवल ऊंची आर्थिक विकास दर, बड़ी परियोजनाओं और वैश्विक प्रतिष्ठा से विकसित नहीं बनेगा। वह तब विकसित बनेगा, जब नागरिकों को बेहतर जीवन मिलेगा, मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहेगा, संस्थाओं की निष्पक्षता पर भरोसा कायम रहेगा और सत्ता को यह एहसास बना रहेगा कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का ही होता है।
आखिरकार, देश को नारों की नहीं, नतीजों की राजनीति चाहिए। संकल्प की विश्वसनीयता काम से तय होगी और विरोध की सार्थकता प्रमाण से। जनता को तय करना है कि वह किस राजनीति पर भरोसा करेगी सिर्फ वादे करने वाली राजनीति पर, सिर्फ विरोध करने वाली राजनीति पर या उस राजनीति पर जो विकास के साथ जवाबदेही को भी अनिवार्य मानती है।
क्योंकि लोकतंत्र में संकल्प सत्ता लेती है, सवाल विपक्ष उठाता है, लेकिन हिसाब जनता मांगती है।

