संकल्प बनाम सवाल : जनता तय करे देश किस दिशा में जाए
देवानंद सिंह
देश की राजधानी दिल्ली में बुधवार को राजनीति के दो अलग-अलग दृश्य दिखाई दिए। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प दोहराते हुए कहा “हम करके रहेंगे।” दूसरी ओर विपक्षी दलों ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों से जुड़े सवालों को लेकर सरकार और निर्वाचन व्यवस्था पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों की लंच बैठक हुई और इसके बाद प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। लोकतंत्र में यह विरोधाभास असामान्य नहीं, लेकिन सवाल यह है कि इन दोनों तस्वीरों के बीच देश की जनता अपने भविष्य को किस नजर से देखे?
प्रधानमंत्री मोदी ने विकसित भारत के लक्ष्य को केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सामूहिक संकल्प के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना, दुनिया की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होना, आत्मनिर्भर बनना, वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनना और अंतरिक्ष से लेकर खेल तक नई ऊंचाइयां हासिल करना संभव है। उनका भरोसा देश की जनशक्ति और सामूहिक प्रयास पर है। निश्चित रूप से किसी भी राष्ट्र के लिए बड़े लक्ष्य जरूरी हैं। लक्ष्य जितना बड़ा होगा, नीति, संसाधन और मेहनत की दिशा उतनी ही स्पष्ट होगी।
लेकिन लोकतंत्र में केवल लक्ष्य पर्याप्त नहीं होते। उन लक्ष्यों तक पहुंचने के रास्ते पर सवाल पूछने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विपक्ष का काम केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगना भी है। यदि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची या निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाता है तो उन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता से दिया जाना चाहिए।
यहीं बुधवार की दूसरी तस्वीर महत्वपूर्ण हो जाती है। विपक्षी नेताओं का प्रदर्शन, हिरासत और प्रियंका गांधी के पुलिस पर लगाए गए आरोप लोकतंत्र की उस बहस को सामने लाते हैं जिसमें असहमति की जगह और विरोध के अधिकार पर चर्चा जरूरी है। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि मजबूत लोकतंत्र वह नहीं जहां विरोध की आवाज दब जाए, बल्कि वह है जहां सरकार अपने आलोचकों के सवालों का भी जवाब देने का साहस रखती हो। वहीं विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठाते समय उसके पास ठोस प्रमाण और जिम्मेदार भाषा हो।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जाति के आधार पर समाज को बांटने को बड़ी चुनौती बताया। यह बात भी विचारणीय है। जब देश 2047 के भारत की कल्पना कर रहा है, तब राजनीति को समाज को विभाजित करने के बजाय जोड़ने की दिशा में बढ़ना होगा। विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, रोजगार बढ़े, शिक्षा और स्वास्थ्य मजबूत हों, किसान और मजदूर सुरक्षित हों तथा युवाओं को अवसर मिले विकसित भारत की असली कसौटी यही होगी।
भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी बड़ी है। प्रधानमंत्री का “हम करके रहेंगे” संकल्प तभी सार्थक होगा, जब संस्थाएं मजबूत हों और नागरिकों का विश्वास कायम रहे। विपक्ष का “हम नहीं हटेंगे” वाला प्रतिरोध भी तभी सार्थक होगा, जब वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं और प्रमाण आधारित सवालों के साथ खड़ा हो।
आखिरकार फैसला सत्ता या विपक्ष के नारों से नहीं, जनता के विवेक से होगा। जनता को तय करना है कि वह किस राजनीति पर भरोसा करती है सिर्फ वादों पर, सिर्फ विरोध पर या उस राजनीति पर जो विकास के साथ लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी बराबर महत्व देती है। लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास है और 2047 का भारत भी आखिर उसी जनता के निर्णय से बनेगा।
*बॉक्स रंगीन बोल्ड*
*प्रधानमंत्री का “हम करके रहेंगे” संकल्प तभी सार्थक होगा, जब संस्थाएं मजबूत हों और नागरिकों का विश्वास कायम रहे। विपक्ष का “हम नहीं हटेंगे” वाला प्रतिरोध भी तभी सार्थक होगा, जब वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं और प्रमाण आधारित सवालों के साथ खड़ा हो।*

