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    ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों के इर्द-गिर्द छिड़ी वैचारिक लड़ाई के मायने

    News DeskBy News DeskJune 29, 2025No Comments5 Mins Read
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    ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों के इर्द-गिर्द छिड़ी वैचारिक लड़ाई के मायने
    देवानंद सिंह
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श को गरमा दिया है। उनके अनुसार, “आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में जोड़े गए ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों की आज आवश्यकता है या नहीं—इस पर देश में विचार होना चाहिए। उनका यह कथन केवल एक ऐतिहासिक तथ्य नहीं दर्शाता, बल्कि इससे एक गहरे वैचारिक मतभेद का संकेत मिलता है—एक ऐसा मतभेद जो भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा को परिभाषित करता है।

     

    दत्तात्रेय होसबाले का कहना है कि ये दोनों शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं थे और इन्हें 42वें संविधान संशोधन (1976) के जरिए आपातकाल के दौरान जोड़ा गया था। ऐतिहासिक दृष्टि से यह बात सही है, लेकिन यह भी सच है कि इन शब्दों का मूल भाव संविधान की विभिन्न धाराओं में पहले से निहित था। अनुच्छेद 14, 15, 25, 38, 39 जैसे अनुच्छेद समानता, सामाजिक न्याय और धर्म-स्वतंत्रता की भावना को पहले से ही प्रतिबिंबित करते हैं। ऐसे में, यह कहना कि ये शब्द संविधान की आत्मा से असंगत हैं, सरलीकरण की पराकाष्ठा है।

     

    कांग्रेस ने होसबाले के बयान को ‘संविधान विरोधी मानसिकता’ की पुनरावृत्ति बताया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरएसएस पर बाबा साहेब अंबेडकर, नेहरू और संविधान निर्माण प्रक्रिया का लंबे समय से अपमान करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस का उद्देश्य कभी संविधान के प्रति निष्ठा नहीं रहा है, बल्कि वह ‘मनुस्मृति’ जैसी पितृसत्तात्मक ग्रंथों को मार्गदर्शक मानता रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इसे “संविधान बदलने की साजिश का हिस्सा” कहा और बीजेपी द्वारा लोकसभा में 400 सीटों की मांग को इसी संदर्भ में जोड़ा।

     

    यहां आरएसएस की दोहरी भूमिका को रेखांकित करना आवश्यक हो जाता है। एक ओर 2018 में मोहन भागवत ने कहा था कि संविधान देश की आम सहमति है और संघ उसका पूर्ण सम्मान करता है। वहीं दूसरी ओर, अतीत और वर्तमान के कई बयानों में संघ के वरिष्ठ नेताओं ने संविधान के मूल ढांचे को ‘पश्चिम प्रेरित’ और ‘भारतीय संदर्भ से असंबद्ध’ बताया है। ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में गुरु गोलवलकर लिखते हैं कि यह संविधान एक विषम संकलन है, जिसमें भारत की सांस्कृतिक आत्मा का कोई प्रतिबिंब नहीं। यह विरोधाभास न केवल आरएसएस की वैचारिक अस्पष्टता को दर्शाता है, बल्कि उसके राजनीतिक उपकरण बीजेपी के लिए एक वैधानिक संकट भी पैदा करता है।

     

     

    संविधान की प्रस्तावना केवल एक औपचारिक भूमिका नहीं निभाती, यह भारतीय गणराज्य के उद्देश्यों और आदर्शों का प्रतीकात्मक सार है। 1973 में केशवानंद भारती केस के ऐतिहासिक निर्णय के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने ‘संविधान के मूल ढांचे’ की अवधारणा को स्थापित किया, जिसके अनुसार प्रस्तावना में शामिल आदर्शों को मूल ढांचे का हिस्सा माना गया है। ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ को हटाने की किसी भी कोशिश को न्यायपालिका द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है।

     

     

    विश्लेषक कहते हैं कि प्रस्तावना में परिवर्तन की कोई भी कोशिश न्यायिक टकराव को जन्म देगी। उनके अनुसार, यह सरकार व्यवहार में कहीं अधिक समाजवादी है, फिर भी संघ के कुछ तत्व इस शब्द से असहज क्यों हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है। यह मुद्दा केवल दो शब्दों के जोड़ या हटाने का नहीं है; यह उस वैचारिक संघर्ष की झलक है जो भारत की आत्मा को लेकर चल रहा है। क्या भारत एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समावेशी गणराज्य बना रहेगा या वह एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर होगा जिसमें ‘एक राष्ट्र, एक धर्म, एक संस्कृति’ का दृष्टिकोण हावी रहेगा?

     

    बीजेपी नेताओं द्वारा समय-समय पर संविधान की समीक्षा और संशोधन की मांग, 1993 में मुरली मनोहर जोशी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के संविधान समीक्षा आयोग तक, इस दिशा में वैचारिक निरंतरता को दर्शाते हैं। हालांकि 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद को ‘लोकतंत्र का मंदिर’ और संविधान को ‘भारत की एकमात्र पवित्र पुस्तक’ बताया था, लेकिन 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान ‘संविधान बदलने’ की बातें फिर से उठीं, जिससे विपक्ष को हमले का मौका मिला।

     

    कुल मिलाकर, भारत का संविधान कोई मात्र दस्तावेज़ नहीं है, यह 140 करोड़ भारतीयों की विविधता, समानता और गरिमा का जीवंत प्रतीक है। इसमें ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द केवल वैचारिक अलंकरण नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज की ऐतिहासिक आवश्यकताओं और संवैधानिक दृष्टिकोण का प्रतिबिंब हैं। आरएसएस और बीजेपी यदि सचमुच संविधान के अनुशासन को मानते हैं, तो उन्हें इन शब्दों से परहेज नहीं, बल्कि उनका सम्मान करना चाहिए।

    प्रस्तावना में परिवर्तन की कोशिशें महज़ एक वैचारिक आग्रह नहीं हैं, बल्कि वे लोकतंत्र की नींव पर प्रहार के समान हैं। इस संदर्भ में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की सतर्कता लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह भी उठता है: क्या भारत के जनमानस को इस वैचारिक लड़ाई का पूरा बोध है? क्या मतदाता इन सूक्ष्म लेकिन बुनियादी विमर्शों को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले रहे हैं? संविधान की आत्मा से छेड़छाड़ केवल क़ानूनी नहीं, नैतिक और ऐतिहासिक अपराध भी होगा। यह उस भारत के विरुद्ध होगा जिसकी कल्पना आंबेडकर, गांधी, नेहरू और पटेल ने की थी। और यही वह बिंदु है, जहां लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा होती है।

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