यूसीआईएल में निर्माण सामग्रियों की भारी-भरकम खरीद पर उठे सवाल

उच्च स्तरीय जांच की
मांग, करोड़ों रुपये की आपूर्ति पर मचा बवाल
राष्ट्र संवाद मुख्य संवाददाता
जादूगोड़ा :यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के सिविल विभाग में हाल के दिनों में की गई भारी-भरकम निर्माण सामग्रियों की खरीद को लेकर कर्मचारियों और स्थानीय नागरिकों में रोष व्याप्त है। आरोप है कि कॉलोनी की जर्जर सड़कों, टूटी-फूटी क्वार्टरों और झाड़-झंखाड़ की अनदेखी करते हुए प्रबंधन ने करोड़ों रुपये खर्च कर मुख्य द्वार, आवासीय कॉलोनी द्वार और अस्पताल चौक द्वार का नवनिर्माण कराया है। इन कामों की प्राथमिकता पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
*बालू आपूर्ति पर विवाद*
सूत्रों के अनुसार, करीब पांच–छह माह पहले एक स्थानीय आपूर्तिकर्ता से लगभग 2010 मीट्रिक टन बालू खरीदी गई थी, जिसकी जांच फिलहाल जारी है। सवाल यह है कि पिछले वर्षों में यूसीआईएल में बालू की वार्षिक खपत दर क्या रही और इतनी अधिक मात्रा में खरीद की वास्तविक आवश्यकता क्यों पड़ी। आरोप यह भी है कि मांगकर्ता, अंकेक्षण विभाग और क्रय विभाग की मिलीभगत से यह आपूर्ति आदेश पारित किया गया। बालू को मिल कैंटीन के पास भंडारित किया गया, जिस पर मजदूरों ने आपत्ति जताते हुए कहा था कि तेज हवा या आंधी में बालू उड़कर खाने में मिल सकती है।
*अब स्टोन चिप्स की बारी*
इसी आपूर्तिकर्ता को अब 3680 मीट्रिक टन स्टोन चिप्स (गिट्टी) की आपूर्ति का नया आदेश जारी किया गया है। कर्मचारियों का कहना है कि इससे पहले यूसीआईएल में कभी भी एक वर्ष में इतनी बड़ी मात्रा में गिट्टी की खपत नहीं हुई। ऐसे में सवाल उठता है कि यह आदेश किन परिस्थितियों में और किसके दबाव में दिया गया — इसकी जांच आवश्यक है।
*सीमेंट खरीद पर भी विवाद*
विवाद सिर्फ बालू और गिट्टी तक सीमित नहीं है। हाल में करीब 1100 टन आईएसडी सीमेंट की खरीदारी भी बाजार भाव से ऊंची दर पर की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन अधिकारियों ने पहले आईएसडी सीमेंट की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए इसके विरोध में आवाज उठाई थी, वही अब कथित तौर पर चुप हैं। कर्मचारियों का सवाल है कि पहले घटिया गुणवत्ता और ऊंचे दाम का हवाला देकर जिस सीमेंट की आपूर्ति का विरोध किया गया था, अब उसी की बड़े पैमाने पर खरीदारी किस आधार पर की गई।
*उच्च स्तरीय जांच की मांग*
स्थानीय नागरिकों और कर्मचारियों का कहना है कि यह पूरा मामला करोड़ों रुपये की खरीद से जुड़ा हुआ है। यदि वास्तविक खपत और आवश्यकता का आकलन किया जाए तो कई विसंगतियां सामने आ सकती हैं। इसी कारण प्रबंधन से उच्च स्तरीय जांच की मांग की जा रही है, ताकि यदि कहीं अनियमितता या भ्रष्टाचार हुआ है, तो उसे उजागर किया जा सके।

