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    Home » बिहार में एसआईआर अभियान से मतदाता सुधार सुनिश्चित होने पर सवाल
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    बिहार में एसआईआर अभियान से मतदाता सुधार सुनिश्चित होने पर सवाल

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 30, 2025No Comments6 Mins Read
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    बिहार में एसआईआर अभियान से मतदाता सुधार सुनिश्चित होने पर सवाल

    देवानंद सिंह

    बिहार में मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चुनाव आयोग द्वारा चलाया जा रहा विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान अपने पहले चरण को पार कर चुका है। 24 जून से 25 जुलाई 2025 तक चले इस पहले चरण में 91.69% यानी करीब 7.24 करोड़ मतदाताओं ने अपने गणना फॉर्म जमा किए हैं। चुनाव आयोग का दावा है कि वह 99.8% मतदाताओं तक पहुंचने में सफल रहा। यह दावा अपनी जगह है, लेकिन ज़मीनी हकीकत और अभियान की जटिल प्रक्रियाएं इसे एक निर्विवाद लोकतांत्रिक अभ्यास बनाने में संदेह पैदा करती हैं।

     

    इस प्रक्रिया ने न केवल प्रशासनिक चुनौतियां पेश की हैं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक विवादों को भी जन्म दिया है। विपक्षी दलों द्वारा इसे ‘लोकतंत्र विरोधी’ करार देना, एसआईआर के दायरे, उद्देश्य और निष्पक्षता को कठघरे में खड़ा करता है। एसआईआर अभियान की शुरुआत में चुनाव आयोग ने पहचान के लिए 11 दस्तावेज़ों की सूची जारी की थी। इनमें आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, राशन कार्ड, मनरेगा कार्ड, और ड्राइविंग लाइसेंस को मान्य नहीं माना गया, जो अधिकांश नागरिकों के पास मौजूद एकमात्र सरकारी पहचान-पत्र हैं। यह तय करना बेहद जटिल था कि फिर मान्य दस्तावेज़ कौन से हैं?

     

    बिहार जैसे राज्य में, जहां अभी भी बड़ी आबादी दस्तावेज़ विहीन है, खासकर अनुसूचित जाति, जनजाति, प्रवासी मज़दूर और महिलाएं। उनके लिए यह प्रक्रिया आत्म-पहचान का संघर्ष बन गई। एसआईआर अभियान के पहले चरण में लगभग 22 लाख मतदाताओं को मृत घोषित किया गया है, जो कुल मतदाताओं का 2.83% है। वहीं, 36 लाख मतदाता ऐसे पाए गए हैं, जो राज्य से स्थायी तौर पर बाहर चले गए हैं या जिनसे बीएलओ संपर्क नहीं कर पाए। इसके अलावा सात लाख ऐसे मतदाताओं की पहचान की गई है, जो एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हैं। यह तथ्य प्रशासनिक दृष्टिकोण से सुधार की दिशा में लग सकते हैं, लेकिन यह आशंका भी जन्म देते हैं कि कहीं सामाजिक या राजनीतिक पक्षपात के चलते गरीब, पिछड़े और प्रवासी समुदायों को सूची से हटाने की अनदेखी प्रक्रिया तो नहीं अपनाई जा रही?

     

    चुनाव आयोग का दावा है कि गणना फ़ॉर्म जमा करने वाले मतदाताओं को एसएमएस के माध्यम से कुल 10.02 करोड़ पावती संदेश भेजे गए, परंतु बीबीसी और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि ज़मीनी स्तर पर लोगों को किसी भी तरह की भौतिक रसीद नहीं दी गई। ग्रामीण इलाकों में जहाँ मोबाइल कनेक्टिविटी एक समस्या है और एसएमएस पढ़ने की क्षमता भी सीमित है, वहां यह दावा व्यावहारिक सत्य से दूर लगता है।

    राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) की संख्या में इस दौरान अभूतपूर्व वृद्धि हुई, खासकर वामपंथी दलों की। सीपीआई (एम) के बीएलए की संख्या में 1083% और सीपीआई (एमएल) के बीएलए में 542% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके उलट आरजेडी और बीजेपी जैसे प्रमुख दलों के बीएलए में केवल मामूली वृद्धि हुई।

     


    यह तथ्य इस ओर संकेत करता है कि मतदाता पहचान प्रक्रिया को लेकर किस दल ने कितनी गंभीरता दिखाई, लेकिन यह भी बताता है कि यह प्रक्रिया अंततः राजनीतिक ध्रुवीकरण और संगठनात्मक संसाधनों पर भी निर्भर है, जिससे निष्पक्षता की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है, जो युवा मतदाता 1 जुलाई से 1 अक्टूबर के बीच 18 वर्ष के हो जाएंगे, वे फ़ॉर्म 6 के माध्यम से अपना नाम दर्ज करा सकते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया भी कई युवाओं के लिए सूचना, पहुंच और दस्तावेज़ की जटिलताओं के कारण चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

     

    एक अन्य गंभीर मुद्दा उन लोगों से जुड़ा है, जिनके फ़ॉर्म परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भर दिए गए हैं। उदाहरण के लिए पति की ओर से पत्नी, या माता-पिता की ओर से बच्चों के फ़ॉर्म। यदि, इस आधार पर उनका नाम हटता है, तो उन्हें स्वयं उपस्थित होकर वैरीफिकेशन करवाना होगा। क्या यह भारत जैसे देश में संभव है, जहां प्रवास, आर्थिक स्थिति, और लिंग आधारित बाधाएं हावी हैं? बिहार की सीमाएं नेपाल से लगती हैं और वहां का ‘रोटी-बेटी’ का संबंध सदियों पुराना है। कई नेपाली महिलाएं शादी के बाद भारतीय नागरिकता प्राप्त कर लेती हैं और वोट भी डालती रही हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि विदेशी नागरिकों की पहचान होने पर ईआरओ द्वारा सक्षम अधिकारी को सूचित किया जाएगा, लेकिन इनकी वैधता, नागरिकता, और अधिकारों पर अंतिम फ़ैसले की प्रक्रिया अब भी धुंधली है।

     

    एसआईआर अभियान के खिलाफ आरजेडी और कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। संसद के मानसून सत्र में भी इसे लोकतंत्र विरोधी करार दिया गया। उनका कहना है कि यह अभ्यास केवल तकनीकी सुधार नहीं बल्कि एक राजनीतिक उपकरण बन गया है, जिसका उद्देश्य खास समुदायों को सूची से हटाना और कुछ को बनाए रखना है। यह भय निराधार नहीं लगता, क्योंकि जिस प्रकार दस्तावेज़ों की कठोरता, रसीद की अनुपस्थिति और वैरीफिकेशन की शक्ति केवल ईआरओ के विवेक पर छोड़ी गई है, वह कार्यपालिका को असंतुलित शक्तियां सौंपता है।
    मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कहते हैं कि किसी भी मतदाता को बिना सुनवाई के मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जाएगा और अपील की पूरी प्रक्रिया मौजूद है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 24 के तहत मतदाता जिला मजिस्ट्रेट और फिर मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के पास अपील कर सकते हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह प्रक्रिया कितनी सुलभ है? क्या एक प्रवासी मज़दूर, एक वृद्ध महिला या एक दस्तावेज़ विहीन ग्रामीण नागरिक इन प्रक्रियाओं को समझ और अपनाने की स्थिति में है? कुल मिलाकर, बिहार में चल रहा एसआईआर अभियान प्रशासनिक रूप से एक बड़ा प्रयास है, जिससे मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित की जा सके, मृत और डुप्लिकेट नामों को हटाया जा सके, और भविष्य के चुनावों को अधिक पारदर्शी बनाया जा सके, लेकिन यह पूरी प्रक्रिया तब तक निष्पक्ष और लोकतांत्रिक नहीं मानी जा सकती जब तक इसमें सूचना की पारदर्शिता, प्रक्रिया की सुलभता, और अंतिम फैसले की जवाबदेही सुनिश्चित न हो।

    बिहार जैसे राज्य, जहां सामाजिक, आर्थिक और जातीय असमानता गहरी है, वहां चुनाव सुधार को सिर्फ़ कागज़ों की प्रक्रिया नहीं बल्कि न्याय और समावेशिता के दृष्टिकोण से देखे जाने की आवश्यकता है। अन्यथा एसआईआर जैसे प्रयास लोकतंत्र की मज़बूती नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्करण और राजनीतिक ध्रुवीकरण का नया कारण बन सकते हैं। यह चुनाव आयोग के लिए भी एक परीक्षा है  कि क्या वह आधिकारिक निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन बनाकर इस प्रक्रिया को निष्कलंक बना पाएगा? और क्या वह इस अभियान को भरोसे और सहभागिता का मंच बना पाएगा या यह अभियान भी भारत में बढ़ती ‘डिजिटल असमानता’ और ‘दस्तावेज़ आधारित लोकतंत्र’ का एक और उदाहरण बनकर रह जाएगा?

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