भारत–रूस मित्रता को नए युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नए आयाम देने वाली साबित हुई पुतिन की यात्रा देवानंद सिंह
नई दिल्ली के हैदराबाद भवन में शुक्रवार सुबह का माहौल किसी साधारण राजकीय कार्यक्रम जैसा नहीं था। वातावरण में एक प्रकार की गम्भीरता और ऐतिहासिकता का संयोग था, मानो विश्व राजनीति का कोई महत्वपूर्ण अध्याय यहीं से आगे लिखा जाने वाला हो। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का स्वागत किया, तो यह केवल दो नेताओं की औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि दो देशों के बीच दशकों से चले आ रहे विश्वास, साझेदारी और सामरिक सहयोग के नए अध्याय की घोषणा थी। चार वर्षों के अंतराल के बाद भारत आए राष्ट्रपति पुतिन की यह यात्रा कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण थी और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच भारत–रूस संबंधों की नई दिशा को स्पष्ट करने वाली भी।
राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी यात्रा की शुरुआत राजघाट से की, जहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित कर भारत की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान दिया। इसके बाद राष्ट्रपति भवन में आयोजित भव्य समारोह में तीनों सेनाओं की टुकड़ियों ने उन्हें सम्मान गार्ड दिया। यह दृश्य केवल प्रोटोकॉल का निर्वहन नहीं था, बल्कि दोनों देशों के बीच परस्पर सम्मान और दीर्घकालिक मैत्री का प्रतीक था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री मोदी, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर तथा अन्य कई वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति ने इस मुलाकात के महत्व को और बढ़ा दिया।
हैदराबाद भवन में हुई तेइसवीं वार्षिक शिखर बैठक में रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, कृषि, समुद्री परिवहन, स्वास्थ्य और कौशल विकास जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग समझौते हुए। यह इस बात का संकेत है कि भारत–रूस संबंध अब केवल रक्षा–सहयोग तक सीमित नहीं रह गए, बल्कि धीरे–धीरे बहुआयामी, व्यापक और भविष्य–केन्द्रित स्वरूप ले रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में स्पष्ट कहा कि भारत और रूस के बीच आर्थिक साझेदारी को और ऊंचाई पर ले जाना दोनों देशों की साझा प्राथमिकता है। इसी उद्देश्य से दोनों देशों ने दो हजार तीस तक का आर्थिक–सहयोग कार्यक्रम तैयार किया है, जो व्यापार, निवेश, उत्पादन, परिवहन और ऊर्जा के क्षेत्र में नए अवसर खोलेगा। यह समझौता बताता है कि भारत और रूस आने वाले वर्षों में अपनी आर्थिक निर्भरता को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाने के इच्छुक हैं।
भारत–रूस व्यापार में एक बड़ा परिवर्तन यह है कि अब लेन–देन दोनों देशों की मुद्राओं में हो रहा है। यह पारस्परिक विश्वास, डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में नई दिशा स्थापित करने का संकेत है। रूस जिस समय पश्चिमी प्रतिबन्धों से जूझ रहा है और दुनिया में दो ध्रुव बनते दिख रहे हैं, उस समय भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए रूस के साथ ऊर्जा–सहयोग को न केवल जारी रखा बल्कि बढ़ाया भी।
राष्ट्रपति पुतिन ने भी स्वीकार किया कि भारत और रूस की मित्रता अनेक परीक्षाओं से गुज़रकर और अधिक मजबूत हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देश उत्पादन–आधारित उद्योगों में सहयोग बढ़ाएंगे और भारत की आत्मनिर्भरता–केंद्रित नीति को रूस पूरा समर्थन देगा। यह रूस की उस सोच को भी दर्शाता है जिसमें वह भारत को भविष्य की बहुध्रुवीय विश्व–व्यवस्था का अत्यंत महत्त्वपूर्ण आधार मानता है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे, उत्तरी समुद्री मार्ग और चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग पर जोर देना अत्यंत रणनीतिक है। ये मार्ग भारत को मध्य एशिया, रूस और यूरोप से जोड़ने की क्षमता रखते हैं तथा चीन की बढ़ती क्षेत्रीय दखलंदाजी को संतुलित करने का भी माध्यम बन सकते हैं। यदि ये परियोजनाएं समय–सीमा में आगे बढ़ीं तो भारत–रूस व्यापार केवल मात्रा में नहीं, बल्कि गुणवत्ता में भी नया स्वरूप ग्रहण करेगा।
आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग और भारत के युवाओं को हिम–जल में नौवहन प्रशिक्षण देने का निर्णय भारत की समुद्री क्षमताओं को बढ़ाने के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बदलती जलवायु के कारण आर्कटिक क्षेत्र में नए नौवहन मार्ग खुल रहे हैं। ऐसे समय में भारत का वहाँ सक्रिय उपस्थिति दर्ज करना समुद्री–कूटनीति का दूरगामी कदम है।
सिविल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत और रूस का सहयोग दशकों पुराना है। रूस भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण में सहयोग कर रहा है, जो भारत की ऊर्जा–सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। परमाणु ऊर्जा उत्पादन में रूस की विशेषज्ञता और भारत की बढ़ती ऊर्जा–आवश्यकताएं दोनों देशों को एक–दूसरे के लिए अनिवार्य सहयोगी बनाती हैं।
क्रिटिकल खनिजों पर सहयोग आने वाले वर्षों में भारत की तकनीकी और औद्योगिक क्षमता को एक नई दिशा देगा। ये खनिज विद्युत–वाहनों, उच्च क्षमता बैटरी, आधुनिक विनिर्माण उद्योग, अंतरिक्ष तकनीक और रक्षा–उद्योग के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। रूस के पास इनके विशाल भंडार हैं और भारत के पास इनका तेजी से बढ़ता हुआ बाज़ार। यदि, यह साझेदारी ठीक दिशा में आगे बढ़ी तो भारत भविष्य में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है।
शिप–निर्माण में सहयोग भारत की समुद्री शक्ति को नए स्तर पर ले जाएगा। यह न केवल नौसेना की क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि समुद्री परिवहन, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क को भी मजबूत करेगा। यह सहयोग भारत की स्वदेशी विनिर्माण नीति को भी गति देगा, जिससे युवाओं को रोजगार और प्रशिक्षण के नए अवसर प्राप्त होंगे।
दो नए रूसी वाणिज्य दूतावासों का खुलना केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि दोनों देशों के नागरिकों के बीच बढ़ते संपर्क का प्रतीक है। छात्र–विनिमय, खेल–सहयोग, कौशल–विकास और जन–आंदोलन आधारित कूटनीति दोनों देशों को समाज के स्तर पर भी जोड़ने का कार्य करेगी, जिससे संबंधों की स्थिरता और बढ़ेगी।
इस बैठक में आतंकवाद पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कही गई बात न केवल भारत की स्थिति को स्पष्ट करती है, बल्कि रूस के प्रति एक गहरा संदेश भी देती है। उन्होंने कहा कि चाहे पहलगाम में हुआ हमला हो या रूस के क्रॉकस नगर में हुआ नृशंस आक्रमण, दोनों की जड़ें समान प्रकार की उग्रवादी विचारधाराएं हैं। भारत के लिए आतंकवाद केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं बल्कि मानवता के मूल्यों पर प्रहार है। इसलिए भारत की नीति स्पष्ट है कि आतंकवाद पर कोई तटस्थता नहीं हो सकती। यह दृष्टिकोण भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को और मजबूत बनाता है।
यूक्रेन संकट पर भारत की स्थिति संतुलित रही है। भारत ने न तो किसी पक्ष का अंध–समर्थन किया और न ही वैश्विक दबाव में आकर निर्णय बदला। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यह कहना कि भारत शांति के पक्ष में है और वह हर प्रकार की बातचीत और समाधान की पहल का समर्थन करेगा—विश्व–राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत है। भारत अब परिवार–केन्द्रित नैतिक दृष्टिकोण के साथ–साथ व्यावहारिक कूटनीति का भी सुचिंतित प्रयोग कर रहा है।
राष्ट्रपति पुतिन द्वारा यह कहना कि भारत और रूस मिलकर एक अधिक न्यायपूर्ण और बहुध्रुवीय विश्व–व्यवस्था बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं, केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि दोनों देशों के दीर्घकालिक भू–राजनीतिक लक्ष्य का स्पष्ट संकेत है। ब्रिक्स जैसे समूह अब केवल औपचारिक मंच नहीं रहे, बल्कि वे वैश्विक शक्ति–समीकरण को बदलने वाले साधन बनते जा रहे हैं। भारत–रूस साझेदारी इस परिवर्तन का केंद्र–बिंदु है।
रूस के समाचार मंच आरटी का भारत में कार्यालय खोलना भी सूचना–कूटनीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। पश्चिमी मीडिया के प्रभाव के बीच रूस भारत में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहता है। इससे भारत में रूस से जुड़ी सूचनाओं का विस्तार होगा और दोनों देशों के बीच जन–आधारित समझ और गहरी हो सकती है।
संक्षेप में, राष्ट्रपति पुतिन की यह यात्रा वैश्विक परिस्थितियों, बदलते शक्ति–संतुलन और नये आर्थिक–राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत–रूस संबंधों को नई दिशा देने वाली है। दोनों देशों के सामने चुनौतियां अवश्य हैं, जैसे रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता, भारत की पश्चिम से बढ़ती निकटता, यूक्रेन संकट, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और नई तकनीकी प्रतिस्पर्धा। परन्तु इन सबके बीच जो तत्व सबसे अधिक स्पष्ट है वह यह कि भारत–रूस संबंध समय, परिस्थिति और राजनीतिक बदलावों की कसौटी पर खरे उतरते रहे हैं।
हैदराबाद भवन की इस बैठक ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अपने हितों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने और उन्हें लागू करने की क्षमता रखता है। न तो भारत पश्चिमी दबावों के आगे झुकता है और न ही किसी एक धुरी की राजनीति में बंद रहना चाहता है। इसी प्रकार रूस भी जानता है कि वैश्विक शक्ति–संरचना में भारत एक महत्त्वपूर्ण, विश्वसनीय और स्थिर साझेदार है। अतः यह कहना गलत न होगा कि पुतिन की यह यात्रा भारत–रूस मित्रता को केवल पुनर्जीवित ही नहीं करती, बल्कि उसे नए युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नए आयाम भी देती है। यह यात्रा केवल राजकीय औपचारिकता नहीं, बल्कि विश्व–राजनीति में बदलते प्रवाह और उभरते भारत की निर्णायक भूमिका का उद्घोष है।


