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    सत्ता, परिवार और सियासत: एनसीपी के भीतर चल रही बड़ी लड़ाई का सच

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 31, 2026No Comments4 Mins Read
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    मतदाता सूची पर सियासत
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    सत्ता, परिवार और सियासत: एनसीपी के भीतर चल रही बड़ी लड़ाई का सच

    देवानंद सिंह

    महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर जो कुछ घट रहा है, वह केवल एक दल का आंतरिक संघर्ष नहीं, बल्कि सत्ता, विरासत और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की टकराहट की कहानी है। शरद पवार के हालिया बयानों और सामने आए वीडियो, बैठकों व सूत्रों से मिली जानकारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “सब कुछ सामान्य है” कहने के बावजूद एनसीपी के भीतर गहरी दरारें मौजूद हैं।

    अजित पवार के असामयिक निधन के बाद पार्टी और परिवार दोनों स्तरों पर घटनाक्रम तेजी से बदले। शरद पवार ने सार्वजनिक तौर पर यह कहकर सियासी तापमान कम करने की कोशिश की कि परिवार में कोई समस्या नहीं है और जो फैसले लिए जा रहे हैं, वे वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिए जा रहे हैं। लेकिन राजनीति में शब्दों से ज्यादा मायने घटनाओं के होते हैं। बारामती में 17 जनवरी को हुई शरद-अजित की बैठक, उसके बाद सामने आया वीडियो, और फिर 12 फरवरी को प्रस्तावित विलय की तारीख—ये सभी संकेत बताते हैं कि एनसीपी के दोनों गुटों के बीच एक बड़ा फैसला लगभग तय था।

    सूत्रों के अनुसार, जयंत पाटिल, अजित पवार और शशिकांत शिंदे के बीच बीते चार महीनों से लगातार बातचीत चल रही थी। यह भी लगभग तय था कि 12 फरवरी को एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की औपचारिक घोषणा होगी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अजित पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु ने न केवल इस प्रक्रिया को रोक दिया, बल्कि पार्टी को असमंजस और अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया।

    इसी बीच सियासी गलियारों में एक नई बहस ने जन्म लिया “बहू बनाम ससुर” की राजनीति। सुमित्रा पवार की सक्रियता और उनके घर पर हुई बैठकों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या सत्ता की लड़ाई अब परिवार के भीतर खुले रूप में सामने आ रही है। शरद पवार भले ही कहें कि परिवार एकजुट है, लेकिन सुमित्रा पवार की नाराजगी, शपथ ग्रहण समारोह को लेकर उनका असंतोष और कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ उनकी मुलाकातें यह संकेत देती हैं कि सब कुछ सहज नहीं है।

    एनसीपी की पहचान कभी अनुशासित कैडर, मजबूत संगठन और स्पष्ट नेतृत्व के लिए जानी जाती थी। लेकिन आज वही पार्टी “घड़ी” के प्रतीक की तरह समय के साथ बिखरती नजर आ रही है। एक ओर सत्ता की चाह है, तो दूसरी ओर वैचारिक और संगठनात्मक एकता का सवाल। शरद पवार जैसे अनुभवी नेता यह भली-भांति जानते हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता के बिना संगठन को जीवित रखना कठिन है। यही कारण है कि वह लगातार संतुलन साधने की कोशिश में दिख रहे हैं न परिवार को नाराज करना, न वरिष्ठ नेताओं को।

    ताजा जानकारी के मुताबिक, छगन भुजबल सहित कई वरिष्ठ नेता अभी भी विलय के पक्ष में हैं, लेकिन वे खुलकर सामने आने से बच रहे हैं। कारण साफ है नेतृत्व का सवाल। अजित पवार के जाने के बाद वह धुरी टूट चुकी है, जिसके इर्द-गिर्द विलय की पूरी रणनीति घूम रही थी। अब सवाल यह है कि क्या जयंत पाटिल जैसे नेता उस खालीपन को भर पाएंगे, या फिर एनसीपी दो ध्रुवों में बंटी रह जाएगी।

    शरद पवार की चुप्पी और “कोई टिप्पणी नहीं” की रणनीति भी अपने-आप में बहुत कुछ कहती है। वह जानते हैं कि एक गलत बयान पार्टी को पूरी तरह विभाजित कर सकता है। लेकिन राजनीति में ज्यादा देर तक अस्पष्टता भी नुकसानदेह होती है। कार्यकर्ता, विधायक और समर्थक सभी दिशा की तलाश में हैं।

    आज एनसीपी जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां से दो ही रास्ते निकलते हैं। पहला सभी गुटों को साथ लेकर एक स्पष्ट नेतृत्व संरचना बनाना और सत्ता की राजनीति में मजबूती से वापसी करना। दूसरा आंतरिक खींचतान को जारी रहने देना, जिससे पार्टी धीरे-धीरे अपना जनाधार और राजनीतिक वजन खो दे। सुमित्रा पवार की भूमिका, वरिष्ठ नेताओं का रुख और शरद पवार का अंतिम फैसला यही तय करेगा कि एनसीपी का भविष्य क्या होगा।

    फिलहाल इतना तय है कि महाराष्ट्र की राजनीति में यह “बड़ा खेल” अभी खत्म नहीं हुआ है। सत्ता की शपथ, विलय की घोषणा और परिवार की एकजुटता इन सब पर उठते सवाल आने वाले दिनों में और तेज होंगे और तब यह स्पष्ट हो जाएगा कि एनसीपी की घड़ी आगे बढ़ेगी या समय के साथ और बिखर जाएगी।

    परिवार और सियासत: एनसीपी के भीतर चल रही बड़ी लड़ाई का सच सत्ता
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