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    मि लॉर्ड! 43% जजों का सरकारी नाता ! क्या सरकार के खिलाफ चलेगा न्याय का हथौड़ा !

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 31, 2026No Comments3 Mins Read
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    मि लॉर्ड! 43% जजों का सरकारी नाता ! क्या सरकार के खिलाफ चलेगा न्याय का हथौड़ा !

    क्या ‘सरकार के पूर्व वकील’ बन सकते हैं निष्पक्ष जज!

    राष्ट्र संवाद
    इंद्र यादव
    भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका का काम सरकार की मनमानी पर लगाम लगाना है। लेकिन मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ताजा आंकड़े एक नई बहस को जन्म दे रहे हैं। कोर्ट के कुल 42 जजों में से 18 जज (करीब 43%) ऐसे हैं जो जज बनने से पहले सरकारी वकील रह चुके हैं।

    प्रमुख जजों की पृष्ठभूमि और उनकी कार्यशैली !

    लेख में कुछ प्रमुख जजों का उदाहरण दिया गया है, जो पहले सरकार का पक्ष रखते थे लेकिन अब न्याय की कुर्सी पर हैं:
    जस्टिस विवेक रूसिया: केंद्र सरकार के वकील रह चुके हैं। ये नियमों और संवैधानिक बारीकियों पर बारीकी से नज़र रखते हैं।
    जस्टिस आनंद पाठक: शासकीय अधिवक्ता रहे हैं। ये अपने फैसलों में सामाजिक सुधार (जैसे पौधे लगाना) के लिए जाने जाते हैं।
    जस्टिस विवेक अग्रवाल: डिप्टी एडवोकेट जनरल रहे हैं। सख्त अनुशासन और प्रशासन से कड़े सवाल पूछने के लिए मशहूर हैं।
    जस्टिस विजय कुमार शुक्ला: सरकारी वकील रहने के कारण प्रशासनिक मामलों की गहरी समझ रखते हैं।
    जस्टिस जी. एस. अहलूवालिया: लोकायुक्त और सरकार के कई पदों पर रहे हैं। ये पुलिस और प्रशासन की लापरवाही पर कड़ी फटकार लगाने के लिए जाने जाते हैं।

    सिक्के के दो पहलू !

    इतनी बड़ी संख्या में पूर्व सरकारी वकीलों का जज होना दो तरह के विचार पैदा करता है!
    अनुभव का फायदा: चूँकि ये जज पहले सरकारी सिस्टम का हिस्सा रहे हैं, इसलिए ये जानते हैं कि प्रशासन कहाँ गलतियाँ करता है और फाइलें कहाँ अटकती हैं।
    पक्षपात का डर: जनता के मन में यह सवाल आता है कि क्या वह व्यक्ति निष्पक्ष रह पाएगा जिसने सालों तक सरकार का बचाव किया है! क्या वे उस सत्ता के खिलाफ कड़े फैसले ले पाएंगे!

    सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले और सिद्धांत

    न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं!
    हितों का टकराव (Conflict of Interest): सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों (जैसे रंजीत सिंह बनाम भारत संघ) में कहा गया है कि यदि किसी जज का किसी मामले से पुराना संबंध है, तो उन्हें खुद को उस केस से अलग (Recusal) कर लेना चाहिए।
    स्वतंत्रता और नियुक्ति: ‘थर्ड जजेज केस’ (1998) के बाद से कॉलेजियम प्रणाली लागू है। इसमें जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका (सरकार) की भूमिका को सीमित किया गया है ताकि जजों पर सरकार का कोई अहसान न रहे।
    अनुभव बनाम निष्पक्षता: कोर्ट का मानना है कि सरकारी वकील रहने से प्रशासनिक बारीकियों की समझ बढ़ती है, जो न्याय करने में मददगार होती है। 2025-26 के हालिया रुझानों में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल ‘पूर्व सरकारी वकील’ होना अयोग्यता नहीं है, बल्कि उनकी ‘न्यायिक ईमानदारी’ सबसे ऊपर है।

    एड. राकेश कुमार सरोज जी बताते है कि !

    कानून का एक पुराना सिद्धांत है: “न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।” विशेषज्ञ मानते हैं कि जज की कुर्सी पर बैठने के बाद व्यक्ति केवल संविधान का होता है, लेकिन बेंच में विविधता होना भी लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

    मि लॉर्ड! 43% जजों का सरकारी नाता ! क्या सरकार के खिलाफ चलेगा न्याय का हथौड़ा !
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