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    Home » पाकिस्तान की दोहरी रणनीति: शांति वार्ता या सैन्य सियासत? | राष्ट्र संवाद
    Breaking News Headlines अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति संपादकीय

    पाकिस्तान की दोहरी रणनीति: शांति वार्ता या सैन्य सियासत? | राष्ट्र संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 11, 2026No Comments2 Mins Read
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    जनप्रतिनिधियों की त्याग भावना
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    शांति वार्ता के बीच सैन्य सियासत पाकिस्तान की दोहरी रणनीति पर सवाल

    देवानंद सिंह
    मध्य-पूर्व की जटिल भू-राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी है। एक ओर ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर अहम बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब में अपने सैन्य बलों की तैनाती ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कूटनीति और सैन्य गतिविधियों का यह समानांतर खेल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कितनी गंभीर चुनौती बन सकता है, यह अब वैश्विक चिंतन का विषय बन गया है।
    इस्लामाबाद में जारी ईरान-अमेरिका वार्ता में मिस्र, सऊदी अरब, चीन और कतर जैसे देशों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि यह केवल द्विपक्षीय बातचीत नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय संतुलन की कवायद है। ईरान के प्रतिनिधिमंडल और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बीच हुई मुलाकात इस प्रक्रिया को और अहम बनाती है, हालांकि आधिकारिक स्तर पर चुप्पी बरकरार है।
    दूसरी तरफ, पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब में सैन्य बलों की तैनाती को केवल रक्षा सहयोग के नजरिए से देखना शायद अधूरा विश्लेषण होगा। खासकर तब, जब यह वही क्षेत्र है जहां ईरान के साथ तनाव और हमलों का इतिहास रहा है। ऐसे में शांति वार्ता के समानांतर सैन्य सक्रियता पाकिस्तान की नीयत पर सवाल खड़े करती है।
    सितंबर में हुए रक्षा समझौते के तहत यह तैनाती भले ही “सुरक्षा और स्थिरता” के नाम पर की गई हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संदेश अक्सर शब्दों से ज्यादा कदमों से जाता है। एक तरफ शांति की बात और दूसरी तरफ सैन्य उपस्थिति—यह विरोधाभास कूटनीतिक विश्वास को कमजोर कर सकता है।
    स्पष्ट है कि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक साथ कई भूमिकाएं निभाने की कोशिश कर रहा है—मध्यस्थ, सहयोगी और रणनीतिक भागीदार। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसी संतुलनकारी नीतियां अक्सर अविश्वास को जन्म देती हैं।
    आवश्यक है कि क्षेत्रीय शांति के प्रयास केवल कागजी वार्ताओं तक सीमित न रहें, बल्कि जमीन पर भी उसी भावना का प्रतिबिंब दिखे। अन्यथा, यह दोहरी रणनीति न केवल वार्ता को कमजोर करेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र को एक नए तनाव की ओर धकेल सकती है।

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