लेखक: देवानंद सिंह
पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की हालिया सऊदी अरब यात्रा और उसके परिणामस्वरूप हुए मक्का पैक्ट ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के रणनीतिक हलकों में गहन विमर्श को जन्म दिया है। जहां एक ओर इस्लामाबाद इसे अपनी कूटनीतिक विजय के रूप में पेश कर रहा है, वहीं नई दिल्ली के रणनीतिकार इसे एक ऐसे अवसर के रूप में देख रहे हैं जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को भारत के पक्ष में और झुका सकता है। इस समझौते के निहितार्थ केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह यूएई, ईरान, इजरायल और अमेरिका जैसे प्रमुख हितधारकों के समीकरणों को भी प्रभावित करता है।
मक्का पैक्ट और पश्चिम एशिया का बदलता समीकरण
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति शतरंज का वह खेल है, जिसमें एक चाल का असर केवल सामने वाले खिलाड़ी पर नहीं, बल्कि पूरी बिसात पर पड़ता है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने सऊदी अरब के साथ मक्का पैक्ट के जरिए अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में पाकिस्तान का मास्टरस्ट्रोक है या ऐसी चाल, जिसने अनजाने में भारत के लिए नई रणनीतिक संभावनाएं खोल दी हैं?
पाकिस्तान लंबे समय से पश्चिम एशिया में अपनी उपयोगिता बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। सऊदी अरब के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध और सैन्य सहयोग इसके महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। मक्का पैक्ट ने इस रिश्ते को एक नई राजनीतिक और सुरक्षा परत जरूर दी है। लेकिन पश्चिम एशिया में सऊदी अरब अकेला शक्ति केंद्र नहीं है। यूएई, ईरान, तुर्किये और इजरायल समेत कई ताकतें अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को लेकर सक्रिय हैं।
यहीं से भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत ने पश्चिम एशिया की राजनीति में किसी गुट का हिस्सा बनने के बजाय सभी प्रमुख पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए हैं। सऊदी अरब के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते हैं, यूएई भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है, ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं और इजरायल के साथ रक्षा एवं तकनीकी सहयोग लगातार बढ़ा है। अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी भी इस पूरे समीकरण को और मजबूत करती है।
ऐसे में यूएई और भारत के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग महज हथियारों की खरीद-बिक्री का मामला नहीं है। यह बदलते भू-राजनीतिक समीकरण का हिस्सा है। यूएई के लिए भारत एक बड़ा बाजार जरूर है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण एक स्थिर, सक्षम और अपेक्षाकृत भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में भारत की भूमिका है।
फिर भी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि मक्का पैक्ट के कारण यूएई सीधे भारत के खेमे में आ गया या पाकिस्तान ने भारत के लिए कोई “सेल्फ गोल” कर दिया। अंतरराष्ट्रीय संबंध इतने सरल नहीं होते। देश स्थायी मित्रता से ज्यादा अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेते हैं। आज जो देश किसी मुद्दे पर साथ खड़े दिखाई देते हैं, जरूरी नहीं कि कल भी उनके हित बिल्कुल समान रहें।
लेकिन एक बात साफ है—भारत अब पश्चिम एशिया का केवल ऊर्जा बाजार नहीं रहा। भारतीय अर्थव्यवस्था, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता, सैन्य शक्ति और हिंद महासागर में रणनीतिक स्थिति ने उसे ऐसा साझेदार बना दिया है, जिसे पश्चिम एशिया की कोई भी बड़ी शक्ति नजरअंदाज नहीं कर सकती।
पाकिस्तान की चुनौती भी यही है। वह सैन्य शक्ति और सुरक्षा समझौतों के सहारे अपनी प्रासंगिकता बढ़ाना चाहता है, जबकि भारत आर्थिक शक्ति, कूटनीतिक संतुलन और बहुआयामी साझेदारियों के जरिए अपना प्रभाव विस्तार कर रहा है।
मक्का पैक्ट पाकिस्तान की कूटनीतिक उपलब्धि हो सकता है, लेकिन इसे भारत की हार या पाकिस्तान की निर्णायक जीत मानना राजनीतिक भूल होगी। असली मुकाबला घोषणाओं का नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक प्रभाव का है।
और इस बड़ी बिसात पर भारत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह किसी एक खेमे का मोहरा बनने के बजाय अपनी शर्तों पर साझेदारियां बनाने की क्षमता विकसित कर चुका है।
यही बदलता भारत है जो पश्चिम एशिया की राजनीति को बाहर से देखने वाला देश नहीं, बल्कि उसके शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन चुका है।
निष्कर्ष: भारत की बढ़ती रणनीतिक स्वायत्तता
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मक्का पैक्ट भले ही पाकिस्तान और सऊदी अरब के द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई दे, लेकिन वृहद क्षेत्रीय परिदृश्य में भारत की बहुआयामी कूटनीति ही निर्णायक साबित हो रही है। भारत ने जिस प्रकार सऊदी अरब, यूएई, ईरान, इजरायल और अमेरिका के साथ समानांतर संबंधों को साधा है, वह इसे एक अनिवार्य भागीदार बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सैन्य-उन्मुख कूटनीति की तुलना में भारत की आर्थिक-तकनीकी-कूटनीतिक त्रिकोणीय रणनीति अधिक टिकाऊ साबित होगी।
आने वाले समय में पश्चिम एशिया का शक्ति संतुलन ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी हस्तांतरण और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तय होगा, जहां भारत की भूमिका केंद्रीय रहेगी। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की नौसैनिक उपस्थिति और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का निर्यात इसे एक ऐसे साझेदार के रूप में स्थापित करता है जिसकी अनदेखी कोई भी क्षेत्रीय ताकत करने का जोखिम नहीं उठा सकती। अंततः, मक्का पैक्ट क्षेत्रीय भू-राजनीति में भारत की अपरिहार्यता को ही रेखांकित करता है। अधिक जानकारी के लिए रॉयटर्स की पश्चिम एशिया कवरेज देखें।

