विविध क्षेत्रीय कलारूपों को व्यापक दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का मौकाःमोनिका
राष्ट्र संवाद संवाददाता
रांची। शहर के खेलगांव के स्टेट म्यूजियम सभागार में रविवार की सुबह सांस्कृतिक भारत के दर्शन हुए। मंच एक, कलाकार अनेक। नृत्य की विविध शैलियों का यहां प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शन भी ऐसा-वैसा नहीं। लोगों को भाव-विभोर कर देने वाला। करतल ध्वनियों के बीच कलाकारों के एक-एक लय, एक-एक छंद, एक-एक टुकड़े ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। क्या मोहिनीअट्टम, क्या कथक, क्या स्केटिंग डांस और क्या भरतनाट्यम! हर प्रस्तुति शानदार। हर प्रस्तुति पर वाह-वाह। मौका था समस्कृतिकी और नृत्यशाला के तत्वावधान में आयोजित इंडिया इंटरनेशनल डांस फेस्टिवल का। इस फेस्टिवल में भारत के हर कोने से 160 नर्तकों ने अपनी परफार्मेंस दी।

कार्यक्रम की शुरुआत हुई कलामंडलम सृजा कृष्णन की मोहिनीअट्टम से। भगवान श्री विष्णु के मोहिनी अवतार का इसमें वर्णन हुआ, जो स्त्री सौंदर्य, उनकी कोमलता और भक्ति को मोहिनीअट्टम शैली में प्रस्तुत किया गया। पारंपरिक केरलम की सुनहरी किनारे वाली हल्की सफेद रंग की साड़ी में धीमी, लचकदार और लहराती हुई प्रस्तुति साथ ही हस्त लक्षण दीपिका ग्रंथ से ली गई 24 मुख्यहस्त मुद्राओं की भी इस नृत्य में प्रस्तुति की गई। इन प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मोह लिया।

इसके उपरांत गीतांजलि डांस इंस्टीट्यूशन की डॉ. चंद्र शालिनी कुजूर, रेशमा तिर्की, अंशिका घोष, नम्रता विश्वास, आयुषी सिंह, रिंकू कुमारी, अपराजिता करण, अदिति मिंज ने बिहू का प्रदर्शन किया। तीव्र नृत्य, बिजली की गति से हरकतें, पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-पेपा जैसे वाद्ययंत्र और प्रेम, प्रकृति व प्रजनन की भावना को दर्शाया गया इसमें। फसल की बुआई के समय प्रकृति, उर्वरता और सामाजिक एकता को इस नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद बारी आई भरतनाट्यम की प्रस्तुति की। सुष्मिता सेन बिस्वास, मैमोनी मंडल, स्तुति केडिया आदि ने भरतनाट्यम की प्रस्तुति की। इसमें अंग शुद्धि से शुरुआत करते हुए भाव, राग और ताल का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत किया गया। इसी नृत्य शैली में 52 हस्त मुद्राओं से विभिन्न भावों को अभिव्यक्त भी किया गया। चेहरे की भाव-भंगिमाओं से पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक विचारों को कलाकारो ने बताया, जिसे दर्शकों की खूब वाहवाही मिली। यह बताने का प्रयास किया गया कि संपूर्ण ब्रह्मांड विष्णु का ही एक रूप है। इसे आदि ताल भी कहा जाता है। आदि ताल की भी प्रस्तुति हुई।
इसके पश्चात नृत्यशाला के विधार्थियों ने अलग-अलग ग्रुप में कथक नृत्य की तीन प्रस्तुतियां दीं। इनमें भगवान श्री राम के कृपालु स्वभाव का वर्णन तो था ही, उनके दिव्य सौंदर्य और रक्षक रूप का भी वर्णन किया गया। कथक तराना ‘ता-ना-देर-ना’, ‘तद-नी-म’ की भी भावभीनी प्रस्तुति की गई। कथक तब तक अधूरा है, जब तक इसमें शिव की चर्चा न हो। कथक का जन्म ही महादेव से जुड़ा है। लिहाजा, शिव आदि हैं, शिव अनंत हैं, शिव शेष हैं, शिव विशेष हैं, शिव को दयालु रक्षक मानकर, संसार के दुखों से मुक्ति पाने के प्रयास को कथक के विभिन्न रुपों में दर्शाया गया। यह प्रस्तुति शानदार रही। कथक में ही आद्या और आराध्या की भी प्रस्तुति हुई। इसमें अनुरिमा झा, सुमोना चटर्जी का सोलो परफार्मेंस हुआ जबकि कृतशाला डांस अकादमी ग्रुप, कलाक्षेत्र डांस इंस्टीट्यूट ग्रुप ने सरस्वती वंदना, ठुमरी का प्रदर्शन किया।
इसके बाद अरिंजिता चटर्जी, राजनंदनी, लारिसा पटनायक, साईं नम्या, युक्ति ओरान, इशिता रॉय का सोलो परपार्मेंस हुआ। ओडिशी नृत्य में देवसूत्र ग्रुप का ग्रुप परफॉरमेंस हुआ। चेहरे के हाव-भाव और हाथों की मुद्राओं के माध्यम से जयदेव की गीत गोविंदम जैसी कविता की आकर्षक ओडिशी सैली में प्रस्तुति दी गई। इसी में त्रिभंगी (शरीर को सिर, धड़ और घुटनों से मोड़ना) और चौक (चौकोर मुद्रा) को भी दर्शाया गया। इस नृत्य शैली में खेमता ताल और राग किरवानी, जती ताल और राग गुज्जरी, तृप्ति ताल और राग मिश्रा खमाज तथा ताल एकटकी और राग बसंत का धड़ल्ले से इस्तेमाल हुआ।
अब बारी थी जमशेदपुर की युवा नर्तक कश्यपि की। कश्यपि आईं और स्केटिंग के माध्यम से अद्भुत नृत्य कर दर्शकों का मन मोह लिया।
इसके पूर्व उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि झारखंड के कमर्शियल टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता प्रीतम कुमार लाला ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम से देश के कलाकारों को अलग-अलग प्रदेशों में अपनी कला प्रदर्शित करने का मौका मिलता है। ऐसे आयोजनों से इंटरस्टेट रिलेशनशिप भी बेहद मजबूत होते हैं।
नृत्यशाला की संस्थापक और आईआईडीएफ रांची की संयोजक गुरु मोनिका डे ने झारखंड सरकार के संस्कृति निदेशालय और सीसीएल का आभार जताते हुए कहा कि इंडिया इंटरनेशनल डांस फेस्टिवल (आईआईडीएफ) का पहली बार रांची में होना बेहद ही गर्व और हर्ष का विषय है। कार्यक्रम में देश भर के क़रीब 160 कलाकार हुए शामिल हुए हैं। ऐसे आयोजनों से युवाओं को उनकी विरासत से जोड़ने और विविध क्षेत्रीय कला रूपों को व्यापक दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का मौका मिलता है। पारंपरिक कलाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा भी शामिल है। पारंपरिक प्रशिक्षण विधियों को बढ़ावा देना और गुरुओं तथा उनके दलों का समर्थन करना भी ऐसे आयोजनों का मुख्य उद्देश्य होता है।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि संस्कृति निदेशालय के निदेशक आसिफ़ एकराम ने कहा कि आईआईडीएफ का यह आयोजन शानदार है। इससे कलाकारों को एक वृहत मंच मिलता है, जहां वो एक-दूसरे की कला को न सिर्फ समर्थन देते हैं बल्कि उसे आगे बढ़ाने का प्रयास भी करते हैं। यह गर्व की बात है कि आईआईडीएफ का आयोजन रांची में हुआ। इससे झारखंड के कलाकारों में एक नई चेतना विकसित होगी और अपनी कला को लेकर वो और भी संजीदा होंगे।
इसके पूर्व झारखंड कला मंदिर के प्रशिक्षु बच्चों ने भरतनाट्यम और कथक की सानदार प्रस्तुति दी। अतिथियों का स्वागत प्लस टू गर्ल्स हाई स्कूल की छात्राओं ने नागपुरी नृत्य की प्रस्तुति से किया।
कार्यक्रम में समस्कृतिकी से चंदन बिस्वा और कलामंडलम सत्यनारायण शामिल हुए। आगंतुकों में जर्मनी से डॉ. ईस्थर, वरिष्ठ कलाकार श्यामा प्रसाद नियोगी, सेवानिवृत आईपीएस संजय रंजन सिंह, अभिलाषा दास, धर्मेंद्र तिवारी, भारतेंदु झा, डेबूप्रिय चौधरी, मोनिका मुंडू, मालविका, आलोक गुप्ता एवं प्रदेश के कलाजगत के कई दिग्गज कलाकार मौजूद रहे।

