79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विधान सभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो का भाषण
स्वतंत्रता दिवस के इस कार्यक्रम में उपस्थित माननीय विधायकगण, पूर्व विधायकगण, सभा सचिवालय के प्रभारी सचिव, सचिवालय के सभी पदाधिकारी एवं कर्मीगण, प्रेस मीडिया के साथियों एवं उपस्थित देवियों और सज्जनों। यह दिन हम सब के लिए गौरवपूर्ण और पावन है। चारो ओर उत्सव का वातावरण है। यह गर्व की बात है कि देश के हर जगह बच्चे, युवा और बुजूर्ग सभी उत्साह के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाते है। मैं झारखण्ड विधान सभा की तरफ से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं नमस्कार करता हूँ।
हमारे देश ने लगभग दो सौ सालों तक ब्रिटिश शासन की कठोर यातनाओं और शोसन को सहा। किसानों को भारी करों और जबरन लगान की बेड़ियों में जकड़ दिया गया, कारीगरों के हस्तशिल्प को नष्ट कर उनका रोजगार छीन लिया गया। मजदूरों को अमानवीय स्थीति में काम करने पर मजबूर किया गया, विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियांे की आवाज दबाने के प्रयासों और आम जनता को अपने ही देश में गुलाम बना लिया गया। स्त्री-पुरूष, युवा-वृद्ध, ग्रामीण-शहरी, गरीब-असहाय सभी वर्गों के लोग इस अन्याय के विरूद्ध खड़े हुए। क्रांति के अनेक स्वर-हूल, संथाल, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर असहयोग, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ों आंदोलन तक गंूजते रहे। अंततः इन बलिदानों एवं संयुक्त गूंज ने ब्रिटिश सम्राज्य को भारत से भागने पर मजबूर कर दिया एवं हमें स्वतंत्रता मिली।
यह वह पर्व है जब हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की अदम्य साहस, बलिदान और दृष्टि हमें गर्व का अनुभव कराती है। 15 अगस्त, 1947 को जब पहली बार हमारे पूर्वजों ने हमें वह अमूल्य विरासत सौंपी थी – आत्म-सम्मान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय का संकल्प। आज उसी संकल्प को, उसी आत्मा को फिर से याद करना और आगे बढ़ाना हमारा कर्तव्य है।
आज हम इस मंच पर जब झंडा फहराते हैं, तो तिरंगे की हर रंग की मर्मस्पर्शिनी कहानी हमें याद दिलाती है -केसरी रंग हमारे साहस का, सफेद रंग हमारे शांति की आकांक्षा का, और हरा रंग हमारे समृद्धि एवं जीवन-शक्ति का प्रतीक है।
’’हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं टिक सकता जब तक कि उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो।’’
यह पंक्तियाँ आज प्रासंगिक हैं। झारखण्ड जैसे विविधता-धारा के राज्य में सामाजिक न्याय, समावेशिता और पारदर्शिता के सिद्धांत को अपनाना हमारा प्रथम दायित्व है।
आजादी केवल एक ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि एक प्रतिज्ञा है-राष्ट्र निर्माण की निरंतर प्रक्रिया। तब से अब तक जो दूरगामी परिवर्तन भारत में हुए हैं, वे केवल जात-पात, भाषा-भेद, क्षेत्रीयता से उपर उठकर ’एकता में विविधता’ की ताकत पर आधारित हैं। भारत अब विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। यह किसी संयोग की उपलब्धि नहीं है और नहीं कुछ वर्षों का परिणाम है, बल्कि सतत नीति-निर्माण, जनभागीदारी और दृढ संकल्प की परिणति है।
आज झारखण्ड में भी हमें यह सुनिश्चित करना है कि विकास शहरों तक सीमित नहीं रहे; गाँव-गाँव तक किसान, आदिवासी समुदाय, छोटे उद्योग, महिला स्वरोजगार और शिक्षा, स्वास्थ्य से जुड़ी कवायद पहुँचे। हमें आत्म-निर्भर भारत के उस मार्ग पर चलना है जहाँ ’विकास का फल सबको मिले।’
मैं समझता हूँ कि ष्ंििपतउंजपअम ंबजपवदष् को मजबूत किया जाना चाहिए’’ और ’’कथित सामाजिक स्तरों के आधार पर कलह को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियों को खारिज करना होगा। ’’झारखण्ड में जहाँ सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता के साथ संघर्ष के इतिहास भी जुड़ा है, वहाँ समावेशी नीति-निर्माण और निष्पक्ष विकास आवश्यक है। हमारे संविधान निर्माता डॉ0 भीमराव आंबेडकर ने कहा है कि ’’राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं टिक सकता जब तक कि उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो’’ -और यह आज जितना जरूरी है, अगली पीढ़ी के लिए उतना ही अपरिहार्य है।
इस आजादी का मूल्य अनेकों स्वतंत्रता सेनानियों के अपार बलिदान से हासिल किया गया था। जय हिन्द, जय भारत, जय झारखण्ड-यह केवल नारे नहीं, बल्कि उनके आत्म-बलिदानों की जीवंत गाथा हैं।
हमारा राज्य स्वतंत्रता संग्राम में पूरे देश में अग्रणी रहा है। बाबा तिलका मांझी पूरे देश में पहली बार अंग्रेजो के विरूद्ध स्वाधीनता के लिए हथियार उठाया।
1855 में संथाल विद्रोह के दौरान सिद्धो-कान्हु, चाँद-भैरव और फूलो-झानो ने संथाल की मिट्टी से क्रान्ति का नेतृत्व किया और अंग्रेजी हुकूमत को झकझोर कर रख दिया। धरती आबा बिरसा मुण्डा ने न केवल अंग्रेजों से लोहा लिया, बल्कि राष्ट्रवाद की परिकल्पना को भी प्रस्तुत किया। राज्य के अन्य क्षेत्रो से भी स्वंतत्रंता संग्राम मे बढ़-चढ़कर भाग लिया।
झारखण्ड में वीर आदिवासी नेताओं की गाथा हमें यह याद दिलाती है कि इस मिट्टी ने हमेशा न्याय, सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी है। आज हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि उनके अनकहे संघर्ष को हम नए स्वरूप में आगे बढ़ाएँ- सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक न्याय और सांस्कृतिक आत्मशक्ति की ओर।
आज के इस पावन अवसर पर हम झारखण्ड के निर्माता, दूरदर्शी, आदिवासी अस्मिता के प्रहरी और सर्वप्रिय प्रेरणास्रोत दिशोम गुरू शिबू सोरेन को स्मरण करना चाहते हैं। वे न केवल जल, जंगल और जमीन के रक्षक थे, बल्कि शोषित-वंचित के सशक्त स्वर, सामूहिक संघर्ष और सामाजिक सद्भाव के प्रतीक भी थे। उनके आदर्श और संघर्ष की गाथा हमें हमेशा यह सिखाती रहेगी कि अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के साथ-साथ हमें राज्य और देश के निर्माण में अपना सर्वोत्तम योगदान देना है।
स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए अपने इतिहास से पुनः जुड़ने का अवसर होता है। यह हमारे वर्तमान का आकलन करने और भविष्य की राह बनाने के बारे में चितंन करने का अवसर भी है। भारत के विकास के दौड़ मे जो लोग छुट गए है उसके लिए सोचने का वक्त है। उन्हे साथ लेकर चलने उनके लिए बेहतर अवसर बनाने उनकी बेहतरी करने का संकल्प का समय हैं।
अंत में, आइए हम सब मिलकर न केवल स्वतंत्रता के अर्थ को याद करें, बल्कि उसे नई ऊँचाईयों और सामाजिक समरसता में ढालने के लिए कृत संकल्प हों।
जय हिन्द जय झाखण्ड! जोहार!

