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    Home » मौत रुलाती नहीं, ‘मोह’ रुलाता है: जीवन का कड़वा सच | राष्ट्र संवाद
    मेहमान का पन्ना

    मौत रुलाती नहीं, ‘मोह’ रुलाता है: जीवन का कड़वा सच | राष्ट्र संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghMay 13, 2026No Comments3 Mins Read
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    मौत रुलाती नहीं
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    मौत रुलाती नहीं, ‘मोह’ रुलाता है!

    राष्ट्र संवाद संवाददाता
    मुंबई (इंद्र यादव) दुनिया के किसी कोने में हर सेकंड एक जिंदगी की लौ बुझती है। आंकड़े कहते हैं कि रोज लाखों लोग इस दुनिया से विदा होते हैं, लेकिन क्या हम उन सबके लिए आंसू बहाते हैं? नहीं। हम अखबारों में मौतों के आंकड़े पढ़ते हैं, टीवी पर दुर्घटनाओं की खबरें देखते हैं और चाय की चुस्की लेकर आगे बढ़ जाते हैं।
    आज का कड़वा सच यही है कि मृत्यु कष्टकारी नहीं है, कष्टकारी है वह ‘संबंध’ जो हम किसी के साथ जोड़ लेते हैं।

    मृत्यु तो सत्य है, फिर शोक क्यों

    प्रकृति का नियम स्पष्ट है—जो जन्मा है, उसका अंत निश्चित है। अगर मृत्यु ही दुख का असली कारण होती, तो हम राह चलते हर अंजान व्यक्ति की अर्थी को देखकर फूट-फूट कर रोने लगते। लेकिन ऐसा नहीं होता। हमारा मन केवल तब विचलित होता है जब उस देह के साथ हमारा कोई स्वार्थ, प्रेम या मोह जुड़ा होता है।
    अजनबी की मौत: केवल एक सूचना या डेटा।
    परिचित की मौत: एक अफसोस।
    प्रियजन की मौत: असहनीय पीड़ा।
    यह अंतर स्पष्ट करता है कि हमारी आंखों से निकलने वाले आंसू मृतक के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के लिए होते हैं। हम इसलिए नहीं रोते कि वह चला गया, हम इसलिए रोते हैं क्योंकि उसके जाने से हमारी दुनिया में जो खालीपन आया है, उसे हम भर नहीं पा रहे।

    ‘मेरा’ और ‘तेरा’ का खेल

    दुख की जड़ उस ‘मेरे’ शब्द में है जिसे हम किसी व्यक्ति के साथ चिपका देते हैं। “मेरा भाई,” “मेरी मां,” “मेरा दोस्त।” जब तक ‘मेरा’ शब्द सुरक्षित है, हम शांत हैं। जैसे ही काल इस ‘मेरे’ पर प्रहार करता है, हम बिखर जाते हैं।
    दर्शन की भाषा में कहें तो: मौत एक शारीरिक घटना है, जबकि दुख एक मानसिक बंधन। हमने रिश्तों की जो अदृश्य जंजीरें बनाई हैं, मौत उन्हीं जंजीरों को झटके से तोड़ती है, और वही झटका हमें ‘दुख’ के रूप में महसूस होता है।

    नजरिया बदलने की जरूरत

    अगर हम गहराई से सोचें, तो मृत्यु तो मुक्ति है। दुख तो उन यादों का है जिन्हें हम छोड़ना नहीं चाहते। यदि हम जीवन को एक सराय की तरह देखें जहां लोग आते हैं और चले जाते हैं, तो शायद हम इस मोहपाश से मुक्त हो सकें।

    यह लेख किसी की संवेदनाओं को चोट पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करने के लिए है कि संसार की सारी पीड़ा का केंद्र ‘संबंध’ है। जिस दिन हम मोह से ऊपर उठकर जीवन को उसके वास्तविक रूप में स्वीकार कर लेंगे, उस दिन मृत्यु केवल एक बदलाव लगेगी, कोई त्रासदी नहीं।
    तय आपको करना है कि आप रिश्तों के बोझ तले दबे रहना चाहते हैं या जीवन की नश्वरता को समझकर सहज होना चाहते हैं।

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