देवानंद सिंह
भारत के संवैधानिक ढांचे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म की आज़ादी और समानता के सिद्धांतों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, लेकिन जब इन मूल अधिकारों को राज्य द्वारा पारित किसी क़ानून से चुनौती दी जाती है, तो यह न्यायपालिका के हस्तक्षेप की मांग करता है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2020 में पारित विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका इसी पृष्ठभूमि का हिस्सा है। सामाजिक कार्यकर्ता रूपरेखा वर्मा द्वारा दायर याचिका पर शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, जिससे इस पूरे मामले को एक नई संवैधानिक दिशा मिलने की संभावना बन गई है। उत्तर प्रदेश सरकार का यह तर्क रहा है कि यह कानून उन तत्वों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच है, जो धोखे, प्रलोभन, बलपूर्वक या विवाह के ज़रिए धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं। इसे विशेष रूप से ‘लव जिहाद’ कहे जाने वाले कथित सामाजिक-धार्मिक षड्यंत्र को रोकने के लिए लाया गया था, जहां आरोप लगाया गया कि मुस्लिम युवक हिंदू युवतियों को प्रेम जाल में फंसा कर उनका धर्म परिवर्तन करवाते हैं।
सरकार के अनुसार, इस अधिनियम का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं, बल्कि उसे सुनिश्चित करना है, ताकि कोई भी व्यक्ति असमंजस, दबाव या धोखे के कारण अपना धर्म न बदले। अधिनियम के तहत एक व्यवस्थित प्रक्रिया निर्धारित की गई है, जिसमें प्रस्तावित धर्मांतरण से पहले जिलाधिकारी को सूचना देना और उनकी अनुमति लेना अनिवार्य है। अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के अधिकार में व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने का भी अधिकार सम्मिलित है। जब किसी धर्मांतरण को केवल इसलिए अवैध ठहरा दिया जाए, क्योंकि वह विवाह के उद्देश्य से किया गया है, तो यह सीधे-सीधे व्यक्ति की वैयक्तिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप माना जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी इच्छा से किसी भी धर्म को मानने, प्रचार करने और आचरण करने का अधिकार देता है। यदि, कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म बदलता है, तो राज्य को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, जब तक कि कोई स्पष्ट जबरदस्ती, धोखा या प्रलोभन प्रमाणित न हो। मानवाधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई विधिवेत्ताओं ने तर्क दिया है कि यह कानून एक ऐसे सामाजिक नैरेटिव को कानूनी रूप देने का प्रयास है जो मुस्लिम समुदाय को शक के दायरे में रखता है। आलोचकों का मानना है कि कानून का प्रयोग अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को परेशान करने, जेल में डालने और उनके खिलाफ सामाजिक-राजनीतिक नफरत भड़काने के लिए किया जा रहा है।
अधिनियम के तहत धर्म परिवर्तन से पहले जिलाधिकारी से अनुमति लेना, और अनुमति के बिना विवाह को अमान्य घोषित करना, सीधे-सीधे राज्य को व्यक्ति के धार्मिक और वैवाहिक निर्णयों में दखल देने की शक्ति देता है। यह न केवल संविधान की आत्मा के विरुद्ध है, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भी विपरीत है। रूपरेखा वर्मा द्वारा दाखिल याचिका में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस अधिनियम की वैधता पर निर्णय नहीं दे देती, तब तक इस कानून के तहत कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। याचिका का आधार यह है कि कानून के प्रावधान बहुत व्यापक, अस्पष्ट और मनमाने हैं, जिनका प्रयोग समाज में भय और अविश्वास पैदा करने के लिए किया जा सकता है।
याचिका में यह भी इंगित किया गया है कि विवाह और धर्मांतरण जैसे विषयों को ‘क्राइम प्रॉब्लम’ की तरह देखना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। जब कोई भी नागरिक अपना धर्म बदलने का निर्णय लेता है, तो उसे ‘शक की निगाह’ से देखना और उसे प्रमाण देने के लिए मजबूर करना एक तरह से उसकी नागरिकता और गरिमा को संदेह के घेरे में डालना है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार के अन्य मामलों की पहले से सुनवाई कर रही है। मध्यप्रदेश और उत्तराखंड में लागू इसी प्रकार के कानूनों को भी चुनौती दी गई है। अब उत्तर प्रदेश के कानून को भी इन्हीं मामलों के साथ जोड़ने का फैसला दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मसले पर समग्र और गहन न्यायिक दृष्टिकोण से विचार करना चाहती है। 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े एक मामले में टिप्पणी की थी कि दो बालिगों की आपसी सहमति से किया गया विवाह निजी क्षेत्र का विषय है, जिसमें राज्य का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। इसी तरह के कुछ अन्य फैसलों ने भी इस प्रकार के कानूनों की संवैधानिक वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। उत्तर प्रदेश में यह अधिनियम उस समय लाया गया था जब राज्य में ‘लव जिहाद’ को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस तेज़ हो चुकी थी। बीजेपी सरकार ने इसे अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी नीतियों की निरंतरता बताया और इसे ‘संस्कृति की रक्षा’ के लिए आवश्यक कदम करार दिया। हालांकि, इसके परिणामस्वरूप कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें आरोप झूठे पाए गए, और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को बेवजह जेल या सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा।
कानून के सामाजिक प्रभावों की समीक्षा की जाए तो यह स्पष्ट होता है कि इससे समाज में धार्मिक विभाजन गहरा हुआ है। अंतरधार्मिक प्रेम या विवाह को लेकर भय, संदेह और सामाजिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। यह कानून व्यक्ति की निजी पसंद को सार्वजनिक बहस और न्यायिक जांच का विषय बना देता है। भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष और उदार गणराज्य का निर्माण करता है, जहां व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और चुनाव की स्वतंन्त्रता सर्वोपरि है। लेकिन जब विधान मंडलें जनसंख्या के एक वर्ग को लक्षित करने वाले कानून पारित करती हैं, तो यह न्यायपालिका का कर्तव्य बनता है कि वह इन कानूनों की संवैधानिक समीक्षा करे।
इस केस में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका सिर्फ एक कानून की वैधता तय करने की नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की है कि भारत का लोकतांत्रिक ढांचा और उसकी उदार आत्मा सुरक्षित बनी रहे। उत्तर प्रदेश में ‘लव जिहाद’ कानून को चुनौती देने वाली याचिका एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पड़ाव है। यह एक परीक्षण है कि भारत किस दिशा में जा रहा है। क्या हम धर्म, जाति और निजी संबंधों को लेकर और अधिक कठोर और अविश्वासी बनते जा रहे हैं, या फिर हम अपने संविधान में निहित मूल्यों की रक्षा के लिए न्यायपालिका पर विश्वास बनाए रखेंगे?
सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के लिए नज़ीर बनने वाला होगा। यह फैसला तय करेगा कि क्या राज्य अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर सकता है या नहीं, और शायद इससे यह भी स्पष्ट होगा कि भारत की धर्मनिरपेक्षता केवल संविधान की किताबों तक सीमित रहेगी या वास्तव में समाज में जीवंत रहेगी।
पृष्ठ रचनाकार: सिराज अंसारी जामताड़ा

